जते हमर बच्चा सरकारी में उजिया गेल ओते त प्राइवेट में धके कुछो न भेल - गोनिया देवी, अभिभावक, मध्य विद्यालय मलहाटोल।
प्रसंग -2
मैडम जी,आप हमारे गांव के स्कूल में होती तो मैं अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूल से नाम कटवा कर सरकारी विद्यालय में लिखवा देता - राजमिस्त्री, विद्यालय की चारदीवारी निर्माण, रंजीतपुर, डुमरा।
कभी-कभी हम शिक्षकों को कुछ ऐसी उपर्युक्त लाइनें अभिभावकों से अनायास ही सुनने को मिल जाती है जिससे हम अंदर तक रोमांचित हो जाते है और अपने आप में एक नवीन उर्जा का संचार महसूस करने लगते हैं। प्रशंसा सभी को पसंद होती है। यह एक स्वाभाविक मानवीय गुण हैं। पर जब माहौल या कार्य संस्कृति बेहतर नही हो और साथ ही कई कोशिशों के बावजूद अपेक्षित परिणाम भी प्राप्त नहीं हो, इन नकारात्मक स्थितियों के बीच अचानक से कुछ प्रशंसा के शब्द आपके कानों से टकराते है तो आप में सकारात्मकता और नवीन उर्जा का संचार स्वाभाविक रूप से महसूस होने लगता है।
मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। मैं मिट्टी के टीएलएम तो पहले से बना ही रही थी,पर जब मुझे शैक्षिक संदर्भ में बालू में छिपे पत्थरों को देखकर अंतर्दृष्टि जगी तब मैं बालू से पत्थर चुन-चुनकर जमा करने लगी। चूंकि विद्यालय में चारदीवारी निर्माण का कार्य चल रहा था तो खेल के मैदान में बालू का ढ़ेर लगा था। एक दिन बच्चों की छुट्टी के बाद अचानक ही मेरी नजर कुछ काले-सफेद रंग के चिकने पत्थर पर पड़ी। वो काफी आकर्षक दिख रहे थे। मैंने उन पत्थरों को बालू से निकाला और अपनी कक्षा में बैठकर कुछ देर तक उसे निहारती रही। तभी एक-दो बच्चे मेरे पास आ गये और वो उन पत्थरों को छू कर खुश हो रहे थे (विद्यालय के नजदीक के कुछ बच्चे छुट्टी के बाद भी अपना ड्रेस चेंज कर और बस्ता रखकर खेलने या फिर मेरे पास रहने के लिए आ जाते है)।
बच्चों के चेहरे के भाव को देखते हुए समझ में आ गया कि बच्चे इन पत्थरों में रुचि ले रहे है। कुछ सोच कर मैं इस बार एक डब्बा लेकर बालू से पत्थरों को चुनने बाहर आ गई। मुझे पत्थर चुनता देख बच्चे भी पत्थर जमा करने लगे। अब हमारे पास काफी पत्थर जमा हो गए थे। पत्थरों को पानी से साफ कर हमने गिनना शुरू किया कि कितने पत्थर जमा हुए। बच्चों को यह देखकर बहुत मजा आ रहा था। लगभग 60-70 पत्थर हमने चुने थे। बच्चे भी पत्थरों को लेकर गिनने लगे थे। यह देखकर मैं इन पत्थरों का पहला उपयोग तो समझ चुकी थी कि यह हमारे गणना करने में सहायक होगा। छुट्टी का वक्त हो चुका था इसलिए हमने कक्षा में ही एक कोने पर उन पत्थरों को रख दिया।
