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Showing posts from April, 2025

मुझे पढ़ना है माँ

मुझे पढ़ना है माँ ------------------- वैशाख चला-चली पर है  आलू कोड़े जा चुके खेतों से आम के टिकौलों में कोशा लगे  गेहूं की कटनी भी पूरी हुई  घर से स्कूल की दूरी भी  कम हो गई मां, चलो न, लिखवा दो  मेरा नाम स्कूल में  लिखवा दो न मां  नाम मेरा स्कूल में हंसिया-खुरपी की जगह थमा दो हाथ में किताब-कलम। मां, मुझे देखनी है  दुनिया की खूबसूरती मेरी आंखों में क्यों रहें  बस खेतों से उड़ती धूल ही! मां, मुझे सालती है  तुम्हारे हाथ के छाले  नहीं चाहती इन्हें  अपनी हथेलियों में भी।  मुझे बेधती है मां,  तुम्हारी स्थिति हर छोटी बात में  पिता पर निर्भरता घर की देहरी में  सिमटी तुम्हारी दुनिया!  मुझे पढ़ना है माँ, आगे बढ़ना है… ख्वाबों की उड़ान भरनी है, छूना है अपने हिस्से का आसमान…! मुझे दुनिया देखनी है मां  नजरें चुरानी-झुकानी नहीं  अपने पैरों पर खड़ा होना है  कामयाबी के झंडे गाड़ने हैं  चलो ना मां लिखवा दो न  नाम मेरा स्कूल में...।।  © प्रियंका प्रियदर्शिनी (प्रियंका कुमारी)✍️ मध्य विद्याल...

मुखौटा

मुखौटा  *********** भावनाओं के जंगल में घात लगाए बैठे हैं एक से बढ़कर एक  कई चतुर शिकारी…! पास उनके न तीर हैं, न धनुष, बस शब्दों की धार है और मुखौटों की भरमार…! सादगी से भरी मुस्कराहट इनकी  बिछाते है  भरोसे का मायाजाल , पर समय के साथ  धीरे-धीरे टूटता है भ्रम…! और तब समझ आता है शिकारी अब वनों में नहीं,  हमारे बीच बसते हैं,  हमारी ही भाषा में बोलते है…! हर दिन वो करते हैं एक नया शिकार- कभी आस्थाओं का, कभी भावनाओं का, तो कभी आत्मा के मौन आक्रोश का। चकाचौंध की इस अंधी दौड़ में इंसानियत पीछे छूट रही, अब भूख रोटी की नहीं, पहचान छीन लेने की है। वो सब कुछ हथिया लेते हैं, सपने, विश्वास, मौन तक और फिर भी कहते हैं हम तो खाली हाथ हैं…! शून्यता का ऐसा अभिनय कर सकते हैं सिर्फ वही  जो भीतर तक भरे हैं लोभ से, और बाहर से ओढ़े हो  बनावटी आवरण। अब समय है आत्मावलोकन का, जहां हम सवाल करें  क्या हम वाक़ई संवेदनशील हैं या केवल दिखावे भर के सुहृदयी ...! ©प्रियंका प्रियदर्शिनी ✍️ प्रियंका कुमारी  मध्य विद्यालय मलहाटोल, परिहार  जिला -सीतामढी़, बिहार...

जरूरत

जरुरत... ************* किताबें बोझ बनती जा रही थी, जरूरत थी  सीखने को आनंददायी बनाने की। कक्षा में सवाल थम से गए थे, जरूरत थी  बच्चों को खुलकर पूछने की आजादी की । हर बच्चा तुलना में तौला जा रहा था, जरूरत थी  हर बच्चे के हुनर को अपनाने की। गलतियों पर डांट मिलती थी, जरूरत थी  गलतियों से सीखने के मौके देने की। कुछ बच्चे पीछे रह जाते थे, जरूरत थी  उन सभी को साथ लेकर चलने की। सपनों को हकीकत समझा नहीं जाता था, जरूरत थी  कोशिश व उम्मीद की बात करने की। हर बच्चा खास है, ये भुलाया जा रहा था, जरूरत थी  उनकी खासियत को पहचानने की। क्यों न पूरी करें हर जरूरत  बच्चों की, बात करें उनकी आज़ादी की जो पीछे छूटे हैं उनके खुलने दें पंख उड़ने दें आसमान में एकदम उन्मुक्त... यही तो कहती है नीति अपनी नई शिक्षा की।। ©प्रियंका कुमारी, शिक्षिका  मध्य विद्यालय मलहाटोल, परिहार  जिला -सीतामढी़, बिहार। ईमेल - pkjha2209@gmail.com

Integrating Art into Early Learning

Integrating Art into Early Learning: A Pathway to Holistic Development Art activities such as painting and drawing are not merely creative expressions but serve as powerful tools for early childhood development. These activities significantly contribute to the enhancement of fine motor skills, while simultaneously fostering concentration, patience, and focus among young learners. In my observation, two particularly energetic and restless students, Lalit and Anushka, exhibited an extraordinary level of attentiveness and calm when engaged in a painting activity. This moment reaffirmed the transformative potential of art-based learning in foundational years. It was heartening to witness how the simple act of painting could create such a shift in behavior and engagement. For educators and parents alike, integrating art into daily learning routines can yield positive and measurable outcomes. Not only does it support neuromuscular coordination and fine motor development, but it ...

नये शैक्षणिक सत्र का पहला दिवस

आज नये शैक्षणिक सत्र 2025-26 का पहला दिवस है। आज भी समय से 15 मिनट पूर्व विद्यालय आ पहुंची। सुबह जल्दी निकलने के कारण कुछ खाने का मौका नही मिल पाता है इसलिए दोपहर के लंच से ही दो-चार निवाले जल्दी-जल्दी बच्चों के आने से पूर्व गटक लिया। समयानुसार धीरे-धीरे सभी शिक्षक और बच्चे भी आए। सफाई,चेतना सत्र हुए और फिर सबने अपनी-अपनी कक्षा के रजिस्टर उठाए। मैंने भी अपनी कक्षा के रजिस्टर को लिया और उसके ऊपर जानकारी दर्ज की यथा विद्यालय का नाम,कक्षा,सत्र आदि। कुछ समय बीत गये पर कोई भी नामांकन के लिए नही आया था। चूंकि मैं आश्वस्त थी कि शिक्षक -अभिभावक संगोष्ठी में हमने नामांकन संबंधी जानकारी साझा की थी तो अभिभावक आएंगे ही। मैं ज्यादा इंतजार के मूड में नहीं थी इसलिए सभी कक्षा में जाकर जानकारी ली कि क्या किसी को अपने भाई-बहनों का नाम लिखवाना है विद्यालय में। पता चला कि कुछ बच्चे अपने भाई - बहन को साथ लेकर आए हैं। मैंने तुरंत उन बच्चों को कहा कि माता या पिता में से किसी को भी बुला कर ले आइए और साथ में आधार कार्ड एवं मोबाइल नम्बर भी लेते आना है। बच्चे भी मेरे ही जितना उत्सुक थे इसलिए तुरंत अप...