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अभिभावकों और बच्चों का एक साथ सीखना

दृश्य -1
साक्षी के दादाजी उसकी कक्षा में बैठकर उसके सभी सहपाठियों के बीच कहानी सुना रहे है और वो मन ही मन गर्वीली सी मुस्कान लिए सबके साथ कहानी सुन रही है।

दृश्य -2
आदित्य अपनी दादी के साथ बैठकर एक सादे पेज पर कलर पेन्सिलों के साथ ड्राइंग कर रहा है। उसकी दादी और वो दोनों एक ही समय में एक ही पेज पर ड्राइंग कर रहे है और आपस में बातचीत भी कर रहे है।

दृश्य -3
महिमा अपने घर के आंगन में अन्य भाई-बहनों के साथ मां के निकट बैठी है और उसकी कक्षा की शिक्षिका उसकी मां से उन्हीं की भाषा में बात कर रही है और बता रही है कि एक शिक्षक और अभिभावक साथ में मिलकर काम करें तो बच्चों का सर्वांगीण विकास कितना सरल हो जाएगा। साथ ही वो अपने बुनियादी कक्षाओं के बच्चों की शिक्षा में कैसे अपना सहयोग दे सकती है।

दृश्य -4
स्कूटी से जा रही शिक्षिका रास्ते में रुक कर खेतों से घास के भारी-भरकम गट्ठर सर पर लिए जा रही महिलाओं को रोककर और उनके गट्ठर नीचे रखवाकर पेड़ की छांव में बैठकर उन्हें अपने पोते-पोतियों को रात में सोते समय कोई कहानी या अनुभव सुनाने की बात करती है और उनकी कविता -कहानी से बच्चों के शिक्षण पर पड़ने वाले प्रभावों के बारे में बताती है।

उपर्युक्त चारों ही दृश्य बताते है कि संबंधित शिक्षक (स्वयं मैं)द्वारा बच्चों की शिक्षा में अभिभावकों की सहभागिता सुनिश्चित करवाने हेतु प्रयास किए जा रहे है। 
आज मैं इस आलेख के माध्यम से आप सबों के साथ इसी विषय पर बात करना चाहती हूं। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि बच्चों के प्रथम शिक्षक माता-पिता को ही माना जाता है। खासकर बुनियादी कक्षाओं के बच्चों के संदर्भ में यह बात शत-प्रतिशत लागू होती है। 
यहां एक दृश्य की कल्पना कीजिए कि 
*  बुनियादी कक्षाओं में अध्ययनरत एक छात्र विद्यालय से घर आता है। घर पर उसके पास एक असाक्षर या कम पढ़े-लिखे अभिभावक है जो अपने जीवकोपार्जन के लिए अहले सुबह से देर शाम तक दैनिक मजदूरी में लगा हो और वो अपने बच्चों से विद्यालय में हुए गतिविधियों या पढ़ाई या बच्चों की मनोस्थिति के संबंध में कोई भी बात नहीं कर के भोजन करते हैं और सो जाते है। उनकी व्यस्त, मेहनत एवं थकान भरी जीवनशैली उन्हें बच्चों की शिक्षा की दिशा में सोचने का रत्तीभर भी अवसर नहीं देती।
*  उपर दिए गए समान परिस्थितियों में भी अगर कोई अभिभावक अपने बच्चों को अगर दिन में समय नही मिलने पर भी रात में सोने वक्त भी अगर वो बच्चों के साथ थोड़ा भी वक्त बिताते है और उससे दिन भर की गतिविधियों के बारे में जानकारी लेते है या फिर सोते समय अपनी ही भाषा में कोई गीत या कहानी सुनाते है तो यह विद्यालय और घर में सीखने की निरंतरता को बनाए रखने में सहायक होता है। 

