जरुरत...
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किताबें बोझ बनती जा रही थी,
जरूरत थी
सीखने को आनंददायी बनाने की।
कक्षा में सवाल थम से गए थे,
जरूरत थी
बच्चों को खुलकर पूछने की आजादी की ।
हर बच्चा तुलना में तौला जा रहा था,
जरूरत थी
हर बच्चे के हुनर को अपनाने की।
गलतियों पर डांट मिलती थी,
जरूरत थी
गलतियों से सीखने के मौके देने की।
कुछ बच्चे पीछे रह जाते थे,
जरूरत थी
उन सभी को साथ लेकर चलने की।
सपनों को हकीकत समझा नहीं जाता था,
जरूरत थी
कोशिश व उम्मीद की बात करने की।
हर बच्चा खास है, ये भुलाया जा रहा था,
जरूरत थी
उनकी खासियत को पहचानने की।
क्यों न पूरी करें हर जरूरत
बच्चों की,
बात करें उनकी
आज़ादी की
जो पीछे छूटे हैं
उनके खुलने दें पंख
उड़ने दें आसमान में
एकदम उन्मुक्त...
यही तो कहती है
नीति अपनी
नई शिक्षा की।।
©प्रियंका कुमारी, शिक्षिका
मध्य विद्यालय मलहाटोल, परिहार
जिला -सीतामढी़, बिहार।
ईमेल - pkjha2209@gmail.com
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