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ट्रेन का सफर और मिशन निपुण

मिशन निपुण कहता है हर बच्चा समझ के साथ सीखें और हर बच्चा निपुण बने। इस आलेख के माध्यम से आप जानेंगे कि एक शिक्षक  विद्यालय की सीमाओं से बाहर भी अपने लक्ष्यों की दिशा में प्रयासरत और कार्यरत रहते है।

पिछले कुछ समय से बुनियादी कक्षाओं में पढ़ने वाले बच्चों में डिकोडिंग कौशल या यूं कहें कि अक्षरों या संख्या को उसके अव्यवस्थित क्रम में भी पहचान पाने की कौशलों को विकसित करने पर काम कर रही हूं। इस क्रम में अपने स्कूल के बच्चों के अतिरिक्त अन्य जगहों के बच्चों से भी मिल कर बातचीत कर के उनकी समस्याओं को समझने का प्रयास करती रहती हूं। 
इसी क्रम में कुछ दिनों पूर्व पटना से सीतामढ़ी आने वाली ट्रेन के सफर में एक 4-5 साल की बच्ची पर नजर पड़ी जो मेरे सामने वाली सीट पर बैठी थी। उससे मैंने नाम पुछा तो मां की ओर देखने लगी। मां ने कई बार जब कहा तो उसने अपना नाम श्रेया बताया। मां से बातचीत कर पता चल गया था कि बच्ची पूर्वी चंपारण के किसी अच्छे प्राइवेट स्कूल में नर्सरी में पढ़ रही है। फिर मैंने बच्ची से उसके पसंदीदा खेल और दोस्त के बारे में बात की। इसके बाद बच्ची से हिंदी-अंग्रेजी की कुछ वर्णमाला सुनी।
इसी बीच मेरे मोबाइल पर एक काॅल आ गया तो 5-10 मिनट के लिए बच्ची की ओर से मेरा ध्यान हट गया। पर जैसे ही मैं काॅल खत्म होने के बाद उसकी ओर मुखातिब हुई तो देखा कि 
 वो मोबाइल पर वीडियोज देख रही थी और जब कुछ देर बाद उससे मोबाइल ले लिया गया तब वह उपर रखे बैग से खिलौने निकालने की जिद करने लगी जो उस समय उसकी मां के लिए एक असहज कार्य था। 
मां की परेशानी को देखते हुए मैंने तुरंत अपने मोबाइल में अपने बनाए मिट्टी के टीएलएम की तस्वीरें निकाली और उसकी ओर मोबाइल का स्क्रीन जूम कर उसे दिखाते हुए पुछा कि अरे,देखो तो ये क्या हैं...? मिट्टी के रंग बिरंगे डाइस और उस पर लिखे क,ख,च,छ आदि को देखकर उसे आश्चर्य हुआ! मैंने फिर प्यार से पुछा बताओ ये क्या लिखा है यहां...इस पर बच्ची ने बोला च। फिर दूसरे डाइस पर लिखे अक्षर को भी उसने आसानी से पहचान लिया। अब उसे वो रंग-बिरंगे टीएलएम को मोबाइल में देखकर उसमें रुचि लेने लगी। बच्ची के चेहरे के भाव को पढ़ते हुए मैंने तुरंत उसे अपनी ओर आने को कहा, क्योंकि वो मेरी सामने वाली सीट पर कुछ दूरी पर थी जिससे मुझे उसे मोबाइल में टीएलएम दिखाने में असहजता हो रही थी। वो मोबाइल पकड़े आसानी से मेरे पास आ गई और मैंने उसे अपनी गोद में बिठा लिया। अब आराम से बारी-बारी से मैंने उससे सारे अक्षरों के बारे में पुछा जो कि अव्यवस्थित क्रम में भी था। पर बच्ची ने रुक-रुककर सही जबाब दिए। मुझे यह देखकर काफी अच्छा लगा क्योंकि इस आयु वर्ग की वह पहली बच्ची थी जिसने दिखाए गए अक्षरों को उनके अव्यवस्थित क्रम में भी आसानी से पहचान लिया। फिर मैंने विभिन्न रंगों वाली गणितीय आकृति की तस्वीर बच्ची को दिखाई। अब मैंने उस