आप स्वयं विचार कर सकते है कि दोनों में से किस बच्चे का मानसिक या भाषा विकास बेहतर ढंग से हो पाएगा। ठीक ऐसी ही दैनिक परिस्थितियों से मेरे विद्यालय के अभिभावकों को भी गुजरना पड़ता है, क्योंकि मेरे विद्यालय की अधिकांश आबादी सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक रूप से अत्यंत ही पिछड़ी हुई अवस्था में है। ऐसे में बच्चों के अधिगम पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ना एक स्वाभाविक क्रिया है।
नई शिक्षा नीति 2020 का डाक्यूमेंट्स जब प्रकाशित हुआ था तो उसमें स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि देश सीखने के संकट से जूझ रहा है। असर की रिपोर्ट बताती है कि पांचवी कक्षा के बच्चे तीसरी कक्षा के पाठ नही पढ़ पा रहे है। बुनियादी साक्षरता और संख्या ज्ञान पर युद्ध स्तर पर कार्य करने की दिशा में बात कही गई। साथ ही सबको एकसमान स्तर पर लाने के लिए प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा पर व्यापक रूप में गंभीरता से कार्य करने की योजनाएं बनाई गई। आज इसी का परिणाम है कि पूरे देश में और हमारे राज्य बिहार में भी मिशन निपुण के लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए जोर-शोर से प्रयास जारी है। इसी क्रम में में जब मुझे एफएलएन के अंतर्गत शिक्षक संदर्शिका में पैरेंटल इंगेजमेंट विषय पर लेखन कार्य का अवसर मिला तब मैंने अपने सभी जमीनी अनुभवों को लेखन में समेटने का भरपूर प्रयास किया और इसका परिणाम यह हुआ कि मैं इस विषय को लेकर के पूर्व से अधिक गंभीर एवं संवेदनशील बनी।

बुनियादी कक्षाओं को भावी शिक्षण का आधार माना जाता है। इसलिए मेरे अंदर की यह भावना और गहरी हो चली थी कि अगर देश सीखने के संकट से गुजर रहा है तो इसके लिए शिक्षक हो, अभिभावक हो या फिर समुदाय... सबको आगे बढ़ कर सहयोग करना होगा। हमारे राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर निर्मित डाक्यूमेंट्स भी इस बात की वकालत करते है। साथ ही मैंने भावानात्मक स्तर पर भी अपने यहां के अभिभावकों की कठिन जीवनशैली को देखकर यह महसूस किया कि उन्हें हमारे सहयोग की आवश्यकता है और हमें ही आगे बढ़ कर उनकी मदद करनी होगी। इसलिए मैंने अभिभावकों को बच्चों की शिक्षा में सहभागिता सुनिश्चित करवाने हेतु उन्हें बातचीत और कुछ गतिविधियों के माध्यम से प्रशिक्षित करने का विचार किया और इसी सोच के फलस्वरूप मैंने वर्ष 2023 में "निपुण अभिभावक निपुण बच्चे" नामक नवाचार का प्रारंभ किया। इस नवाचार के अंतर्गत अभिभावकों को अपने कक्षा-कक्ष में आमंत्रित कर उनसे कहानी, कविता, लोकगीत तथा ड्राइंग/पेंटिंग आदि गतिविधियां बच्चों के साथ करवाना आरंभ किया। साथ ही गृह भ्रमण कर अभिभावकों से संवाद भी स्थापित किया और उन्हें बहुत से व्यावहारिक तरीकों के बारे में जानकारी दी कि वह किस प्रकार अपने बच्चों के सीखने में सहायक बन सकते है। इन सारी गतिविधियों के पीछे कुछ प्रमुख उद्देश्य थे जो इस प्रकार है ----
* बच्चों के सर्वांगीण विकास में अभिभावकों की भागीदारी सुनिश्चित करना ताकि बच्चे घर और विद्यालय दोनों स्थानों पर सीखने की निरंतरता बनाए रखें।
* मौखिक भाषा विकास को प्रोत्साहित करना।
* फाइन मोटर स्किल्स का विकास ।
* अभिभावकों और बच्चों के बीच मजबूत भावानात्मक संबंध बनाना।
* शिक्षा में सहभागिता की भावना को बढ़ावा देना।
* बच्चों की रचनात्मकता और अभिव्यक्ति को बढ़ावा देना।

