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नये शैक्षणिक सत्र में बतौर शिक्षक मेरा संकल्प


नये शैक्षणिक सत्र में बतौर शिक्षक मेरा संकल्प 

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वार्षिक परीक्षाएं होने को है और मूल्यांकन कार्य के निष्पादन के बाद एक अप्रैल से नये शैक्षणिक सत्र 2025-26 की शुरुआत हो जाएगी। इस नये शैक्षणिक सत्र में मैं अपनी कक्षा में शिक्षण योजनाओं को नये तरीके से संचालित करने का संकल्प ले रही हूं। स्वयं को उन सभी कार्यों से विलग करने का संकल्प लेती हूं जिससे मेरी कक्षा के बच्चों की सीखने की निरंतरता का क्रम टूटता है तथा उन सभी कार्यों के सुदृढ़ीकरण की दिशा में अपना पूर्ण प्रयास करने की कोशिश करुंगी जिससे बच्चों का सीखना पहले से भी बेहतर और सरल हो जाए। साथ ही बच्चों के सर्वांगीण विकास में विद्यालय, परिवार या समुदाय के स्तर पर कोई भी बाधा आ रही है तो उसे व्यक्तिगत रूचि के साथ चिह्नित कर दूर करने का प्रयास करुंगी। मैं व्यक्तिगत रूप में यह भी सुनिश्चित करने का प्रयास करुंगी कि प्रत्येक बच्चे स्कूल ड्रेस में अपनी सभी पुस्तकों के साथ ससमय और नियमित रूप से विद्यालय आए और परिवार/समुदाय भी बच्चों की शिक्षा में भागीदारी निभाए। परिवार हो या विद्यालय या फिर कोई और, बच्चों के अधिकारों पर कुठाराघात किसी के भी द्वारा ना होने पाएं।

                    जब से मिशन निपुण बिहार अस्तित्व में आया है, इसने बुनियादी कक्षाओं के बच्चों की शिक्षा के लिए हमें एक नवीन अंतर्दृष्टि दी है। इस मिशन ने ना सिर्फ हमें बच्चों को समझ के साथ सीखने की प्रक्रिया को और अधिक मजबूत बनाने के तरीकों के खोज की ओर प्रेरित किया बल्कि बुनियादी कक्षाओं के बच्चों की शिक्षा के प्रति गंभीरता से कार्य करने की दिशा में अग्रसर किया। और शायद यही वजह है कि मैं आज शैक्षणिक सत्र 2025-26 के लिए एक नया संकल्प ले रही हूं। पूरी ईमानदारी से साझा करूं तो मुझे लगता है कि बहुत से शिक्षकों की उर्जा का सदुपयोग कक्षा शिक्षण से अधिक राज्य या जिला शिक्षण संस्थानों के कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में अधिक हो रहा है। प्रशिक्षण कार्यक्रम तक तो समझ में आता है पर जिला तकनीकी दलों के रूप में प्रतिनियुक्त कर विभिन्न प्रकार के कार्यों में शिक्षकों को संलग्न रखना कहां तक उचित है? बहुत से मामलों में शिक्षकों द्वारा स्वयं भी अनुरोध कर अपने आपको इन कार्यों में संलग्न करवाया जाता है और कुछ शिक्षकों को मजबूरी में संलग्न होना पड़ता है। मजबूरी से यहां तात्पर्य इस संदर्भ में भी है कि बहुत से शिक्षक अपने परिवार को छोड़कर सुदूर देहाती क्षेत्रों में विद्यालय करने के लिए रहते हैं और जब शहरी क्षेत्रों में जहां उनके परिवार होते है, अगर 4-5 दिनों के लिए भी प्रतिनियुक्ति का अवसर मिलता है तो वो ना चाहते हुए भी उन कार्यक्रमों का हिस्सा बन जाते है, ताकि वह अपने बच्चों व परिवार के साथ कुछ वक्त बिता सकें। 

