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सीतामढ़ी का अभिनव नवाचार "फोक टीएलएम" : मिट्टी एवं पत्थर से बनी खेल गतिविधि आधारित शिक्षण अधिगम सामग्री

नई शिक्षा नीति 2020 में गतिविधि आधारित शिक्षण,स्थानीय संसाधनों के उपयोग एवं खिलौना आधारित शिक्षाशास्त्रीय पहलुओं पर विशेष बल दिया गया है ताकि बच्चे बिना किसी दबाव के अपने परिवेश में सीख सकें। खासकर जब बात बुनियादी कक्षाओं के बच्चों की शिक्षा की हो तब यह बातें और आवश्यक हो जाती है।कक्षा-3 तक के बच्चों में बुनियादी साक्षरता एवं संख्या ज्ञान के सृदृढी़करण हेतु निपुण भारत मिशन जैसे व्यापक एवं महत्वाकांक्षी कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं ताकि बच्चे समझ के साथ सीख सकें। इस क्रम में विभिन्न स्तरों पर सरकारों,शिक्षण संस्थानों एवं शिक्षकों द्वारा भी नित नए प्रयास किए जा रहे हैं। ऐसा ही कुछ प्रयास मैंने भी अपनी कक्षा के बच्चों के लिए किया जो आज शिक्षा जगत के लिए एक अनुकरणीय उदाहरण बन गया। 
कुछ वर्ष पूर्व कक्षा में जब मैंने बच्चों को कंचे की गोली से खेलने के लिए झगड़ते देखा और इस बात की शिकायत बच्चों से मुझ तक पहुंची वहीं मुझे मिट्टी की गोलियां बनाने की प्रेरणा दे गया। बच्चों को कंचे के आकार की 5 मिट्टी की गोलियां बनाने का होमवर्क दिया। कल हो कर सभी मिट्टी की सुंदर गोल-गोल गोलियां बना कर ले आएं। मैंने भी कुछ गोलियां बनाई और इस तरह से हमारे पास डेढ़ सौ के करीब में गोलियां हो गई थी। अब हम इन गोलियों को बच्चों की मदद से रंग कर इसका उपयोग बच्चों को गिनती, जोड़ एवं घटाव की क्रिया के लिए करने लगे। बच्चों को मिट्टी की इन रंग-बिरंगी गोलियों के साथ सीखने में बहुत मजा आने लगा। एक दिन कक्षा के सभी बच्चे जब वर्क बुक में काम कर रहे थे उसी दौरान मेरी नजर नंदिनी नाम की एक बच्ची पर पड़ी जो वर्क बुक में गलत विकल्प पर निशान लगाए हुए थी। उसकी वर्क बुक में कुछ वस्तुओं का चित्र दिया हुआ था और चित्र के ठीक सामने उसकी संख्या का तीन विकल्प दिया गया था जिसमें से एक सही विकल्प पर गोल घेरा लगाया जाना था पर वह चित्र की सही गिनती कर 5 के स्थान पर 7 के विकल्प पर गोल घेरा लगा रही थी। बार-बार गिनती करवाने के बाद भी वह मात्रात्मक एवं प्रतीकात्मक रूप में संबंध नहीं जोड़ पा रही थी। अचानक से मन में एक विचार आया और मैंने उसे मौखिक रूप से बताने के स्थान पर फर्श पर 1 से 10 तक की संख्या लिखी और ठीक संख्या के दोनों तरफ गोल -गोल घेरा बनाया और एक तरफ के घेरे में मिट्टी की सादी गोलियां और एक तरफ के घेरे में मिट्टी की रंगीन गोलियां रखी। प्रत्येक संख्या के सामने उतनी ही मात्रा में गोलियां रखी गई। अब नंदिनी को गिनने के लिए कहा। नंदिनी हाथ में अपनी काॅपी -पेंसिल दबाएं गिनती करने लगी। चूंकि मैंने फर्श पर लिखने से पहले नंदिनी से काॅपी पर दस तक की गिनती लिखवाई थी और मौखिक रूप से भी उससे पढ़वाया था जिसमें कि वो सफल रही थी इसलिए यह चिंताजनक था कि वह वर्कबुक में इस कार्य को सही तरीके से संपादित क्यों नहीं कर पा रही है।
