इसके बाद हमने एक बड़ी सी पिक्चर बुक ली और बच्चों को देखने के लिए दिया। बच्चों ने स्वयं से रंग -बिरंगे तस्वीरों का अवलोकन किया और दी गई तस्वीरों में दिख रही वस्तुओं को गिनने का भी प्रयास किया। कुछ खाने वाली वस्तुओं की भी तस्वीर थी जिसे देख बच्चे खाने की एक्टिंग करने लगे। पिक्चर बुक में तरह-तरह की वस्तुओं का चित्र था जिसे देखकर बच्चे आपस में बात करना शुरू कर दिए। जब बच्चों ने अपने मन से जी भर पिक्चर बुक का अवलोकन कर लिया तब मैंने बच्चों से पिक्चर बुक पर बात करना शुरू किया। एक पेज में लड़कियों के डिजाइनर सैंडिल का फोटो था जिसे देख कर एक बच्चे ने कहा कि मैं ये वाला चप्पल लूगा, तो सबसे पहला सवाल मैंने उससे ही पुछा कि यह बताओ कि तुम लड़कियों वाला चप्पल ले कर क्या करोगे तो उसने तपाक से कहा कि मैं अपनी बहन को दूंगा। उसकी बात सुनकर समझ आ गया कि वह सिर्फ चंचल ही नहीं संवेदनशील भी है। फिर बच्चों को पिक्चर बुक में दी गई तस्वीरों को दिखाकर दस तक की गिनती भी करवाया। अब बच्चों को थोड़ा रिफ्रेश करने के लिए बोला कि चलो घूमने चलते है। सब ने कहा कि हां चलते है। पर हम तो कक्षा की सैर पर निकले थे इसलिए बच्चों को बोला कि चलो अपना क्लास रूम तुमलोग को घुमाते हैं। फिर हमने कक्षा की दीवार पर बने पर कलर्स फ्लावर, सूरजमुखी का फूल, अल्फाबेट्स, वर्णमाला, पहाड़ी वादी, गिनती चार्ट और बच्चों के बनाए हुए पेंटिंग्स आदि दिखाते हुए पुनः बेंच -डेस्क पर आकर बैठ गये हम सभी। बच्चों को अपना क्लास रूम घूमकर बहुत अच्छा लगा।बच्चों ने दीवारों पर बनी पेंटिंग्स के बारे में बात भी की। साथ ही मैंने बच्चों को बताया कि अब इन दीवारों पर आप लोगों के द्वारा बनाई गई पेंटिंग्स भी अब होगी, क्योंकि आज से यह कक्ष आप सब का है।
कक्षा भ्रमण के बाद अब बारी थी हमारे पत्थरों वाली खेल की। सबसे पहले मैंने पत्थरों की सहायता से दो मछली की आकृति बच्चों को बनाकर दिखाई। चूंकि विद्यालय के पोषक क्षेत्र में सार्वाधिक आबादी मल्लाहों की है और मछलियां इनके लिए सबसे परिचित जीव/वस्तु है। जिसके साथ बच्चे स्वयं को आसानी से जोड़ पाते है। इसलिए मैंने सबसे पहले मछली की आकृति बनाई जिसे देखकर बच्चे खुश हो गये और उनकी आंखों की चमक को देखते हुए मैंने कहा कि अब आप लोग अपनी मछली बनाओ। बच्चों ने भी मछली की आकृति बनाने की अच्छी कोशिश की। इसके बाद उनसे कहा कि चलो अब पता करते हैं कि इस मछली को बनाने में कितने पत्थर के टुकड़े लगे। सब लोग अपनी-अपनी मछली के पत्थर को गिनने लगे कि कितने पत्थर से उनकी मछली बनी है। बच्चे ठीक से पूरी गिनती नहीं कर पा रहे थे। पर उन्हें गिनने में मजा आ रहा था। पुनः बच्चों के साथ एक और पत्थर से गिनती वाला खेल खेला हमनें। सारे पत्थरों को बच्चों से एक डिब्बे में रखवा लिया और बच्चों से कहा कि अब आप सब आंखे बंद कीजिए और बारी-बारी से पत्थर वाले डिब्बे में से एक -एक मुट्ठी पत्थर निकाल कर अपने सामने रखिए। बच्चों ने वैसा ही किया और इस बार उनके लिए गिनना आसान था। बच्चों ने आसानी से पत्थरों को गिना। इसके बाद अपने बगल वाले बच्चों से अपने पत्थर साझा कर पुनः एक-दूसरे के पत्थरों की गिनती की ताकि एक-दूसरे के गणना की जांच हो सके। इस गतिविधि से बच्चों ने यह भी जाना कि किस की मुट्ठी में कितने पत्थर आए। बच्चों को बहुत मजा आ रहा था। फिर मध्याह्न भोजन का समय हो गया। बच्चे खा कर जल्दी ही मेरे पास आ गए। फिर हमने कुछ इधर-उधर की बातें की।
