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Showing posts from September, 2024

बिहार की बात

कविता : बिहार  आओ हम मिलकर  बिहार की बात करते हैं । लोकतंत्र की जननी  सीता की जन्मभूमि  देशरत्न राजेन्द्र और  क्रांति नायक जयप्रकाश  इन सबकी बात करते हैं।।  मिथिला के संस्कार  भोजपुर का ओज  अंगिका-बज्जिका की मिठास  मगध साम्राज्य की बात करते हैं  आओ हम मिलकर  बिहार की बात करते हैं । नालंदा की धरोहर   तेल्हाड़ा की खोज  कैमूर की पहाडि़यां  गंगा की निर्मल धार  आओ हम मिलकर  बिहार की बात करते हैं ।।  महावीर की अहिंसा  वीर कुंवर सिंह की वीरता  सम्राट अशोक की कर्मभूमि  आर्यभट्ट की विद्वता  भगवान बुद्ध की ज्ञान भूमि  गुरु गोविंद सिंह का यह धाम   आओ हम मिलकर  इन सबकी बात करते हैं।।  चंपारण का सत्याग्रह  कौटिल्य का अर्थशास्त्र  पाणीनि का व्याकरण  नालंदा का विश्वविद्यालय  जरासंध का अखाड़ा शांति स्तूप की बात करते हैं  पंच पहाडि़यों से घिरे  राजगीर की बात करते हैं।।  गांवों में है बिहार   भारत के हृदय में...

बिहार की बात करते हैं।

सीता की जन्मभूमि पर  मिथिला के संस्कार की बात करते हैं । आओ बात करते हैं  हम मिलकर बिहार की बात करते हैं । ज्ञान की धरोहर, नालंदा का नाम, मगध की माटी में छिपा इतिहास तमाम। अपने गौरवशाली अतीत को  आओ मिलकर फिर से पुनर्जीवित करते हैं। महावीर की अहिंसा  कुंवर सिंह की वीरता  अशोक की कर्मभूमि  आर्यभट्ट की विद्वता  बुद्ध की ज्ञान प्राप्ति की बात करते हैं  आओ हम मिलकर बिहार की बात करते हैं। गांधी के सत्याग्रह  राजेन्द्र प्रसाद की सादगी  कौटिल्य के अर्थशास्त्र  पाणिनि के व्याकरण  नालंदा विश्वविद्यालय की बात करते हैं  आओ हम मिलकर बिहार की बात करते हैं। गांवों में बसता बिहार है  और भारत के हृदय में बसता गांव है  आओ हम उस बिहारीपन की बात करते हैं  जिसकी खूश्बू में बसी देश की मिट्टी है  हम मिलकर बिहार की बात करते हैं। आओ बात करते हैं  कर्त्तव्य और अधिकारों की  शिक्षा और स्वच्छता की  गांव और खेत-खलिहान की   बेबस और वंचितों की  पलायन के पीड़ा की  सपनो के संघर्ष की बात करते हैं ...

मिट्टी या रेत पर लेखन

बच्चों में लिखने की शुरुआत अपने आप में एक चुनौतीपूर्ण स्थिति होती हैं। कुछ बच्चे जिन्हें ड्राइंग/पेंटिंग करना पसंद होता है उनके लिए लिखना एक सरल क्रिया साबित होती है। परंतु कुछ बच्चों के लिए लिखने की प्रक्रिया से गुजरना एक कठिन पड़ाव होता है। ऐसा ही कुछ कक्षा-कक्ष में शिक्षण कार्य के दौरान मैंने अनुभव किया कि कुछ बच्चों को लिखने में बहुत कठिनाई महसूस हो रही है। काॅपी पर उनकी पेंसिल अपनी जगह पर अटक कर रह जा रही है। कितनी ही कोशिशों के बावजूद बच्चों की कलम/पेंसिल आगे नही बढ़ पा रही।  ऐसे में मैंने अपने परिवेश में उपलब्ध संसाधनों की ओर नजर दौड़ाई और मुझे एक विकल्प के रूप में बालू और बांस के दातून मिले। विद्यालय में उपलब्ध भोजन की पांच थालियों में बालू रखा और बच्चों से पहले बालू में उंगलियां चलवाई और फिर बांस के दातून को कलम की तरह लिखने का अभ्यास करवाया जिसका काफी सकारात्मक प्रभाव देखने को मिला।   बच्चों के लिए बालू पर लिखना बिल्कुल नवीन अनुभव था। चूंकि मैं अपने विद्यालय के बच्चो को खेल के मैदान में फ्री ड्राइंग कई वर्ष पूर्व से ही करवाती आयी हूं। पर भीषण गर्मी क...