अब,जब नंदिनी फर्श पर लिखे संख्या के ठीक सामने वाले मिट्टी की गोलियां गिन कर अपनी काॅपी में नोट कर रही थी तो मुझे यह देखकर तसल्ली मिली कि वो अब ठोस रूप में वस्तुओं को गिन कर उसके प्रतीक के साथ सह-संबंध विकसित कर पा रही है। मिट्टी की गोलियों से गिनती करने के बाद जब वह वर्क बुक में काम करने गई तब मैंने देखा कि अब वह सही विकल्प पर गोल घेरा लगा रही है। यह देखकर मुझे संतुष्टि तो हुई परंतु मन में एक सवाल कौंधा कि कहीं यह समस्या अन्य बच्चों में भी तो नही है। चूंकि नंदिनी को बहुत ही सुंदर ढंग से गिनती लिखने और बोलना आता था पर उसकी समझ उसके अंदर नही थी,वह क्रमिक रूप में सारी चीजों को पहचान रही थी परंतु अव्यवस्थित क्रम में वह बिल्कुल भी पहचान कर पाने में असक्षम थी जिसका प्रत्यक्ष परिणाम था कि वह बार-बार गलत विकल्प में निशान लगा रही थी। मैंने उसी दिन बाकी बच्चों की भी जांच की तो मैं जानकार दंग रह गई कि अव्यवस्थित क्रम में ना पहचान पाने की चुनौती सिर्फ नंदिनी में ही नहीं बल्कि और भी कई बच्चों में थी। मुझे महसूस हुआ कि बच्चों के शिक्षण के तरीके में कहीं न कहीं भारी चूक हो रही है जिस पर कार्य करने की आवश्यकता है। ना सिर्फ गणित में बल्कि भाषा में भी यही हाल था कि बच्चे अक्षरों की पहचान भी क्रमिक रूप में ही कर पाने में सक्षम में थे। 
और बस इसी समस्या से शुरुआत होती है मेरे नवाचार की जिसे आज फोक टीएलएम के नाम से जाना जाता है। मैंने बच्चों की इस समस्या को खेल-खेल में बिना किसी दबाव के कैसे हल किया जाए और उनकी स्थायी स्मृति विकसित की जाए इसके लिए विचार-मंथन करना शुरू किया। इसी क्रम में एक दिन अचानक मिट्टी की गोलियां बनाने के समय मैंने एक पासा बना डाला और वो पासा इतना खूबसूरत था कि वो लूडो के पासे की तरह लुढ़कता। मैंने कुछ और पासे बनाए और उसे धूप में सूखने के लिए छोड़ दिया। कल हो कर रविवारीय अवकाश था और घर पर हाल ही में पेंट का कार्य भी हुआ था जिसमें एक कमरे की सफाई नही होने के कारण वाॅल पुट्टी का धूल नीचे ही गिरा था। मैंने उसे समेटा और उसे पानी में मिलाकर कुछ और पासे बनाएं। सूखने के बाद फिर उसे कलर किया और कल हो कर विद्यालय ले गई। रास्ते भर उसे कैसे प्रयोग करूं यही मन में चलता रहा। विद्यालय आकर अचानक मन में ख्याल आया और मैंने एक सादे पन्ने पर अंग्रेजी के अक्षरों को अव्यवस्थित क्रम में लिखा और पासे पर अंग्रेजी के अक्षर। बच्चे कौतहूल वश भीड़ लगाएं देख रहे थे कि मैं क्या कर रही। अब बारी थी परीक्षण की, इसलिए सबसे पहले मैंने खुद ही धीरे से पासा उछाला और मेरे बोलने से पहले ही बच्चे बोल पड़े A…मैंने पासे को उठाकर A वाले बाॅक्स में रख दिया और उसके बाद एक बच्ची के हाथ में पासे दे कर बोली कि अब तुम उछालकर देखो कि क्या आता है? बच्ची खुशी से पासा हाथ में लेते हुए उछालती है और पासे के उपर आता है D । मैं ऊंची आवाज में D का नाम लेते हुए पासे को