खैर, तथ्य जो भी हो पर कहीं न कहीं इससे बच्चों का सीखना प्रभावित होता है। ठीक यही भाव आजकल मैं स्वयं की कक्षा के बच्चों के लिए महसूस कर रही हूं। बच्चों का एक विशेष गुण होता है कि वो सीखते है, भूलते हैं और फिर सीखते है। अगर सीखने के अवसरों की निरंतरता में कमी आती है तो बच्चों का भूलना तय है। मैं भी कई बार जिला और राज्य स्तरीय  शैक्षिक कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में अपना योगदान वर्ष 2019 से दे रही हूं पर मिशन निपुण बिहार ने मुझे यह आत्मबोध करवाया कि किसी भी कार्यक्रम से अधिक मेरी कक्षा के बच्चों को मेरी आवश्यकता है। मैंने अन्य शैक्षिक कार्यक्रम में 2022 से ही अपनी सहभागिता 75% कम कर दी। पर मेरे शिक्षक हृदय को यह 25% भागीदारी भी कचोट रही है। इसलिए मैं नये शैक्षणिक सत्र में संकल्प ले रही हूं कि लगभग सभी कार्य दिवसों में मैं अपनी कक्षा के बच्चों के बीच रहने की कोशिश करूं। साथ ही उन सभी अवसरों को शालीनतापूर्वक नकार सकूं जहां मेरे बिना उस कार्य का संपादन किसी अन्य के द्वारा संभव हो। पर यहां एक बात स्पष्ट करना चाहूंगी कि मेरी कक्षा के बच्चों की शिक्षा जिन कार्यों में संलग्न होने से प्रभावित ना होती हो,वो सभी शैक्षिक कार्य मैं पूरी तन्मयता के साथ करती रहूंगी। 

मुझे नही पता कि अन्य शिक्षकों की मेरी अभिव्यक्ति के प्रति क्या विचार होंगे….पर कल्पना कीजिए कि स्थिति कितनी गंभीर है जहां बच्चे सीखने के संकट से जूझ रहे है , वहां एक -एक कार्य दिवस कितना महत्वपूर्ण है!

इसलिए मैं सभी शिक्षकों को इतना जरूर कहूंगी कि जिस तरह लोग नये वर्ष में कुछ ना कुछ नया संकल्प लेते है,उसी प्रकार से हम शिक्षकों को भी नये शैक्षणिक सत्र में कुछ न कुछ नया संकल्प जरुर लेना चाहिए और उस पर अमल करना चाहिए। संकल्प लेने के लिए सबसे पहले हमें आत्मनिरीक्षण करने की आवश्यकता होगी कि हम किन बिन्दूओं पर बच्चों की शिक्षा में पीछे रह जा रहे हैं और कैसे उसका समाधान किया जा सकता है, क्योंकि हम से बेहतर हमारा आकलन कोई नहीं कर सकता।  

तो आइए हम सभी शिक्षक पुराने सत्र में हुई भूलों या कमियों या प्रयासों का स्व-मूल्यांकन करें और नये सत्र में और बेहतर प्रयास करने का संकल्प ले ताकि हमारा बिहार वास्तव में निपुण बिहार बन जाएं। 

नोट- अगर आप शिक्षक है और यह आलेख पढ़ रहे हैं तो नये शैक्षणिक सत्र के लिए आपका संकल्प क्या है.... टिप्पणी के रूप में हमारे साथ भी जरूर साझा करें।