से उनके रंगों के बारे में एक-एक कर पुछा,पर उससे पहले बच्ची की मां जो भाव-विभोर होकर मेरे और बच्ची के बीच की गतिविधि  को देख रही थी, मुझे तुरंत टोका कि यह नही बता पाएगी। तब तक बच्ची ने एक रंग का नाम बोल दिया। फिर मैंने बच्ची की मां को समझाते हुए कहा कि आप परेशान मत होइए, हम बस खेल रहे है और आपकी बेटी बहुत अच्छी है और इसे सब पता है। आप बस देखती रहे। अब बच्ची की मां मुस्कुराते हुए देख रही थी और बच्ची एक-एक कर सभी रंगों की पहचान की। 
अब मेरे पास सिर्फ मिट्टी वाले टीएलएम के सिर्फ अंक वाले डाइस और दहाई माला बची थी। मुझे पता था कि बच्ची अंकों की भी पहचान आसानी से कर लेगी, फिर भी मैंने सोचा चलो अंकों की पड़ताल भी कर ली जाए। बच्ची ने मिट्टी की दहाई माला को भी आसानी से गिन लिया और अंकों को अव्यवस्थित क्रम में पहचान भी लिया। 
पर अंततः मुझे एक समस्या मिल ही गई जब बच्ची ने जीरो 0 की पहचान दस 10 के रुप में की। कई बार पुछने के बाद भी उसने बोला कि इसका नाम दस है। चूंकि मैं बच्चों को अंकों की पहचान 0 से 9 तक करवाती हूं और दस की पहचान दो अंकों 1 और 0 की दोस्ती के रूप में। पर संभवतः यहां बच्ची को संख्या दस से पूर्व जीरो की अवधारणा स्पष्ट नही की गई थी इसलिए वो जीरो को सीधे तौर पर संख्या दस के रूप में संबोधित कर रही थी। फिर मैंने बच्ची को बताया कि इसका नाम दस नही जीरो है। जीरो का मतलब खाली यानि कुछ भी नहीं और दस को बनाने/लिखने के लिए हमें दो अंकों से दोस्ती करनी पड़ती है। अच्छा यह बताओ कि तुम्हारी सबसे अच्छी दोस्त कौन है।
सामने वाली सीट पर खेल रही अपनी छोटी बहन की ओर उंगली से इशारा करते हुए उसने कहा कि यह मेरी सबसे अच्छी दोस्त है। मैंने मुस्कुराते हुए कहा कि ठीक है।अब मान लो कि तुम एक 1 हो और तुम्हारी दोस्त का नाम जीरो 0 है। फिर तुम दोनों मिलकर हाथ मिलाते हो तो तुम दोनों की दोस्ती 10 बन जाती है । फिर दोनों बच्ची हाथ मिलाते है और मैं बोलती हूं कि वाह! देखो 1 और 0 की दोस्ती हो गई और अब बताओ की 1 और 0 की दोस्ती का नाम क्या है तो बच्ची ने जोर से बोला 10। मैंने उसे मोबाइल में दस लिखकर दिखाया और बताया कि जब 1 बायीं ओर से एवं जीरो दाहिनी ओर से  हाथ मिलाते है तो दस कहलाते है। फिर इसी तरह से मैंने मोबाइल में उसे रेत के पत्थर पर लिखे अंकों और अंकों से बनी संख्याओं की दोस्ती के संबंध में बताया। 
बच्ची ने मुझसे पूछा भी कि आपने ये सब क्यों बनाया है तो मैंने उसे बताया कि यह सारी चीजें अपनी कक्षा के बच्चों के लिए बनाया है क्योंकि वे तुम्हारे इतना होशियार नहीं। फिर मैंने उसे अपने क्लास के बच्चों का एक वीडियो दिखाया जिसमें बच्चे मिट्टी के टीएलएम से खेल भी रहे थे और पढ़ भी रहे थे।