उठाकर D वाले बाॅक्स में रख देती हूं। अब तो बच्चों में होड़ मच गई कि मुझे भी खेलना है। मैंने बच्चों को बारी-बारी से अवसर दिया और बच्चे पासे उछालते,अक्षर का नाम लेते और अक्षर को संबंधित बाॅक्स में ढूंढकर पासे को रखते जा रहे थे। इस तरह बच्चे एक साथ बार-बार अक्षरों की पहचान और उसकी ध्वनि में संबंध में जोड़ कर उसे संबंधित बाॅक्स में रख रहे थे। यह काफी मजेदार था पर एक साथ सभी बच्चों के लिए एक ही पेपर और पासे पर खेलना रुचि को खो देने जैसा था इसलिए चार से पांच बच्चों का एक -एक समूह बनाया गया और सभी समूह को एक -एक मिट्टी के पासे और पेपर पर बने अक्षर ग्रिड दिए गए। कोशिश यह रही की सभी समूह में एक बच्चा ऐसा जरूर हो जो सभी अक्षरों की पहचान करना जान रहे है। अब बच्चों ने पासे से खेलना शुरू किया और इसके परिणाम सही में बहुत ही आश्चर्यजनक थे। बच्चे खेल-खेल में अक्षरों की पहचान अव्यवस्थित क्रम में करना सीख रहें थे। इसी पैटर्न पर मैंने हिंदी के अक्षरों, गणितीय अंकों एवं आकृतियों की पहचान के लिए खेल गतिविधियों का निर्माण किया। अब बच्चे सिर्फ पासे की मदद से हिंदी, अंग्रेजी के अक्षर और गणितीय आकृति एवं अंक की पहचान करने लगे थे। इसे थोड़ा और मजेदार और स्थायी बनाने के लिए हमनें मिट्टी की बुनियादी गणितीय आकृतियां और कागज के छोटे-छोटे पर्ची जिसपर हिंदी एवं अंग्रेजी के अक्षर लिखे होते थे उसका प्रयोग करना शुरू किया। इसने इस खेल गतिविधि को और प्रभावकारी बना दिया। अब बच्चे इस खेल गतिविधि के दौरान पासे उछालते और संबंधित अक्षर/अंक की पर्ची या मिट्टी की आकृति उठाकर संबंधित ग्रिड बाॅक्स में ढूंढकर रखते।
चूंकि अब तक बच्चे सिर्फ पासे पर देखकर संबंधित अक्षर या अंक या आकृति की पहचान ध्वनि के साथ कर रहे थे परंतु क्या वह वाकई में उन अंकों या संख्या की समझ रख पा रहे हैं,इसकी जांच भी जरूरी थी। इसके लिए हमनें मिट्टी की गोल-गोल टिकिया बनाई और मिट्टी के कुछ पासे बनाएं जिसमें कुछ पर फूल और कुछ पर डाॅटस बने थे। मिट्टी की टिकिया से हमनें बच्चों में संख्या की समझ मात्रात्मक एवं प्रतीकात्मक दोनों रुप में एक साथ देने की कोशिश की, क्योंकि मिट्टी की इस टिकिया में हमने एक तरफ डाॅटस और एक तरफ संबंधित अंक लिखा था जिससे कि बच्चे एक तरफ डाॅटस को गिनते और दूसरी तरफ पलटकर समझ पाते कि हमनें जितनी गिनती की उसे लिखा कैसे जाता है और वो देखने में होता कैसा है। इसी प्रकार पासे पर जौ फूल या डाॅटस बने हैं उसे उछाल कर अंक ग्रिड में संबंधित बाॅक्स में रखा जाता जिससे कि सुनिश्चित हुआ जा सके कि बच्चे ने संख्या की समझ मात्रात्मक एवं प्रतीकात्मक रूप में प्राप्त कर लिया है। उदाहरण के लिए अगर अंक ग्रिड में पासे उछालने के बाद 4 फूल या डाॅटस आए हैं और उस पासे को उठाकर सीधे तौर पर 4 वाले बाॅक्स में रख दिया जाता है तो यह बच्चे की समझ को सुनिश्चित करता है। इस प्रकार बच्चों की समझ के साथ सीखने की प्रक्रिया को भी जांचा-परखा जाता रहा। इसी प्रकार इन पासे की मदद