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निपुण अभिभावक निपुण बच्चे

निपुण अभिभावक निपुण बच्चे
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इस आलेख के माध्यम से आप जानेंगे कि अगर हमें बच्चों की शिक्षा में अभिभावकों की सहभागिता सुनिश्चित करवानी है तो बच्चों के साथ-साथ अभिभावकों को भी निपुण बनाने में अपना सहयोग देना होगा। साथ ही अभिभावकों के लिए ऐसे अवसरों का भी सृजन करना होगा जिसमें वह बच्चों के हित में अपनी भागीदारी दे सकें। मैंने निपुण अभिभावक निपुण बच्चे नवाचार का प्रयोग कर अभिभावकों के लिए एक अवसर उपलब्ध करवाने की कोशिश की है जिसके माध्यम से वो बच्चों की शिक्षा में सहभागी बन सकें।


किसी भी बच्चे के लिए परिवार प्रथम पाठशाला तथा माता-पिता/अभिभावक प्रथम शिक्षक होते हैं। बच्चे जब पहली बार विद्यालय आते हैं तो उस समय भी उनके पास बहुत सा ज्ञान और अनुभव होता है । वैसे तो बच्चों की शिक्षा में पूर्व में भी परिवार की भागीदारी के महत्व को स्वीकार किया गया है पर नई शिक्षा नीति 2020 में अभिभावकों एवं समुदाय की शिक्षा में सहभागिता पर विशेष बल देने की बात की गई है। राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा मंत्रालय द्वारा भी शिक्षा में अभिभावकों की सहभागिता से संबंधित डाक्यूमेंट प्रकाशित किए गए हैं जो पठनीय और व्यवहार में अनुकरणीय है।
साथ ही बिहार में भी एफ एल एन के अंतर्गत विकसित शिक्षक संदर्शिका में भी बड़े ही सुन्दर और सुगम तरीके से शिक्षा में अभिभावकों की सहभागिता सुनिश्चित करवाएं जाने के तरीकों का उल्लेख किया गया है। इसके अंतर्गत अभिभावकों के लिए एक गतिविधि कैलेंडर भी तैयार की गई है जिसकी प्रेरणा से अभिभावक घर पर ही विभिन्न शैक्षणिक प्रयासों को अंजाम दे सकते हैं जो कि बुनियादी साक्षरता एवं संख्या ज्ञान के लक्ष्य प्राप्ति में सहायक है। 
नई शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप बच्चों की शिक्षा में परिवार की महत्ती भूमिका को समझते हुए बतौर शिक्षक मैंने इसे व्यवहारिक रूप में लागू करने के लिए अपने विद्यालय में एक नवाचार शुरू किया है जिसका नाम दिया है - निपुण अभिभावक निपुण बच्चे। जैसा कि हमें पता है कि राज्य के अधिकांश विद्यालय ग्रामीण परिवेश में है और आज भी शैक्षिक संदर्भ में विद्यालय में अभिभावकों की सहभागिता सुनिश्चित करवाना आसान नहीं है। अभिभावकों की भी अपनी बहुत सी समस्याएं हैं जो बच्चों की शिक्षण प्रक्रिया में उनके सहभागी बनने के मार्ग में बाधक है और इन्हीं में से एक समस्या है - संकोच और जानकारी का अभाव। बहुत से अभिभावकों को यह जानकारी ही नहीं होती कि उनके बच्चों की शिक्षा में उनकी कितनी महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्हें लगता है कि शिक्षा देने का काम तो सिर्फ शिक्षक और विद्यालय से जुड़ा है। 
इसलिए मैंने अभिभावकों को बच्चों और विद्यालय से जोड़ने के लिए एक योजना बनाई ताकि वह सहजता से अपना जुड़ाव बच्चों की शिक्षा में महसूस कर सकें। इस योजना के अंतर्गत विद्यालय में अभिभावकों द्वारा बच्चों को कहानी सुनाया जाना था। शुरुआत से पहले मुझे लगा कि यह पहल आसान होगी परन्तु व्यवहार में ऐसा नहीं था। कई अभिभावकों से उनकी अपनी पसंद और भाषा के अनुरूप कक्षा 1 एवं 2 के बच्चों को विद्यालय में आकर मात्र एक कहानी सुनाने का अनुरोध किया पर वो तैयार नही हुए। उनके अंदर संकोच तो था ही, साथ ही उन्हें यह विश्वास भी नहीं था कि उनके द्वारा बच्चों को कुछ लाभ मिल सकेगा। खैर प्रयास जारी रखा और अपनी बातों से दो अभिभावक को तैयार कर सकी। काफी इंतजार के बाद एक अभिभावक आए।
देखकर मन प्रसन्न हो गया। तुरंत उन्हें धन्यवाद देते हुए कुर्सी पर बिठाया और मैंने बच्चों से ही उनका परिचय पुछा। तब उनके पड़ोस में रहने वाले बच्चों ने उनके पोते-पोतियों जो कि पहली-दूसरी कक्षा में पढ़ते है,उनका नाम लेकर जोर से कहा कि यह तो साक्षी और आशीष के दादा जी है। फिर साक्षी जो कि कक्षा -1 की छात्रा है और आशीष जो कि कक्षा -2 का छात्र है, दोनों को खड़ा कर पुछा गया कि बताओ यह कौन है तो दोनों खुश हो कर बोले कि ये मेरे दादाजी है। फिर मैंने दोनों बच्चों का नाम जोड़ते हुए परिचय दिया कि ये साक्षी और आशीष के दादा जी श्री राम कृपाल सहनी है और आज ये आपलोगों को एक कहानी सुनाने आएं हैं। क्या आप लोग कहानी सुनोगे इनसे…सभी बच्चे खुशी से चिल्लाकर बोले, जी दीदी। फिर अभिभावक ने अपनी भाषा में अपने मन से एक कहानी सुनाई। कहानी सुनाने के दौरान वो थोड़ी सी असहजता महसूस कर रहे थे पर शायद यह पहली बार था इसलिए ऐसा था। खैर बच्चों ने कहानी सुनी और तालियां भी बजाईं। अभिभावक के साथ हमने उनके परिवार के बच्चों की तस्वीरें भी ली ताकि अभिभावक और बच्चे दोनों ही विशेष महसूस कर सकें। अभिभावक के प्रति कृतज्ञता का भाव प्रकट कर धन्यवाद देते हुए उन्हें कक्षा से विदा किया। साथ ही प्रतिदिन या यथासंभव बच्चों को घर पर कहानी सुनाने या विद्यालय से जुड़े बच्चों के अनुभव पर बातचीत करने का अनुरोध किया जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया। 
अब बारी बच्चों का फीडबैक जानने की थी। वो दोनों बच्चे बहुत खुश थे कि उनके दादाजी ने कहानी सुनाई। अब मैंने बच्चों के माध्यम से ही अभिभावकों को विद्यालय से जोड़ने के लिए एक सवाल किया कि अब बताओ कल अपने दादा जी या दादी या फिर माता-पिता में से कौन, किसे बुलाकर लाएगा कहानी सुनाने को। कुछ बच्चों ने आवाज लगाई और कुछ मौन रहे।सब की अपनी-अपनी समस्याएं थी जिसमें से एक समस्या यह भी थी कि एक बच्चे ने बताया कि उसकी मां विद्यालय में नही आ सकती क्योंकि अभी तक वह कनिया (ग्रामीण क्षेत्रों में बहुओं को सार्वजनिक जीवन में भाग लेने के मौकों पर एक अप्रत्यक्ष प्रतिबंध होता है इसलिए बच्चा यहां ‘कनिया’ शब्द का प्रयोग कर रहा है जो कि नवविवाहिता के लिए उपयोग में लाया जाने वाला आंचलिक शब्द है) है और अभी तक वह गांव के भोज में भी सम्मिलित नही होती, इसलिए वह विद्यालय में नही आ सकती। खैर, मैंने बच्चे को आश्वासन दिया कि वह परेशान ना हो,उसकी मां से मिलकर स्वयं बात करुंगी।

