आज का नवाचार - पेंसिल/कलम की सहज उपलब्धता।
छोटे बच्चों में एक और सबसे बड़ी समस्या पेंसिल/कलम गुम हो जाने,घर पर छूट जाने या किसी अन्य बच्चे के द्वारा ले ली जाने की होती है। ऐसे में बच्चे कहते है कि हमारे पास तो लिखने के लिए कुछ है ही नहीं। कुछ बच्चों में यह आदत घर कर जाती है कि वो बिना पेंसिल/कलम के आते हैं और अक्सर शिक्षक से उनकी कलम या हर बार एक नई पेंसिल ले जाते हैं। मैं खासकर इस समस्या से बहुत रुबरु होती रहती हूं, क्योंकि मेरे बच्चों की पारिवारिक पृष्ठभूमि इस तरह की है जहां अगर पेंसिल एक बार गुम हुई तो फिर वापस नया उपलब्ध हो पाना असंभव सा काम होता है।
आज इस समस्या का हमनें एक स्थायी हल निकाला। बच्चों से बात की गई और विचार रखा गया कि सभी के लिए एक-एक पेंसिल होगी पर वह क्लासरूम में लिखने के बाद वापस रख दी जाएगी। सबने सहमति जताई। अगले दिन मैं पेंसिल की तीन पैकेट लेकर आई। साथ ही मुझे याद आया कि विधानसभा चुनाव के समय मोबाइल रखने के लिए जूट की पाॅकेट बोर्ड दी गई थी जिसमें बड़े काले रंग में एक से दस तक की संख्या भी लिखी हुई थी जो कि बच्चों के सीखने और पेंसिल रखने के काम आ सकती थी। यह एक अच्छा विकल्प था जिसमें बच्चों के पहुंच के हिसाब से पेंसिल और कटर रखे जा सकते थे। हमनें दो कील दीवार में ठोंक कर बच्चों के लंबाई के हिसाब से उस पाॅकेट बोर्ड को टांग दिया और संख्या के हिसाब से पेंसिल रख दिए। बच्चों ने पेंसिल को निकाल कर देखा और गिना भी। कक्षा जब प्रारंभ हुई तब बच्चों ने पेंसिल लिया और लिखा। छुट्टी के समय उन्होंने पेंसिल को वापस संभालकर पाॅकेट बोर्ड में रख दिया।
अब बच्चे रोज इस तरह से पेंसिल लेते हैं और उपयोग के पश्चात अपनी जगह पर रख देते हैं। इस नवाचार से अब यह टेंशन खत्म हो गई कि बच्चे पेंसिल या कलम लाना भूल जाते हैं या गुम कर लेते हैं या अनुपलब्ध होने पर लिखने से वंचित हो जाते हैं। साथ ही बच्चों में एक जिम्मेदार नागरिक वाले गुण का भी विकास हो पा रहा है कि जो चीज जहां से ली गई उसे वापस उसी जगह पर रख दिया जाएं।
©प्रियंका कुमारी
वर्ग शिक्षिका कक्षा - 1
मध्य विद्यालय मलहाटोल, परिहार, सीतामढ़ी।
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