से जोड़ एवं घटाव की खेल गतिविधियों को भी बड़े ही रुचिकर तरीके से संपादित किया जाने लगा। बच्चे तीन पासे एक साथ उछालते जिसमें दो पासे पर अंक लिखे होते और एक पासे पर जोड़ -घटाव के गणितीय चिन्ह्। अब जो भी चिन्ह् आता उसके अनुरूप बच्चे उतनी ही मिट्टी की गोलियां लेकर खेल-खेल में जोड़ -घटाव की संक्रिया करते। बच्चे खेल-खेल में सीख रहे थे और मैं नित नए-नए अवधारणाओं को मिट्टी से बनी सामग्री से जोड़ने की कोशिश करने लगी, क्योंकि मिट्टी मेरे परिवेश में आसानी से उपलब्ध एक प्राकृतिक संसाधन था। मिट्टी से हमने कई और चीजें भी बनाई जैसे -गणित माला,दहाई माला, विभिन्न देशों के झंडे, विभिन्न खिलौने वाली आकृतियां आदि। इन सबका प्रयोग हमनें भाषा,गणित और पर्यावरण के लिए किया। खासकर गणित के लिए यह सार्वधिक उपयोगी रहा क्योंकि एक पूरा पैकेज तैयार हो गया था जिसके माध्यम से बुनियादी कक्षाओं के लिए बिना पुस्तक के भी सभी अवधारणाओं का विकास खेल-खेल में किया जा सकता था।
शुरुआती कुछ महीनों तक हमनें मिट्टी पर ही कार्य किया था पत्थर के प्रयोग की बात दिमाग में नही थी। पर एक दिन साक्षी नाम की एक बच्ची ने खेल के दौरान अपने भाई से गुस्से के कारण पासे को उठाकर जोर से पटक दिया जिससे वह पासा थोड़ा टूट गया। चूंकि पासे चिकनी मिट्टी से बनाएं गए थे जिसके कारण वह जल्दी गिरने पर भी टूटते नही थे पर इस बार गुस्से में फेंके जाने के कारण वह कुछ टूट गया। बच्चों ने आकर शिकायत की इस बात की। कुछ पल के लिए मेरे अंदर उस पासे को देखकर अफसोस हुआ पर साथ ही मन में एक भावना घर कर गई कि पासे तो फिर भी मजबूत होते हैं पर बाकी चीजें जैसे -गोलियां, टिकिया, आकृतियां आदि भी तो आसानी से टूट सकते हैं। इस दिशा में कुछ सोचना होगा ताकि बच्चों से अगर गलती से भी मिट्टी से बनी सामग्री गिर जाएं या टूट जाएं तो उन्हें अफसोस नही हो। उन्हीं दिनों विद्यालय में कुछ निर्माण कार्य चल रहा था और विद्यालय के मैदान में बालू एवं गिट्टी रखें हुए थे। लंच ब्रेक में बच्चों को बालू के पास पत्थर से गोटी-गोटी वाला खेल खेलते हुए देखकर अचानक ही मन में कुछ सूझा। मैंने बालू से कुछ पत्थर सबकी नजर से बचते हुए चुना और अपनी कक्षा में आ गई। पत्थरों का आकार अलग-अलग था और मैं गौर से उन्हें देखे जा रही थी कि इससे क्या-क्या किया जा सकता है। अचानक से बच्चों के शोर ने मेरी तंद्रा तोड़ी, क्योंकि वो जानना चाह रहे थे कि मैंने यह पत्थर अपने पास क्यों रखा है, मैं कुछ बोलती उससे पहले ही एक बच्ची उस पत्थर से मेरे सामने ही गोटी उछालने वाला खेल खेलने लगी। तो वही दूसरी बच्ची उसके हाथ से पत्थर लेकर गिनते हुए मेरी ओर बढ़ाने लगी….