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Showing posts from April, 2023

जानकी की प्रासंगिकता वर्तमान संदर्भ में।

सीता आज भी प्रासंगिक हैं / जानकी की प्रासंगिकता वर्तमान संदर्भ में। ************************************************ जनक नंदिनी सीता आदर्श की प्रतिमूर्ति हैं। वो एक आदर्श पुत्री,पत्नी, बहू, मां और स्वाभिमान से भरपूर ममतामयी नारी थी। सीता की सहनशीलता और क्षमाशीलता अपने आप में एक दुर्लभ संयोग है।  हम सभी भाग्यशाली हैं कि मां सीता की जन्मस्थली सीतामढ़ी से हम जन्मभूमि या कर्मभूमि के रूप में जुड़े हुए हैं। बतौर स्त्री मैं स्वयं को गौरवान्वित महसूस करती हूं कि मैं सीतामढ़ी वासी हूं और मेरा जन्म इस पावन भूमि पर हुआ है। एक पुत्री के रूप में सीता ने उन सभी संस्कारों को बखूबी ग्रहण किया जिससे वो पुत्री के रूप में भी जगत के लिए पूजनीय और उदाहरण स्वरूपा हैं। मैंने सीता के सहनशील व्यक्तित्व से प्रभावित होकर एक मुक्तक लिखी थी जो इस प्रकार है - कभी कभी सोचती हूं कि इतनी सहनशक्ति कहां से आई मुझमें, फिर याद आया कि मैंने जन्म लिया उस पावनभूमि पर जहां माँ सीता अवतरित हुईं और सहनशीलता का दूसरा नाम तो सिया ही है! सही कहा ना...!! देवी सीता को सहनशक्ति का उदाहरण कहने के पीछे मेरा अर्थ उस समय ...

निपुण बिहार कविता

निपुण बिहार की निपुण कहानी, आओ सुनाएं सीतामढ़ी की जुबानी। दिन था वो 05 सितंबर 2022  जब लांच हुआ मिशन निपुण बिहार । कक्षा -3 तक के बच्चें होंगे दक्ष  समझ के साथ पढ़ने में। एफ एल एन के लक्ष्यों की प्राप्ति  करनी है वर्ष 2026-27 तक। आओ जानें सबसे पहले  एफ एल एन का पूरा नाम। बुनियादी साक्षरता और संख्या ज्ञान  हैं इसका पूरा नाम। एफ एल एन के लक्ष्यों से बनता है  हर बच्चा निपुण। खेल- खेल में मिलता है अक्षर और संख्या का ज्ञान। चहक की 140 गतिविधियां विद्यालय में लाई हैं खुशियां। एफ एल एन का किट हैं बच्चों के लिए सुपर हिट। रंग -बिरंगी और आकर्षक  बच्चों को मिली है वर्क बुक। समझ के साथ पढ़ना हैं जीवन में आगे बढ़ना हैं। नये सत्र में आ रही है शिक्षक संदर्शिका जो बनेगी हम सबकी मार्गदर्शिका। माता - पिता हो या शिक्षा समिति सदस्य हैं निपुण बनाना सबका लक्ष्य । बच्चों की शिक्षा में अब तय हुई  जन समुदाय की भी भागीदारी । आओ हम सब मिलकर उठाएं मिशन निपुण बिहार की जिम्मेदारी। निपुण बनेगा बिहार हमारा, निपुण बनेगा सीतामढ़ी हमारा। ©® प्रियंका कुमारी मध्य विद्यालय...

गोरों की फौज

बात उस समय की है जब देश आजाद नही था। हर जगह गोरों (अंग्रेजों) का बड़ा आंतक था। जब भी वो किसी गांव से गुजरते तो वहां अफ़रा-तफ़री का माहौल बन जाता। ऐसे ही एक दिन गोरों की फौज जानकी नामक गांव में घुस गई। चारों ओर हड़कंप सी मच गई। औरत -मर्द सभी इधर उधर छिपने के लिए दौड़ पड़े। अपने -अपने दरवाजों से बैल और अन्य पालतू पशुओं को खोल दिया। इसी क्रम में गांव के दो स्वतंत्रता सेनानी भी पूरब से सटे खेतों में छिप गए।वे दोनों एक ही खेत में छुपे थे ,यह बात उन दोनों को नहीं पता थीं। अचानक से खेतों में कुछ खड़खड़ाहट सी महसूस हुई। दोनों के ही कान चौकन्ने हो गए। घुटनों व केहुनी के बल वे रेंगते हुए खुद को छिपाने के प्रयास में लगे रहे। अचानक से फिर आवाज आनी बंद हो गई। थोड़ा इंतजार कर फिर से वो दोनों खेतों से निकलने की कोशिश की कि फिर से खेतों में हलचल सी महसूस हुई।अब फिर से विपरीत दिशाओं में घुटनों और कोहनियों के बल वो रेंगने लगे।  इस‌ तरह रेंगते और छिपते हुए लगभग आधे घंटे से अधिक होने को थे। फिर अचानक से शंभू ने सोचा कि थोड़ा गर्दन उठाकर देखा जाए क्योंकि अगर अंग्रेज़ होते तो अभी तक पकड़ लिए होते। ठीक क...