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Incorporating indian knowledge system in curriculum design especially in foundational literacy and numeracy.


Incorporating indian knowledge system in curriculum design especially in foundational literacy and numeracy-

नई शिक्षा नीति -2020 प्राचीन भारतीय ज्ञान और विचार की समृद्ध परंपरा के आलोक में तैयार की गई है। यह नीति भारत की परंपरा और सांस्कृतिक मूल्यों के आधार को बरकरार रखते हुए 21वीं सदी की शिक्षा के लिए आकांक्षात्मक लक्ष्यों को पूरा करने के लिए दृढ़संकल्पित है। भारत को विश्व गुरु के रूप में पुनर्स्थापित करने की संकल्पना लिए हमारी नई शिक्षा नीति अपने प्राचीन भारतीय ज्ञान प्रणाली को मजबूत करने की दिशा में अपनी संस्कृति, परंपराओं,अपने ज्ञान -विज्ञान, साहित्य -कला, समाजिक चिंतकों तथा अपनी भाषा,लोक कथाओं आदि के बारे में अधिकाधिक जानने को प्रेरित करती है। जब तक हम भारतीय अंग्रजों की बनाई शिक्षा नीति से इतर अपने भारतीय ज्ञान प्रणाली को अपने पाठ्यचर्या में शामिल कर उन्हें जानने और समझने का प्रयास नही करेंगे तब तक हम अपने भारत के गौरवशाली अतीत और पंरपरा से पूर्णतया परिचित नही हो सकेंगे। भारतीय ज्ञान प्रणाली कितनी समृद्ध और प्रमाणिक थी इसके लिए इसका अध्ययन आवश्यक है। भारत में विश्व के अलग-अलग हिस्सों से ज्ञान प्राप्त करने के लिए शिक्षार्थी आया करते थे । आज भी हमारे प्राचीन भारतीय विश्वविद्यालय तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला और वल्लभी अध्ययन के विविध क्षेत्रों में शिक्षण और शोध के ऊंचे प्रतिमान स्थापित करने के रूप में इतिहास के पन्नों में दर्ज है। इसी शिक्षा व्यवस्था ने चरक, सुश्रुत, आर्यभट्ट, वाराहमिहिर, भास्कराचार्य,ब्रह्मगुप्त, चाणक्य, चक्रपाणि दत्ता, माधव, पाणिनि, पतंजलि, नागार्जुन, गौतम, पिंगला, शंकरदेव, मैत्रेयी, गार्गी और थिरुवल्लुवर जैसे अनेकों महान विद्वानों को जन्म दिया। इन विद्वानों ने वैश्विक स्तर पर ज्ञान के विविध क्षेत्रों, जैसे गणित, खगोल विज्ञान, धातु विज्ञान, चिकित्सा विज्ञान और शल्य चिकित्सा, सिविल इंजीनियरिंग, भवन निर्माण, नौकायान-निर्माण और दिशा ज्ञान, योग, ललित कला, शतरंज इत्यादि में प्रामाणिक रूप से मौलिक योगदान दिए। भारतीय संस्कृति और दर्शन का विश्व में बड़ा प्रभाव रहा है। वैश्विक महत्व की इस समृद्ध विरासत को आने वाली पीढ़ियों के लिए न सिर्फ सहेज कर संरक्षित रखने की जरूरत है बल्कि हमारी शिक्षा व्यवस्था द्वारा उस पर शोध कार्य होने चाहिए, उसे और समृद्ध किया जाना चाहिए और नए-नए उपयोग भी सोचे जाने चाहिए।

मूलतः हमारी राष्ट्रीय शिक्षा नीति का विजन भारतीय मूल्यों से विकसित शिक्षा प्रणाली है जो सभी को उच्चतर गुणवत्ता शिक्षा उपलब्ध कराके और भारत को वैश्विक ज्ञान महाशक्ति बनाकर भारत को एक जीवंत और न्यायसंगत ज्ञान समाज में बदलने के लिए प्रत्यक्ष रूप से योगदान देना है।

                          उपर्युक्त बातों को व्यावहारिक रूप में लागू करने के लिए यह आवश्यक है कि भारतीय ज्ञान प्रणाली के अंतर्गत भारत की समृद्ध और विविध प्राचीन एवं आधुनिक संस्कृति व परंपराओं को अधिकाधिक पाठ्यचर्या में शामिल किया जाए, ताकि हमारी नई पीढ़ी को भारतीय ज्ञान प्रणाली के माध्यम से अपने भारतीय जड़ों और गौरव से बंधे रहने की प्रेरणा भी प्राप्त हो। हमारी पीढ़ी के अंदर अपने गौरवशाली इतिहास और संस्कृति के प्रति गौरव का बोध आए, इसके लिए हमें अपनी पाठ्यचर्या में भारतीय ज्ञान प्रणाली को मजबूती से सम्मिलित करना होगा और इस ज्ञान के प्रसार की महत्ती जिम्मेदारी शिक्षकों के उपर है। शिक्षकों को प्रशिक्षित किया जाए और उन्हें भारतीय ज्ञान प्रणाली के प्रसार का अग्रदूत बनाया जाए।