अब मैं स्पष्ट हो चुकी थी कि मुझे क्या करना है क्योंकि हर बार की तरह बच्चों ने मुझे मेरी अंतर्दृष्टि दे दी थी। बच्चों के छुट्टी के बाद मैंने बालू से पत्थर चुनने शुरू किए। सभी मेरी इस हरकत पर नाक-भौंह सिकोड़ रहे थे कि मैं क्या कर रही। कल हो कर बच्चों के आने पर मैंने जब उन्हें एक एक कागज की पर्ची पर अंक लिख कर दिए और उसके चारों ओर उतनी ही मात्रा में पत्थर सजाने को कहा तो बच्चों ने बहुत ही चाव के साथ यह गतिविधि की। अब बच्चों को मैंने गिनती करने के साथ -साथ अलग-अलग फूल या आकृति या अंक बनाने के लिए भी कहा तो बच्चों ने मजे के साथ करना शुरू किया। अब मुझे इन पत्थरों का प्रयोग समझ आ गया था कि मुझे इसे व्यापक संदर्भ में कैसे इसका प्रयोग करना है। मैंने पुनः पत्थर चुनना शुरू किया। अब मेरे अंदर कोई संकोच नहीं था इसलिए अब मुझे राह चलते हुए भी जहां बालू दिख जाता वहां से मैं अपनी आवश्यकता अनुसार पत्थरों को चुन लेती और विद्यालय ले आती। एक दिन एक राजमिस्त्री मेरी कक्षा में अपना कार्य छोड़कर सिर्फ यह जानने आया कि मैं आखिरी इन पत्थरों का क्या करती हूं। जब मैंने उसे बिठाकर बच्चों के बीच पत्थरों का उपयोग कर दिखाया तो उसने दोनों हाथों को जोड़कर कहा कि आप के जैसा शिक्षक अगर मेरे गांव में होते तो मैं अपने बच्चे को प्राइवेट विद्यालय से नाम कटवाकर सरकारी में लिखा देता….इतना कहकर वह वापस अपने कार्य पर चले गए।पर एक अभिभावक के रूप में उनके हृदय के भाव ने मुझे इस दिशा में और अधिक कार्य करने की प्रेरणा दे दी। अब मैं पत्थरों को भी रंग कर उन्हें आकर्षक बना कर उससे गिनती, जोड़ -घटाव, पैटर्न की समझ, वर्गीकरण आदि की समझ बच्चों में विकसित करने में प्रयोग करने लगी। 
अपने मिट्टी और पत्थर से बने इस खेल गतिविधि आधारित शिक्षण अधिगम सामग्री से बच्चों को सीखते हुए देखकर मैं बहुत संतुष्ट महसूस कर रही थी,इसी दौरान जब अपने जिले के साथी शिक्षकों से मैंने अपने अनुभव को साझा किया तब वो भी बहुत प्रसन्न हुए। 
इसी क्रम में बाद के दिनों में एक बार जब मैं सेवाकालीन प्रशिक्षण के लिए दूसरे जिले के डायट में पांच दिवसीय आवासीय प्रशिक्षण के लिए गयी तो वहां अगली सुबह मैंने देखा कि उस कैम्पस में एक बड़ा वृक्ष और उसके चारों ओर पक्का चबूतरा बना था जिस पर पहली से पांचवीं कक्षा तक के बच्चों को एक निजी ट्यूटर पढ़ा रहे थे। उत्सुकतावश मैं वहां पहुंच गई और शिक्षक से जानकारी ली कि यह बच्चे कहां पढ़ते हैं और किन कक्षाओं में है। पता चला कि सभी सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं और वो सुबह-सुबह यहां बच्चों को ट्यूशन पढ़ाते हैं। मैंने उनसे बच्चों से बातचीत करने की अनुमति ली जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार लिया। मैंने कुछ बच्चों से बात की और मुझे एक आश्चर्यजनक तथ्य देखने को मिला कि जिस समस्या से मेरे बच्चे जूझ रहे थे वहीं समस्या इन बच्चों के साथ भी हैं। चूंकि मेरी कक्षा में तो पहली कक्षा के छात्र थे पर यहां चौथी कक्षा के बच्चे भी अव्यवस्थित क्रम में अक्षरों की पहचान नहीं कर पा रहे थे। मैंने जब एक बच्ची की काॅपी में उसी के अक्षर में लिखा अल्फाबेट्स देख जिसे वह मौखिक रूप से तेजी से सुना पा रही थी परंतु जब ही मैंने P लेटर पर उंगली रखकर पूछा कि इसे क्या बोलते हैं तब वह ठिठक गई और