मुझे पढ़ना है माँ
-------------------
वैशाख चला-चली पर है
आलू कोड़े जा चुके खेतों से
आम के टिकौलों में कोशा लगे
गेहूं की कटनी भी पूरी हुई
घर से स्कूल की दूरी भी
कम हो गई मां,
चलो न, लिखवा दो
मेरा नाम स्कूल में
लिखवा दो न मां
नाम मेरा स्कूल में
हंसिया-खुरपी की जगह
थमा दो हाथ में किताब-कलम।
मां, मुझे देखनी है
दुनिया की खूबसूरती
मेरी आंखों में क्यों रहें
बस खेतों से उड़ती धूल ही!
मां, मुझे सालती है
तुम्हारे हाथ के छाले
नहीं चाहती इन्हें
अपनी हथेलियों में भी।
मुझे बेधती है मां,
तुम्हारी स्थिति
हर छोटी बात में
पिता पर निर्भरता
घर की देहरी में
सिमटी तुम्हारी दुनिया!
मुझे पढ़ना है माँ,
आगे बढ़ना है…
ख्वाबों की उड़ान भरनी है,
छूना है अपने हिस्से का आसमान…!
मुझे दुनिया देखनी है मां
नजरें चुरानी-झुकानी नहीं
अपने पैरों पर खड़ा होना है
कामयाबी के झंडे गाड़ने हैं
चलो ना मां
लिखवा दो न
नाम मेरा स्कूल में...।।
© प्रियंका प्रियदर्शिनी (प्रियंका कुमारी)✍️
मध्य विद्यालय मलहाटोल, परिहार, सीतामढ़ी
ईमेल - pkjha2209@gmail.com
Comments
Post a Comment