अगले दिन कक्षा-1 के छात्र आयुष की दादी ने बच्चों को कहानी सुनायी और साथ ही अच्छी आदतों के संबंध में भी बच्चों से बात की। फिर हमने आयुष की तस्वीर उसकी दादी के साथ ली। दोनों बहुत खुश हुए। फिर यह क्रम चल पड़ा। 
अगर हमें बच्चों की शिक्षा में परिवार/अभिभावक/समुदाय की सहभागिता सुनिश्चित करनी है तो इस तरह के कई और
छोटे-छोटे प्रयास करने होंगे ताकि अभिभावकों के अंदर यह आत्मविश्वास आ सके कि वह भी बच्चों के सीखने में योगदान दे सकते हैं। इसलिए हम कह सकते हैं कि बच्चे के साथ-साथ अभिभावकों को भी निपुण करने की जिम्मेदारी हम शिक्षकों को निभानी होगी। अपने इस प्रयास का एक लिखित डाक्यूमेंट भी तैयार कर रही हूं जिसमें कि अभिभावक का नाम, कहानी सुनाने की तिथि, विद्यालय में पढ़ रहे उनके परिवार के बच्चों के नाम,कक्षा व क्रमांक तथा अभिभावक के हस्ताक्षर सम्मिलित हैं। 
सच कहूं तो एनसीएफ हो या बीसीएफ या फिर कोई अन्य डाक्यूमेंट्स जो शिक्षा में परिवार/समुदाय की भूमिका पर बल देते हैं, को अब व्यावहारिक रूप में लागू करने की आवश्यकता है और यह कार्य शिक्षक बखूबी कर सकते हैं।
चूंकि, मुझे राज्य के शिक्षकों के लिए निर्मित हैंडबुक शिक्षक संदर्शिका में शिक्षा में अभिभावकों की सहभागिता सुनिश्चित करवाने के संबंध में बतौर लेखक लेखन कार्य का अवसर मिला था जिसमें हमनें अपने राज्य की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए परिवार की भागीदारी के महत्व और इसे किस प्रकार व्यवहारिक रूप में लागू करें,को स्पष्ट रूप से लिखा है जिससे कि अभिभावकों की सहभागिता के संबंध में बहुत से विकल्प मिलते हैं। अतः अनुरोध है कि सभी शिक्षक इस डाक्यूमेंट को भी अवश्य पढ़ें और विद्यालय के अभिभावकों को बच्चों की शिक्षा में भागीदार बनने में निपुण बनाएं ताकि हम कह सके कि निपुण अभिभावक के साथ अब हर बच्चा निपुण बनेगा।

प्रियंका कुमारी, शिक्षिका
मध्य विद्यालय मलहाटोल, परिहार, सीतामढ़ी
संपर्क - pkjha2209@gmail.com

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