उसे P का उच्चारण करने के लिए शुरू से पूरा लेटर्स पढना पड़ा तब जा कर वह P को P बोल सकी। मैंने शिक्षक से इस समस्या पर बात की और कहा कि मेरे यहां भी यह समस्या थी जिसके लिए हमनें मिट्टी से एक खेल गतिविधि का निर्माण किया है आप भी बच्चों के लिए आजमा कर देखें। मैंने उन्हें वह तरीका बताया पर अफसोस अपरिहार्य कारणों से प्रशिक्षण कार्यक्रम उसी दिन स्थगित हो गया और मैं अपने जिले में लौट आई। पर इस घटना ने मेरे अंदर बाकी विद्यालय के बच्चों की स्थिति के बारे में जानने के लिए प्रेरित किया। मैंने अपने संपर्क के शिक्षकों से वर्चुअल माध्यम से बात करना शुरू किया और उन्हें बच्चों का टेस्ट लेने को कहा। आश्चर्यजनक रूप से मुझे पता चला कि इस प्रकार की समस्या कमोबेश हर जगह है। मैंने अपने अनुभवों को गूगल मीट, फोन एवं व्यक्तिगत रूप से साझा कर शिक्षकों को इस दिशा में प्रेरित किया। 
मेरे टीएलएम की जानकारी जब कला संकाय के एक व्याख्याता जो कि उस समय एससीईआरटी बिहार में प्रतिनियुक्ति पर थे,को जब पता चली तब उन्होंने मुझे अपने मिट्टी एवं पत्थर से बनी शिक्षण अधिगम सामग्री को एक अच्छा सा नाम देने की ओर ध्यान आकर्षित करवाया। क्योंकि इन मिट्टी एवं पत्थर से बनी सामग्री से मैं कई प्रकार की अवधारणाओं का बच्चों में खेल-खेल में विकास कर रही थी। मुझे उनका यह सुझाव अच्छा लगा और कई नामों के डिस्कशन के बाद फोक टीएलएम नाम को मैंने अंतिम रूप से चयनित किया। चूंकि जो व्याख्याता थे उनका कहना हुआ कि मेरे टीएलएम पूरी तरह से गांव की मिट्टी की महक लिए जमीन से जुड़ी परंपराओं का वाहक हैं इसलिए फोक टीएलएम सबसे उचित नाम रहेगा। उन्ही दिनों CIET- NCERT ने सभी स्तर के बच्चों के लिए ई-कंटेट प्रतियोगिता का आनॅलाइन आयोजन जो कि प्रतिवर्ष होता है, किया था तो मैंने भी अपनी एक टीएलएम की प्रविष्टि डाल दी थी पर मेरा वीडियो आम दिनों में ऐसे ही बच्चों को गतिविधि करवाते हुए बनाया गया था जिसकी सांउड क्वालिटी भी अच्छी नही थी, प्रतियोगिता में लिस्टेड तो हो गई पर कोई स्थान नहीं प्राप्त कर सकी। पर इससे मुझे अपने टीएलएम के वीडियो कंटेंट बना कर लोगों के साथ साझा करने की अंतर्दृष्टि मिली। पर यह मेरा सौभाग्य रहा कि मेरे टीएलएम की उपयोगिता को देखते हुए एससीईआरटी बिहार के आईसीटी डिपार्टमेंट द्वारा मुझे अपने फोक टीएलएम की रिकार्डिंग के लिए फोन कर एवं विभागीय पत्र जारी कर आमंत्रित किया गया। पीएम ई विद्या कार्यक्रम के अंतर्गत बिहार को प्राप्त डीटीएच टीवी चैनल पर दस एपिसोड का प्रसारण किया गया और साथ ही यूट्यूब चैनल पर एक विशेष प्लेलिस्ट बनाई गई जिसके माध्यम से हजारों शिक्षकों ने इसके निर्माण एवं उपयोग की जानकारी प्राप्त की। बिहार दिवस-2025 के तीन दिवसीय भव्य समारोह में भी गांधी मैदान पटना में शिक्षा विभाग के निपुण बिहार स्टाॅल पर फोक टीएलएम की एक छोटी सी प्रदर्शनी लगाई गई जो बच्चों एवं शिक्षकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। बच्चों ने मिट्टी से फोक टीएलएम बनाने के प्रयास किए एवं शिक्षकों ने भी हैंड्स ऑन प्रैक्टिस की और इस संबंध में विस्तार से जानकारी ली। इस दौरान तत्कालीन अपर मुख्य सचिव ने भी बच्चों के साथ मिट्टी एवं पत्थर से बनी सामग्री को लेकर बच्चों से बातचीत की और खुद भी ए मिट्टी की आकृति बच्चों के साथ बनाई। 