चूंकि उपर्युक्त उद्देश्यों की पूर्ति इतना आसान नहीं है जब अभिभावकों की पृष्ठभूमि मेरे विद्यालयी परिवेश की तरह हो। फिर भी मैं प्रयासरत रही और आज भी हूं। कई बार मैं निराश भी हुई पर मेरे इस नवाचार को ECCE & FLN के विशेषज्ञ श्री प्रवीण चंद्रा का नैतिक समर्थन मिलता रहा जिसने मेरे इस प्रयास की निरंतरता को बनाए रखने में मदद किया।
यह बहुत मुश्किल था कि अभिभावकों को कक्षा-कक्ष के अंदर तक लाया जाए और उनसे बच्चों की बात-चीत करवाकर उन्हें प्रत्यक्ष अनुभव प्रदान किया जाए। 
चूंकि पुरुष अभिभावकों की उपस्थिति असंभव सी थी क्योंकि वो या तो प्रवासी मजदूर के रूप में अथवा दैनिक मजदूरी के लिए अन्यत्र होते थे। ऐसे में महिला अभिभावकों को संलग्न करना अनिवार्य रहा क्योंकि उनके कार्यों का स्थल निश्चित होता था। महिलाएं घरेलू कार्यों में और कृषि कार्य अथवा मवेशियों के लिए चारा या ईंधन इक्ट्ठा करने के लिए आस-पास के खेतों में प्रायः मिल जाया करती थी। सबसे पहले हमने गृह भ्रमण के दौरान संवाद स्थापित किए तो कभी रास्ते में तो कभी खेतों के मुंडेर पर। क्योंकि उन्हें यह विश्वास दिलाना आवश्यक था कि वह भी बच्चों की शिक्षा में योगदान दे सकती है और बच्चों के सर्वांगीण विकास में उनका भी उतना ही महत्व है जितना कि हम शिक्षकों का। लगभग अभिभावक यह कह कर ही पल्ला झाड़ने की कोशिश करते कि उन्हें कोई कहानी नही आती। ज्यादा पुछने पर भावुक हो कर बताती कि एक तो वो कभी स्कूल नहीं गए और ना ही उनके माता-पिता ने उन्हें कभी कोई खिसा-कहानी कही। इसलिए उनसे नहीं हो पाएगा। फिर भी मैंने उन्हें समझाया कि आप सभी क्या चाहती है जो अनुभव आपको नही मिला...वो आपके बच्चों को भी ना मिले...! बुनियादी उम्र के बच्चे अपनी सारी जरुरतों के लिए सबसे अधिक अपनी मां या दादी पर ही निर्भर होते है ऐसे में अगर आप अपना महत्व और जिम्मेदारी नही समझेंगे तो फिर बच्चों का सर्वांगीण विकास कैसे होगा। उनके चेहरे के भाव मुझे अपनी बात को आगे बढ़ाने का अवसर देती है और मैं अपनी बातों को आगे बढ़ाते हुए उनसे अनुरोध करती हूं कि अगर उन्हें कहानी नही आती तो कोई बात नहीं,आप बच्चे को अपने जीवन की, अपने बचपन की यादें साझा कर सकती है, कोई भजन या कोई गीत जो गांव-घर में गाया जाता है वह सुना सकती है या फिर कुछ नही तो अपने बच्चों से विद्यालय में हुई दिनभर की गतिविधियों या शिक्षकों के संबंध में जानकारी प्राप्त कर बच्चों को बातचीत करने का अवसर दे सकती है.... और जहां तक कहानियों की बात है आप विद्यालय आए या कोई स्थान निर्धारित करें मैं रोज एक कहानी सुना दिया करुंगी आपलोगों को....!
इस तरह से बहुतेरे अभिभावकों से संवाद स्थापित करने के बाद मेरी कक्षा तक बहुत से अभिभावक पहुंचे और उन्होंने अपना प्रायोगिक अनुभव प्राप्त किया। कभी कविता, कहानी, लोकगीत तो कभी अच्छी आदतों के संबंध में बातें तो कभी बच्चों के लेखन कौशल विकास के लिए ड्राइंग-पेंटिंग का अनुभव तो कभी मिट्टी से टीएलएम निर्माण आदि। इन गतिविधियों ने बच्चों के शिक्षण पर कितना प्रभाव डाला, मैं यह तो दावा नहीं कर सकती। पर हां, मुझे बतौर शिक्षक एक आत्मिक संतुष्टि होती रही कि मैं बदलाव लाने की दिशा में प्रयासरत हूं।
इस पहल का असर शिक्षक -अभिभावक संगोष्ठी पर भी पड़ा। जहां पहले एक भी माता अभिभावक की उपस्थिति सुनिश्चित करवाना एक कठिन कार्य होता था। आज यह एक सामान्य बात हो गई है। हाल ही में 31 मई को आयोजित शिक्षक- अभिभावक संगोष्ठी में माता अभिभावकों ने अपनी उपस्थिति से जता दिया कि वह अपने बच्चों की शिक्षा में भागीदार बनने के लिए पूरी तरह से तैयार हो चुकी है। 
मेरा यह आलेख लिखने का एकमात्र उद्देश्य यह है कि हमें बुनियादी कक्षाओं के बच्चों को अधिक से अधिक अनुभव देने की आवश्यकता है और यह अभिभावकों के सहयोग के बिना संभव नहीं है। साथ ही बच्चों के साथ-साथ अभिभावकों को भी हम शिक्षकों के सहयोग और मार्गदर्शन की आवश्यकता है। हमें उन्हें प्रायोगिक अनुभव देने होंगे, खासकर तब जब वह एकदम विपरीत और कठिन पृष्ठभूमि से संबंधित है। 
वैसे इस नवाचार का उपयोग करने के फलस्वरूप आप बच्चों की शिक्षा में निम्न प्रभाव देखने की अपेक्षा रख सकते है —-