जहां तक बुनियादी साक्षरता एवं संख्या ज्ञान के संदर्भ में पाठ्यचर्या में भारतीय ज्ञान प्रणाली को शामिल करने की बात है तो यह एक सबसे अच्छी और सार्थक शुरुवात होगी। बुनियादी कक्षाओं से ही बच्चों की शिक्षा में भारतीय संस्कृति और ज्ञान का प्रसार किया जाए तो एक ऐसी पीढ़ी तैयार होगी जो भारत की समृद्ध गौरवशाली परंपरा से परिचित होगी और उनमें अपने देश अपनी संस्कृति के प्रति गौरव का भाव होगा। वो विश्व में कहीं भी स्वयं को गौरवान्वित महसूस करेंगे और आत्मविश्वास के साथ अपनी गौरवशाली संस्कृति -परंपरा की बात रख सकेंगे। वर्तमान में भारत इस समस्या से भी जुझ रहा है कि हमारी युवा पीढ़ी अपने गौरवशाली ज्ञान प्रणाली से अनभिज्ञ है और उन्हें लगता है कि अधिकतर अच्छे इनोवेशन पश्चिमी देशों के द्वारा किए गए हैं। यहां तक की साहित्य -कला के क्षेत्र में भी हम स्वयं को कमतर आंकने लगते है और यह सब अपनी चीजों का ज्ञान नहीं रह पाने के कारण हो रहा है।

तो आइए जानते हैं कि विशेषकर बुनियादी साक्षरता एवं संख्या ज्ञान के संदर्भ में हम किस प्रकार से पाठ्यचर्या में भारतीय ज्ञान प्रणाली को शामिल कर सकते हैं —--