धन्यवाद।

प्रियंका कुमारी 

मध्य विद्यालय मलहाटोल, परिहार, सीतामढ़ी 

ईमेल - eshiksha.sitamarhi@gmail.com

Comments

  1. प्रियंका जी,
    आपका संकल्प-पत्र, शिक्षकों के लिए ऐसी प्रेरणा देनेवाला दस्तावेज का प्रतिबिंब है जिसमें आप, बतौर शिक्षक, अपने कर्तव्य के प्रति अत्यंत निष्ठावान, संवेदनशील रहकर अपने शिक्षण कार्य को मात्र एक कार्य नहीं, बल्कि एक पवित्र उत्तरदायित्व के रूप में देखती हैं।
    आपका यह संकल्प कि आप अपनी कक्षा के बच्चों की सीखने की निरंतरता को बनाए रखने के लिए शिक्षकीय कार्यों को प्राथमिकता देंगी, अत्यंत सराहनीय है। वास्तव में, एक शिक्षक का कक्षा में उपस्थित रहना ही सबसे महत्वपूर्ण है, क्योंकि बच्चों के सीखने में निरंतरता ही उनकी सफलता की कुंजी है।
    आपका चिंतित होना कि शिक्षकों को कई बार विभिन्न प्रशासनिक कार्यों में व्यस्त कर दिया जाता है, जिससे उनका मूल शिक्षण कार्य प्रभावित होता है, बिल्कुल उचित है। यह सच है कि मिशन निपुण बिहार ने शिक्षकों को नई दृष्टि प्रदान की है और शिक्षकों को यह आत्मबोध कराया है कि उनकी प्राथमिकता हमेशा उनके विद्यार्थी होने चाहिए। आपने अपने अनुभव से जो सीखा, उसे न केवल आत्मसात किया, बल्कि उसे अपने शिक्षकीय संकल्प का हिस्सा भी बनाया—यह वास्तव में प्रेरणादायक है।

    अब, आपके संकल्पों के साथ मैं अपने शिक्षकीय संकल्पों को जोड़ना चाहता हूँ। मेरा भी यह संकल्प है कि नए सत्र में हम सभी शिक्षक आत्ममंथन करें, बीते वर्ष की कमियों को पहचानें और उन्हें सुधारने की दिशा में ठोस प्रयास करें।
    मैंने वीकेंड विजन, क्रिएटिव विजन, मॉडल क्लास, और मिशन 15 जैसे जिन नवाचारों का उल्लेख किया है, वे शिक्षा को अधिक प्रभावी और रोचक बनाने में सहायक हैं। मैं भी इस दिशा में निरंतर प्रयासरत रहूंगा कि शिक्षण में नवीनता बनी रहे, बच्चों के अधिगम प्रतिफल का सतत आकलन किया जाए और उन क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया जाए, जहाँ सुधार की आवश्यकता है।

    इसके अतिरिक्त, यह भी आवश्यक है कि विद्यालय, परिवार और समुदाय के बीच एक मजबूत समन्वय स्थापित हो ताकि बच्चों की शिक्षा में आने वाली बाधाओं को दूर किया जा सके। मेरा यह भी संकल्प है कि मैं यह सुनिश्चित करूँ कि प्रत्येक बच्चा नियमित रूप से विद्यालय आए, समय पर पाठ्यपुस्तकों के साथ रहे और उसका शिक्षा से मोहभंग न हो।

    प्रियंका जी, आपकी शिक्षकीय निष्ठा एवं संकल्प, न केवल प्रेरणादायक हैं, बल्कि यह भी दर्शाते हैं कि यदि हर शिक्षक अपनी भूमिका को इस प्रकार समझे, तो न केवल बिहार, बल्कि पूरा देश शैक्षिक रूप से समृद्ध हो सकता है।
    आइए, आपके साथ हम सभी शिक्षक मिलकर यह संकल्प लें कि नए सत्र में शिक्षण को और अधिक प्रभावी बनाएँगे, बच्चों की सीखने की प्रक्रिया में अवरोध नहीं आने देंगे और अपने-अपने नवाचारों को नियमित रूप से क्रियान्वित करते हुए निपुण भारत, निपुण बिहार की परिकल्पना को साकार करने में अपना योगदान देंगे ।
    इस प्रेरणादायक संकल्प-पत्र के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ! आशा है कि आपका यह संकल्प अन्य शिक्षकों को भी प्रेरित करेगा।
    रंजन कुमार


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