अगले दिन मैं अपने साथ पेंट और ब्रश ले कर आई थी, क्योंकि मेरे मन में इन पत्थरों के उपयोग के कुछ अन्य विचार भी आ चुके थे। बच्चों के साथ बैठकर मैंने पत्थरों पर पेंट से अंक लेखन और वर्णमाला का लेखन प्रारंभ किया। हम सभी के लिए यह एक अनोखा और नया अनुभव था। पत्थरों पर पेंट से लिखे हुए अंक और अक्षर बहुत खूबसूरत दिख रहे थे। अब हमने कक्षा शिक्षण में इसका प्रयोग करना शुरू किया। सबसे पहले तो हमने पत्थर पर लिखे अंकों के सामने -सामने बच्चों को उतने ही पत्थर रखने को कहा ताकि बच्चों में अंक की अवधारणा स्पष्ट हो सकें। साथ ही हमने पत्थर पर जोड़ एवं घटाव का गणितीय चिह्न भी उकेरा था। इसीलिए दो अंकों के जोड़ -घटाव की प्रक्रिया भी बाकी पत्थरों की मदद से बच्चों के बीच करवायी गयी। बच्चे पत्थरों के साथ सीखने का बहुत आनंद ले रहे थे। कुल मिलाकर हमने इन पत्थरों की मदद से गिनती करना, जोड़ना -घटाना, अंकों की अवधारणा स्पष्ट करना तथा छोटी-बड़ी संख्याओं का निर्माण करना आदि बुनियादी संख्या ज्ञान का विकास बच्चों में करना शुरू किया।
बच्चों की रुचि को देखते हुए अब मैं रोज कुछ न कुछ पत्थर इक्ट्ठा करने लगी। यहां तक कि स्कूल आने के रास्ते में भवन निर्माण के लिए रखे बालू कही दिख जाते तो मैं वहां से भी पत्थरों को चुन लेती थी।
कुछ दिन बाद पुनः जब विद्यालय की चारदीवारी का प्लास्टर कार्य प्रारंभ हुआ तो फिर से बालू-सीमेंट आए। इस बार मेरे सहकर्मी शिक्षक ने कहा कि प्लास्टर के लिए बालू को जाली से छाना जाएगा तब सब पत्थर जमा हो जाएंगे और आप ले लीजिएगा। इस बार आप को बालू में से ढूंढने की आवश्यकता नहीं है। मैं खुश हो गई कि चलो इस बार पत्थर ढूंढने में बालू कोड़ना नही पड़ेगा। मैं अपने शिक्षण कार्य में संलग्न हो गई। पर जब छुट्टी के वक्त मैं बाहर यह सोचकर निकली कि अब तक तो बहुत सारे पत्थर जमा हो गए होंगे, लेकिन मुझे कहीं कुछ भी नजर नहीं आया। मैंने जब प्लास्टर का मसाला तैयार करने वाले से पत्थरों के बारे में पूछा तो वह बोला कि मैंने तो सारे पत्थर बचे हुए मसाले में डाल दिए ताकि वह गेट के पास ढ़लाई के काम में आ जाएंगे। वैसे भी आप पत्थर ले कर क्या करती। उसकी बात सुनकर मैंने अपना सर पिट लिया हे भगवान! मैंने तुरंत मसाले पर नजर डाली तो कुछ पत्थरों पर नजर पड़ी। ज्यादा तो नहीं मिल पाए पर 4-5 पत्थर ही मैं उस सीमेंट वाले मसाले से निकाल पाई। मैं अपने सहकर्मी शिक्षक पर भी बोली कि आपने तो बोला था कि आप रखवा देंगे पत्थरों को अलग। इसी चिल्मचिल्ली के बीच राजमिस्त्री भी आ गया हमलोगों के पास। वो भी सारी बात जानकर हंसने लगा कि अरे! मैडम जी आप इन पत्थरों को लेकर क्या करेंगी ? आप कोई बच्चे हैं जो पत्थर के साथ खेलेंगी.......?