  • मातृभाषा का प्रयोग - नई शिक्षा नीति में अनिवार्य रूप से प्राथमिक कक्षाओं के बच्चों को उनकी अपनी मातृभाषा में शिक्षा देने की बात कही गई है। इससे बच्चों को अपनी स्थानीय भाषा का भरपूर ज्ञान होगा और उनके समझने की क्षमता में भी अपेक्षाकृत अधिक वृद्धि होगी। पिछले 50 वर्षों में सैकड़ों स्थानीय भाषा विलुप्त हो चुकी है। यहां तक कि 8वीं अनुसूची में सम्मिलित 22 भाषाओं में से भी बहुत सी भाषाएं ऐसी है जिनका प्रयोग सामान्यतः कम होता जा रहा है। ऐसी परिस्थिति में अगर प्राथमिक कक्षाओं तक शिक्षा के माध्यम के रूप में मातृभाषा का अनिवार्य प्रयोग हमारी भाषा और संस्कृति को संरक्षित और पुष्पित करने की दिशा में निर्णायक भूमिका निभाएगा।
  • अभिभावक/समुदाय की भागीदारी - बच्चों की शिक्षा में अभिभावकों और समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु विभिन्न डाक्यूमेंट्स के माध्यम से बहुत से तरीके बताए गए हैं जिसकी मदद से बच्चों में हम अपने ज्ञान और संस्कृति का प्रसार कर सकते हैं। उदाहरणार्थ, मैं अपने विद्यालय के अभिभावकों को प्रेरित करती हूं कि वो बच्चों को सोते समय निश्चित रूप से अपने अनुभवों या फिर अपने बुजुर्गों द्वारा सुनी -सुनाई कोई कहानी, कविता या लोकगीत ही जरुर सुनाएं और उनसे बातचीत करें। इससे एक तरफ तो बच्चों के मौखिक भाषा विकास में सहायता मिलेगी, साथ ही दुसरी ओर बच्चे अपनी स्थानीय भाषा और संस्कृति के बारे में जान पाएंगे।
  • स्थानीय कला/ पेंटिंग - विभिन्न अवसरों पर हम पेंटिंग/रंगोली प्रतियोगिताएं आयोजित करवाते हैं। अगर हम बच्चों को उनके घर पर विभिन्न पर्व -त्योहारों अथवा शुभ अवसरों पर बनाएं जाने वाले पेंटिंग/कला गतिविधियों को साझा करने के लिए प्रेरित करें तो बच्चे अधिक से अधिक अपनी स्थानीय कलाओं के प्रति जागरूक होंगे और इस विषय में अपनी जानकारी बढ़ाएंगे और अपनी संस्कृति-परंपराओं से जुड़ेंगे। इससे शिक्षा और संस्कृति के परस्पर संबंधों को मजबूती मिलेगी।
  • बाल साहित्य का विकास - देश भर में पढ़ने की संस्कृति के विकास के लिए सार्वजनिक तथा स्कूल लाइब्रेरी का विस्तार किया जाना चाहिए और इन लाइब्रेरी में सभी भारतीय तथा स्थानीय भाषा में दिलचस्प और प्रेरक  पुस्तकें उपलब्ध हो जिससे बच्चों में सीखने के प्रारंभिक वर्षों के दौरान से ही अपनी स्थानीयता, भाषा और संस्कृति के प्रति सम्मान और गौरव का भाव विकसित किया जा सके। साथ ही ऐसे बाल साहित्य का विकास किया जाए जिसमें लोककथाओं,जातक कथाओं आदि का सावधानीपूर्वक रोचक तरीके से पुनर्लेखन किया गया हो।
  • शिक्षण अधिगम सामग्री - शिक्षकों को अधिकाधिक अपने परिवेश में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों के माध्यम से स्वनिर्मित टीएलएम के उपयोग के संबंध में प्रशिक्षित किए जाने की आवश्यकता है। रेडीमेड टीएलएम की अपेक्षा स्थानीय कला कृतियों का उपयोग बच्चों को उनकी जड़ों से जोड़ने का कार्य करेगा। उदाहरणार्थ - मैंने अपनी कक्षा के बच्चों के साथ मिलकर फोक टीएलएम का निर्माण किया और एफएलएन किट के विकल्प के रूप में मिट्टी और पत्थर से बनाएं गये शिक्षण अधिगम सामग्री का निर्माण एवं उपयोग किया जिससे बच्चों में मिट्टी से बनी वस्तुओं के प्रति जागरुकता एवं आकर्षण का भाव विकसित हुआ। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि भारतीय इतिहास में मिट्टी से बनी वस्तुओं का इतिहास कितना पुराना है। आज भी राजस्थान का राजसमंद जिले के मोलेला गांव टेराकोटा से बनी वस्तुओं के लिए सबसे प्रसिद्ध है।
  • पारंपरिक तरीके से संख्या ज्ञान - प्राचीन भारतीय गणना प्रणाली जैसे - दशा प्रणाली (आधार 10) में गिनती के लिए पत्थरों या मोतियों का आदि का प्रयोग किया जाता था। माप इकाईयों के रूप में गज या मन जैसी पारंपरिक ईकाईयां प्रयोग में लाई जाती थी तथा मानसिक गणना के लिए सरल वैदिक गणितीय तकनीकों का उपयोग, सूत्र आधारित विधियां जो कि तीव्र और कुशल समस्या सामाधान को बढ़ावा देते। इन्हें भी पुनः प्रयोग में ला कर हम भारतीय ज्ञान को बढ़ावा दे सकते है। मैं भी पारंपरिक तरीके से गणना के लिए मिट्टी से बनी गोलियां और पत्थरों का उपयोग अपनी कक्षा में करती हूं।

             चूंकि बहुत से ऐसे तरीके हैं जिसका उपयोग कर हम भारतीय ज्ञान प्रणाली को बुनियादी साक्षरता एवं संख्या ज्ञान की पाठ्यचर्या में शामिल कर सकते है। जब परिचित सांस्कृतिक तत्वों को शामिल किया जाता है तो बच्चे सीखने की प्रक्रिया से अधिक जुड़ाव महसूस करते हैं। इससे शैक्षणिक ज्ञान के साथ-साथ सांस्कृतिक गौरव और जागरूकता भी बढ़ती चली जाती है और यह भविष्य में हमें अपने गौरवशाली भारतीय ज्ञान प्रणाली के इतिहास को जानने के लिए प्रेरित करती है। पर इन सारी बातों में सबसे आवश्यक तथ्य यह है कि शिक्षक को अपने शिक्षण विधियों में भारतीय ज्ञान प्रणाली के तत्वों को प्रभावी ढंग से सम्मिलित करने के लिए उचित प्रशिक्षण की आवश्यकता होगी। साथ ही भारतीय ज्ञान प्रणाली के अवधारणाओं को मौजूदा पाठ्यक्रम में सहजतापूर्वक एकीकृत रुप से अनुकूलित करना होगा।


प्रियंका कुमारी 

 शिक्षिका 

मध्य विद्यालय मलहाटोल, परिहार, सीतामढ़ी।

संपर्क - pkjha2209@gmail.com

Sourse- NEP_2020


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