उसे बहुत मजा आने लगा था इसलिए उसने मेरा मोबाइल ले लिया। बीच में काॅल भी आ रहे थे पर बच्ची अब मोबाइल के पीछे लग गई थी। अब आज के समय में शांति से बच्चों के हाथ से मोबाइल लेना भी एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। फिर मैंने इधर उधर नजर दौड़ाई। चूंकि यह पैसेंजर ट्रेन थी इसलिए हैंगिंग टूल लटके थे बहुत सारे। मैंने तुरंत अपनी सीट से खड़ी हो कर बच्ची को सीट पर खड़ा होने को कहा। सीट पर खड़ा होने के क्रम में मैंने उससे मोबाइल लेकर चुपके से पाॅकेट में रख लिया। फिर जब वो सीट पर खड़ी हो जैसे ही मेरी ओर मुड़ी कि उसके कुछ बोलने से पहले मैंने ही कहा कि वो जो हाथ से पकड़ने वाला हैंगिंग लटका हुआ है वो गिनकर बताओ कि कितने है ? उसने बड़े मजे से गिना। उसके बाद यात्रियों के रखे बैग गिनवाए,कभी इधर के तो कभी उधर के। अब जब यह विकल्प समाप्त हो गया तो उसे फिर मोबाइल की याद आई। इसलिए मैंने उसे सीट से नीचे उतारा और सामने बैठाकर उससे कविताएं सुनने की कोशिश की। एक कविता के बाद उसने मुझे भी सुनाने को कहा तो मैंने भी एक बड़े राजा की बेटी वाली कविता सुना दी जो चहक गतिविधि पुस्तिका में  है। अब आजू-बाजू वाले लोग मेरी ओर देखने लगे कि ये क्या हो रहा है। तब तक बच्ची ने मछली जल की रानी गीत गाने लगी जिसे मैंने बैठे -बैठे ही हाव भाव के साथ उसे गाना बताया जिससे वह बहुत खुश हुई। सच कहूं तो उस बच्ची के साथ कुछ समय के लिए मैं भूल ही गई कि मैं अपने विद्यालय  के क्लासरूम में नही बल्कि एक ट्रेन में बैठी हूं। अब मेरा स्टेशन नजदीक आने वाला था इसलिए मैंने बच्ची की मां से शिक्षक संदर्शिका में उपलब्ध कुछ तरीके साझा किया जिससे वह बच्ची की शिक्षा में अपनी सहभागिता सुनिश्चित कर सकें। बच्ची ने मेरे मोबाइल से सेल्फी भी ली जो मेरे लिए एक सेल्फी प्राइज साबित हुआ क्योंकि मैं जब ट्रेन से उतरने को हुई तो वह भी मेरे साथ आना चाहती थी...! 
पुनः कभी यूं ही ट्रेन में मिलने का वादा कर मैंने उससे विदा लिया...!
यहां आप लोगों के बीच इस प्रसंग को साझा करने का एकमात्र उद्देश्य यह था कि जब भी हम कक्षा-कक्ष में बतौर शिक्षक अथवा घर में बतौर अभिभावक बच्चों को संख्या ज्ञान करवाएं तो उनका जीरो (0) से परिचय प्रारंभ में ही करवाएं , क्योंकि अचानक से संख्या 10 के दौरान जब बच्चों का परिचय 0 से होता है तो वह जीरो का अर्थ संख्या 10 मानने लगते हैं। उपर्युक्त दिए गए बच्ची के प्रसंग में यह तथ्य स्पष्ट भी  है जबकि वह बच्ची अन्य सभी क्षेत्रों में काफी होनहार थी। यह समस्या मैंने और भी बच्चों में आइडेंटीफाई किया है। इसीलिए मेरा अनुरोध है कि बच्चों को अंकों का ज्ञान जीरो से करवाएं और उन्हें यह जरुर बताएं कि जीरो है सबसे बड़ा हीरो अर्थात यह किसी भी अंक के दाहिनी ओर खड़ी हो जाती है तो उसका मूल्य दस गुना बढ़ जाता है तथा बायीं ओर खड़ी होने पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। आप बच्चों को कहानी रुप में बता सकते हैं कि अंकों की आपसी दोस्ती  कैसे उनका मूल्य बढ़ाती है।

प्रियंका कुमारी, शिक्षिका 
मध्य विद्यालय मलहाटोल, परिहार 
जिला - सीतामढ़ी, बिहार।
ई-मेल - pkjha2209@gmail.com 

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