मुखौटा
***********
भावनाओं के जंगल में
घात लगाए बैठे हैं
एक से बढ़कर एक
कई चतुर शिकारी…!
पास उनके न तीर हैं,
न धनुष,
बस शब्दों की धार है
और मुखौटों की भरमार…!
सादगी से भरी मुस्कराहट इनकी
बिछाते है
भरोसे का मायाजाल ,
पर समय के साथ
धीरे-धीरे टूटता है भ्रम…!
और तब समझ आता है
शिकारी अब वनों में नहीं,
हमारे बीच बसते हैं,
हमारी ही भाषा में बोलते है…!
हर दिन वो करते हैं
एक नया शिकार-
कभी आस्थाओं का,
कभी भावनाओं का,
तो कभी आत्मा के मौन आक्रोश का।
चकाचौंध की इस अंधी दौड़ में
इंसानियत पीछे छूट रही,
अब भूख रोटी की नहीं,
पहचान छीन लेने की है।
वो सब कुछ हथिया लेते हैं,
सपने, विश्वास, मौन तक
और फिर भी कहते हैं
हम तो खाली हाथ हैं…!
शून्यता का ऐसा अभिनय
कर सकते हैं सिर्फ वही
जो भीतर तक भरे हैं लोभ से,
और बाहर से ओढ़े हो
बनावटी आवरण।
अब समय है
आत्मावलोकन का,
जहां हम सवाल करें
क्या हम वाक़ई संवेदनशील हैं
या केवल दिखावे भर के सुहृदयी ...!
©प्रियंका प्रियदर्शिनी ✍️
प्रियंका कुमारी
मध्य विद्यालय मलहाटोल, परिहार
जिला -सीतामढी़, बिहार
Comments
Post a Comment