अब मेरे सब्र का बांध टूट चुका था। मैंने कहा कि मेरे साथ चलिए मेरी कक्षा में। यह सुनकर उन्हें थोड़ा अचरज हुआ। मैंने पुनः शांत रहते हुए कहा कि आप लोग चलिए मेरी कक्षा में, मैं बताती हूं कि मेरे लिए यह क्यों जरूरी था। हंसते हुए वो लोग मेरी कक्षा में आ गए। फिर मैंने उनसे पुछा कि पहले यह बताइए कि आपके बच्चे पढ़ते हैं स्कूल में तो वो बोले कि हां। उन्होंने कक्षा भी बताई थी पर मुझे ठीक से याद नहीं। खैर, मैंने उन्हें अपने द्वारा जमा किए गए पत्थरों और उनपर किए गए पेंट को दिखाया। एक-एक कर मैंने उन सभी पत्थरों का बच्चों के सीखने में कैसे उपयोग किया जाता है, के संबंध में जानकारी दी। राजमिस्त्री के चेहरे से अब हंसी गायब थी और वो गंभीरता के साथ मेरी बातों को समझने की कोशिश करने लगे थे। फिर मैंने पूर्व में मिट्टी से बनाए टीएलएम उन्हें दिखाए और बताया कि यह सब मिट्टी का है। पहले मैं सिर्फ मिट्टी से टीएलएम बना कर बच्चों को पढाया करती थी पर अब इन पत्थरों से भी मैं वही काम ले रही। चूंकि मिट्टी के टीएलएम टूटने-फूटने और पानी से खराब होने की संभावना बहुत अधिक रहती हैं, पर इन पत्थरों से निर्मित टीएलएम के साथ टूटने और पानी से खराब होने का भय बिल्कुल नहीं है। इसीलिए मैं पत्थरों को संग्रहित करने के लिए परेशान हो रही थी।
मेरी सारी बातें जानकर और समझकर राजमिस्त्री ने हाथ जोड़ लिए और सीधे सपाट शब्दों में कहा कि मैडम जी आप अगर हमारे गांव के स्कूल में होती ना तो हम अपने बेटे को आप के पास ही पढ़वाते। इस पर मैंने कहा कि आपने तो बताया कि आपका बच्चा प्राइवेट स्कूल में जाता है और मैं तो सरकारी स्कूल की शिक्षिका हूं। यह सुनकर जो उन्होंने कहा वो मेरे लिए एक सर्वश्रेष्ठ प्रतिक्रिया थी। उन्होंने कहा कि मैं अपने गांव के ही सरकारी स्कूल में पढ़ा हूं,पर हमें इस तरह से पढ़ने-सीखने का मौका नही मिला। आप अगर हमारे गांव के विद्यालय में आ जाए तो हम अपने बच्चे को प्राइवेट स्कूल से नाम कटवा कर सरकारी स्कूल में दाखिला करवा देंगे, क्योंकि आप इतने अच्छे ढंग से बच्चों को बताती है सारी बातें। मैं थोड़ा सा मुस्कुराती और मैंने उनसे उनके गांव के स्कूल के बारे में जानकारी ली। वो स्वयं जिस शिक्षक से पढ़े थे उसके बारे में भी उन्होंने जानकारी दी। संयोगवश वो जिस शिक्षक से पढ़े थे वो अभी भी उन्हीं के विद्यालय में है और मैं उन्हें अच्छी तरह से जानती भी थी। चूंकि मैं कई प्रशिक्षणों में मुख्य प्रशिक्षक के रूप में अपने जिले के शिक्षकों को प्रशिक्षण दे चुकी हूं तो मेरी पहचान का दायरा इस लिहाज से विस्तृत था। मैंने उन्हें कहा कि मैं आपके शिक्षक से बात करुंगी और अपने तरीके भी उनके साथ साझा करुंगी। अगर आप को लगता है कि आपका बच्चा जहां अभी पढ़ रहा है, वहां बेहतर परिणाम देखने को नही मिल रहे तो आप बच्चे का नामांकन गांव के सरकारी स्कूल में बेहिचक करवा सकते हैं, क्योंकि अब हमारे बिहार