जिला शिक्षा प्रशिक्षण संस्थान सीतामढ़ी ने भी फोक टीएलएम को नई शिक्षा नीति के अनुकूल एक बेहतर माॅडल समझते हुए विशेष रूप से चार दिवसीय प्रशिक्षण कार्यशाला लैब विद्यालय के शिक्षकों एवं डीएलएड अंतिम वर्ष के छात्राध्यापकों के लिए आयोजित किया। चूंकि यह पूरी कार्यशाला मेरे नवाचार पर आधारित थी इसलिए मुख्य प्रशिक्षक के रूप में मुझे आमंत्रित किया गया और सम्मानित भी। यह अपने आप एक अद्भुत अनुभव था कि अपनी कक्षा का नवाचार मुझे अधिकारिक रूप से साझा करने का अवसर मिला था। इसके बाद शिक्षा विभाग सीतामढ़ी ने जिला स्थापना दिवस के अवसर पर भव्य तरीके से इसे मंत्री, विद्यायकों, अधिकारियों एवं जन-सामान्य के बीच प्रदर्शित किया गया। स्वयं जिलाधिकारी सीतामढ़ी ने सूक्ष्मता से सभी टीएलएम की जानकारी ली और इसे आंगनबाड़ी केंद्रों के लिए भी बहुत उपयोगी बताया। उनके विजन के परिणामस्वरूप ही आईसीडीएस सीतामढ़ी एवं शिक्षा विभाग सीतामढ़ी के समन्वय से सीतामढ़ी जिले की सभी महिला पर्यवेक्षिका एवं आंगनबाड़ी सेविकाओं को फोक टीएलएम के निर्माण एवं उपयोग की जानकारी मेरे द्वारा साझा की गई।‌ इसी वर्ष समृद्धि यात्रा के दौरान शिक्षा विभाग ने पुनः फोक टीएलएम का विशेष स्टाॅल लगाकर मुख्यमंत्री के समक्ष प्रदर्शन किया गया और माननीय मुख्यमंत्री ने मुक्त कंठ से इस नवाचार की प्रशंसा की। वर्तमान में अनेकों शिक्षक विभिन्न सोशल प्लेटफॉर्म के माध्यम से जुड़कर फोक टीएलएम के संबंध में जानकारी ले रहे और उसका उपयोग अपनी कक्षा कक्ष में कर रहे हैं।
आंगनबाड़ी सेविकाओं का भी मानना है कि बच्चों की उपस्थिति और ठहराव में भी यह शिक्षण अधिगम सामग्री काफी सहायक बन रही है। मुझे खुशी है कि जिस सामग्री को अपनी कक्षा के लिए मैंने प्रारंभिक स्तर पर अव्यवस्थित क्रम की समस्या को दूर करने के लिए किया था,आज वही तरीका आंगनबाड़ी केंद्र पर बच्चों को व्यवस्थित क्रम में शुरू करने में किया जा रहा है। एक शिक्षक के रूप में मेरे इस नवाचार की असली सफलता बच्चों के बिना दबाव खेल-खेल में अवधारणाओं की समझ विकसित करने से है। हम सभी शिक्षकों को चाहिए कि बच्चों की एक छोटी से छोटी बात को भी जरुर नोटिस करें क्योंकि बच्चों के बीच से ही हमें कितनी प्रकार की अंतर्दृष्टि प्राप्त होती है जिससे कि हम बच्चों के लिए अधिगम का एक बेहतर और सकारात्मक वातावरण तैयार कर सकें और उन्हें खेलने एवं खिलने का अवसर साथ साथ दिया जा सके।

©®प्रियंका कुमारी 
राजकीय शिक्षक पुरस्कार प्राप्त शिक्षिका 
मध्य विद्यालय मलहाटोल, परिहार, सीतामढ़ी, बिहार।
संपर्क  - edubookwriting@gmail.com

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