क्लास का समय होने के पश्चात बच्चों को बताया कि चलो अब जादू का पिटारा दिखती हूं जिसमें हमलोग अच्छी-अच्छी कविता-कहानी देखेंगे और सीखेंगे। यह कहकर मैंने बैग से अपना लैपटॉप निकाला और मोबाइल डाटा से नेट कनेक्ट कर के बच्चों के लिए प्रचलित कविताएं नानी तेरी मोरनी और मछली जल की रानी आदि दिखाना शुरू किया। बच्चों के उत्साह का ठिकाना नहीं था। बच्चे लैपटॉप को टीवी समझ रहे थे इसलिए उनको बताया कि इसका नाम लैपटॉप है और इसमें हम बहुत सारी चीज़ें देख सकते हैं। कुछ देर बच्चों को लैपटॉप पर कविताएं दिखाई और कैलकुलेट किया कि अब इनका भोजन पच गया होगा इसलिए अब कुछ शारीरिक गतिविधियां करवाई जा सकती है। सभी बच्चों को कक्षा में गोल आकार में खड़ा करवाया और फिर कुछ एक्शन वर्ड्स यथा जम्प, क्लैप,लाफ,सिटडाउन आदि कर के दिखाया। इसके बाद बच्चों ने भी भी उसी तरह से किया। मैं वर्ड्स बोलती और बच्चे एक्शन करते। ऐसा करने में उन्हें मजा आ रहा था। जब अंत में मैंने उन सभी अंग्रेजी वर्ड्स का अर्थ पुछा तो बच्चों ने एकदम सही-सही उत्तर दिया। जिसे सुनकर बहुत संतुष्टि हुईं। फिर हमने साथ में एक कविता भी गाया। एक बच्चा अपने साथ गेंद लेकर भी आया था और उसने गेंद से खेलने की इच्छा जताई। फिर क्या था हम सभी सर्कल मोड में खड़े हो गए और बारी-बारी से एक-दूसरे को गेंद कैच करने के लिए फेंकने लगे। इस गतिविधि में भी बच्चों ने बहुत इंज्वॉय किया। हमने एक बैलेंसिंग वाला खेल भी खेला था जिसमें बच्चों को बारी-बारी से अपने सर पर काॅपी रख कर कक्षा के एक छोर से दूसरे छोर पर जाकर दीवार को छूकर मेरे पास लौटना था और मेरे हाथ में अपनी काॅपी देनी थी। सब बच्चों ने मजे लेकर यह गतिविधि की। हां,पर गतिविधि के दौरान बच्चें पूरी एकाग्रता के साथ संतुलन को बनाए रखने की कोशिश कर रहे थे। एक बच्चा जो सबसे चंचल था बोलने में, उसने सबसे बेहतर तरीके से संतुलन वाली गतिविधि को किया और खुश हो कर कहा कि 'छाला हम त जीत गेली'। बच्चे की इस समस्या को मैंने नोट कर लिया था कि वह हर बार खुश होने पर साला शब्द का प्रयोग कर रहा है। इसलिए हर बार उसे प्यार से बताया कि यह गाली वाले शब्द है, इसे नहीं बोलना चाहिए। चूंकि गाली वहां के समाज के लिए एक सामान्य बात थी जिसके कारण बच्चे में इस दुर्गुण का समावेश एक स्वाभाविक प्रक्रिया थी। इसलिए बच्चे की इस समस्या को नोट कर लिया था ताकि इस दिशा में आवश्यकतानुसार कार्य किया जा सकें।
खैर, पूरा दिन बच्चों के साथ शानदार रहा। छुट्टी का वक्त होने चला था इसलिए बच्चों को कल के लिए कुछ बातें समझाई कि समय पर नहा-धोकर अच्छे से तैयार हो कर आना है। माता-पिता और घर के बुज़ुर्ग का आशीर्वाद लेकर बोलना है कि हम स्कूल जा रहे हैं। बच्चों ने सहमति जताई और कल फिर मिलने का वादा कर बच्चे अपने-अपने घरों की ओर चल पड़े.............!
प्रियंका कुमारी , शिक्षिका
मध्य विद्यालय मलहाटोल, परिहार
जिला - सीतामढ़ी, बिहार।
संपर्क - pkjha2209@gmail.com
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