के सभी सरकारी विद्यालय में एक से बढ़कर एक प्रशिक्षित शिक्षकों नियुक्ति हुई है। राजमिस्त्री के चेहरे पर काफी संतोषजनक भाव थे जिसे देखकर मैंने कहा कि अब तो आपलोग मेरे लिए पत्थर छांट कर रख देंगे ना। मेरी बात पर हंसते हुए सभी ने कहा जी, जरूर और साथ ही मैं अब जिस भी विद्यालय में काम करने जाउंगा तो मैं आपके इस टीएलएम के बारे में वहां के शिक्षकों को जरूर बताऊंगा कि फलां विद्यालय की मैडम इस तरह से पढ़ाती है। यह सुनकर सच में मन बहुत प्रफुल्लित हुआ। टीएलएम की कुछ तस्वीरें लेकर राजमिस्त्री वापस अपने काम में लग गए।
तो इस तरह से पहले प्रसंग वाले राजमिस्त्री तो संतुष्ट हो कर अपने कार्य पर निकल गए। पर दूसरे प्रसंग में गोनिया देवी जो अभिभावक थी वो कक्षा में अपने पोते -पोतियों को खाने के लिए बुलाने आई थी।
मैंने उन्हें टोका कि अरे, आप क्या कर रही है... क्लास में से बच्चों को क्यों ले जा रही है। इस पर उन्होंने कहा कि जते हमर बच्चा सरकारी में उजिया गेल ओते त प्राइवेट में धके कुछो न भेल....हम सब देख के बैठ चुकल छी।
अभी इ बच्चा सब के जाए दिअऊ,भूखले हई।
बात करने पर पता चला कि बच्चों की माता विद्यालय के समय पर खाना नही बनाती थी बल्कि अपने समय के हिसाब से बनाती थी। परंतु बच्चों की दादी को यह बिल्कुल भी पसंद नहीं था कि बच्चे लेट से स्कूल जाए। उनका मानना था कि भूखे पेट ही सही पर विद्यालय समय पर जाना चाहिए। इसलिए वो बच्चों को खाना बनने के समय के स्थान पर विद्यालय के समयानुसार विद्यालय भेजने में यकीन करती थी। परंतु एक महिला अभिभावक अपने प्रेम और मातृत्व के नैसर्गिक गुणों से स्वयं को अछूता कैसे रख सकती थी। बच्चों ने सुबह से कुछ खाया नहीं था इसलिए वो कुछ देर की छुट्टी मांगने लगी। चूंकि बच्चों के मुरझाए चेहरे और दादी के अनुरोध को देखते हुए मैंने छुट्टी दे दी। चूंकि बच्चों का घर विद्यालय के पड़ोस में ही था इसलिए मुझे पता था कि बच्चे वापस लौटने में अधिक समय नहीं लेंगे। मैंने भी बच्चों की दादी से कहा कि अगली बार से इन चीजों का ध्यान रखिए, क्योंकि जिस तरह से बच्चों का समय पर स्कूल आना आवश्यक है उसी प्रकार से उनका समय पर सुबह-सुबह कुछ भी खाना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने सहमति जताई और बच्चों को भोजन के लिए ले गई। वो तो चली गई पर उनके शब्द मेरी कानों में गूंजते रहे। मैंने अपने कलिगस से भी उनकी सकारात्मक सोच के संबंध में बातें साझा की।
सच में अभिभावकों के द्वारा अनायास ही दी गई प्रतिक्रियाएं या बातें एक शिक्षक के लिए अमूल्य संपदा बन जाती है। सही मायने में शिक्षकों की वास्तविक कमाई यही है। अभिभावकों का शिक्षकों पर भरोसा उनके जीवन का सबसे बड़ा पुरस्कार है।
धन्यवाद।
प्रियंका कुमारी, शिक्षिका
मध्य विद्यालय मलहाटोल, परिहार,
सीतामढ़ी, बिहार।
संपर्क - pkjha2209@gmail.com
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