1. मौखिक भाषा विकास में प्रगति-
जब अभिभावक बच्चों को कहानियाँ या कविताएँ सुनाते हैं, तो बच्चों की श्रवण क्षमता, शब्द भंडार और भाव अभिव्यक्ति में सुधार होता है। साथ ही बच्चों में सुनने और बोलने के प्रति रुचि बढ़ती है, जिससे संवाद कौशल विकसित होता है।

2. फाइन मोटर स्किल और लेखन क्षमता का विकास-
ड्राइंग व पेंटिंग जैसी गतिविधियाँ बच्चों की उंगलियों की पकड़, हाथ की स्थिरता और दिशा ज्ञान को मजबूत करती हैं, जो लेखन कौशल की नींव होती है।रंग भरना, रेखाएँ खींचना, आकृतियाँ बनाना आदि कार्यों से बच्चों में लेखन की तैयारी (pre-writing skills) बेहतर होती है।

3. अभिभावकों के सहयोग से आत्मविश्वास में वृद्धि-
जब बच्चे देखते हैं कि उनके माता-पिता स्कूल की गतिविधियों में सक्रिय हैं, तो वे आत्मविश्वासी और प्रेरित महसूस करते हैं।उन्हें यह अनुभव होता है कि शिक्षा केवल स्कूल तक सीमित नहीं, बल्कि घर और स्कूल दोनों की साझा जिम्मेदारी है।

4. समग्र मानसिक व सामाजिक विकास-
सामूहिक गतिविधियों में भाग लेने से बच्चों में सहयोग, प्रतीक्षा करना, अनुशासन, और भावनात्मक समझ विकसित होती है।अभिभावकों की सहभागिता बच्चों के व्यवहार और सोचने की प्रक्रिया को सकारात्मक दिशा देती है।

5. सीखने का परिवेश समृद्ध होता है-
घर जैसा सहयोगी वातावरण विद्यालय में बनने से बच्चों के लिए सीखना एक आनंददायक अनुभव बन जाता है।बच्चे अधिक सक्रिय, उत्साही, और जिज्ञासु हो जाते हैं।

 6. घर और विद्यालय के बीच की दूरी कम होती है-
अभिभावकों की सहभागिता से शिक्षक, विद्यार्थी और अभिभावक के बीच एक सशक्त त्रिकोणीय संबंध बनता है।इससे बच्चों को हर स्तर पर एकजुट समर्थन मिलता है, जो उनकी निरंतर प्रगति में सहायक होता है।

अतः उपर्युक्त विवरणों के आधार पर हम कह सकते है कि जब तक शिक्षक और अभिभावक सम्मिलित रूप में प्रयास नही करेंगे तब तक मिशन निपुण जैसे अभियान की शत-प्रतिशत सफलता संदिग्ध ही रहेगी। 
आइए हम सब मिलकर राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर विकसित पैरेंटल इंगेजमेंट से संबंधित डाक्यूमेंट्स का अध्ययन करें और उसे व्यावहारिक रूप में अपने विद्यालय एवं उसके पोषक क्षेत्र में लागू करें। हमने डिबेट, कार्यशालाएं,वेबिनार आदि-आदि बहुत सारी चीज़ें इस मुद्दे पर कर ली,अब वक्त है इसे व्यवहार में अपनाएं और अपने बच्चों का सर्वांगीण विकास सुनिश्चित करें।
धन्यवाद।
©प्रियंका कुमारी 
शिक्षिका 
मध्य विद्यालय मलहाटोल, परिहार 
जिला - सीतामढ़ी, बिहार।
ई-मेल - pkjha2209@gmail.com

नोट- इस नवाचार से संबंधित पूर्व के आलेख पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें 👇 


हिन्दुस्तान समाचार पत्र में प्रकाशित खबर। दिनांक - 02 जून 2025

#fln #ecce #nipunbharat #nipunbihar #parentalengagment #sitamarhi 


Comments

  1. Aapke dwara kiya gaya hr ek pryas hmare liye prena hai 🙏

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    1. आपकी सराहना के लिए धन्यवाद | आप अपने कमेंट के साथ अपना परिचय भी लिखते तो अच्छा लगता |

      Delete

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