प्रतिवर्ष नये शैक्षणिक सत्र के दौरान नामांकन अभियान जोर-शोर से चलाए जाते हैं। बच्चों का नामांकन भी होता है। अभिभावक नामांकन के लिए आते हैं तो वो जिस नाम या तरीके से बच्चों को घर पर पुकारते हैं वो वहीं नाम नामांकन के समय भी लिखवा दिया करते हैं (खासकर सुदूर देहाती क्षेत्रों में अवस्थित विद्यालय के संदर्भ में)। बहुत से विद्यालय के प्रधान शिक्षक भी अक्सर अभिभावक द्वारा बोले गए नाम को ही ज्यों का त्यों लिख दिया करते हैं। इस संबंध में मेरे स्वयं के विद्यालय में भी मैंने इस तथ्य को अनुभव किया है। मुझे भी कई बार बच्चों का नाम नामांकन पंजी में दाखिल करने का अवसर मिला है और इस दौरान मैंने अभिभावकों को बच्चों के नाम के संबंध में समुचित जानकारी दी है जिससे बहुत से बच्चों का नाम उचित रूप में जैसा होना चाहिए वह लिखा गया। अन्यथा की परिस्थिति में बच्चों के बड़े अजीबोगरीब नाम देखने को मिल जाया करते हैं जिससे आगे चलकर बड़े होने पर बच्चों को असहज महसूस करना पड़ सकता है।
बच्चों का सही-सही नाम लिखना और बोलना ना सिर्फ हमारी एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है बल्कि यह बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य एवं प्रसन्नता का भी विषय है। अभी दो दिन पूर्व ही एक छह वर्षीय बच्ची के अनुभव को सुनकर मेरा शिक्षक हृदय इस विषय वस्तु पर लिखे बिना नही रह सका। आइए जानते हैं शैक्षणिक सत्र -2024-25 में नामांकित पहली कक्षा की छात्रा गंगा का अनुभव जिसने मुझे इस आलेख को लिखने की प्रेरणा दी।
गंगा जो कि मेरी ही कक्षा की छात्रा है। वो बहुत ही कम बोलती है। जब भी उसे कुछ कहती हूं तो वह बस आंखों से एक टक देखा करती रहती हैं मुझे। उसके मुंह से कुछ भी बुलवाने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती है। कक्षा में भी वह हमेशा गुमसुम सी रहती थी और नियमित रूप से कक्षा में आती भी नहीं थी। अन्य बच्चों से पता करने पर मालूम हुआ कि उसकी मां उसे मारती भी और गालियां भी देती हैं।वजह पुछने पर घर के काम में सहयोग यथा मवेशियों के लिए खेतों से घास काट कर नही लाना आदि बताया गया। उसकी मां से मिलकर बात की तो उसने इस बात से इंकार कर दिया कि वो खुद विद्यालय नही जाती। पर जब धीरे-धीरे गंगा से दोस्ती कर मैंने उससे पूछा तो उसने बताया कि उसे उसकी मां मारती है और गालियां भी देती हैं। फिर मैंने उसे आश्वस्त किया कि मैं उसकी मां से बात करुंगी और उन्हें समझाऊंगी। मैंने कई दफे उसकी मां से बात किया। पहले तो मैंने उसकी मां को लगभग डांटते हुए कहा कि खबरदार! जो मेरी छात्रा गंगा को आपने मारा या गालियां दी। मुझे सारी बातें मालूम है,अगली बार से मुझे अगर इस प्रकार की बातें सुनने को मिली कि आप बच्ची के साथ इस प्रकार का व्यवहार करती है तो फिर ठीक नही होगा। फिर बाद के कई मीटिंग्स में मैंने उन्हें विशेष तौर पर समझाया कि अभी इस उम्र के बच्चों को अधिक से अधिक प्रेमपूर्ण व्यवहार की आवश्यकता होती है। आप अपने बच्चों से जितना अच्छा व्यवहार करोगी , बच्चों का मस्तिष्क उतना अच्छा विकसित होगा और वो भावी जीवन में बेहतर कर पाएंगे। बच्ची की माता को अपनी गलती का एहसास हो चुका था और वो अब पहले से काफी अधिक सकारात्मक है बच्चों के प्रति व्यवहार को लेकर। अब गंगा नियमित रूप से विद्यालय आती हैं।
खैर, हमारे आलेख का मुख्य उद्देश्य नाम की महत्ता को लेकर के था, लेकिन यहां मैंने उपरोक्त बातें इसलिए स्पष्ट रूप से लिखी ताकि गंगा की मनोस्थिति को समझा जा सके और आप गंगा के अपने नाम को लेकर के जो उसके हृदय में भाव आएं और वह भाव कितना अमूल्य था, उससे स्वयं को आप जोड़ सकें एवं समझ सकें। गंगा अब नियमित रूप रुप से विद्यालय तो आ ही रही है और साथ में वो छुट्टी के बाद भी मेरे आस-पास ही रहती हैं जब तक की मैं स्कूल से अपने घर ना चली जाऊं। उस दिन भी मैं बच्चों की छुट्टी होने के बाद कुछ टीएलएम बना रही थी अपनी कक्षा के बच्चों के लिए। गंगा मेरे आस-पास ही मंडरा रही थी। कभी वो बगल में बैठ कर टीएलएम देखने लगती तो कभी सामने वाली बेंच पर बैठकर चुपचाप देखती तो कभी वह पिठुआ के फलों से गिनती करने लगती। चूंकि नियमित विद्यालय आने के बावजूद भी वह अभी भी बहुत ही कम बोलती है और इस दिशा में मैं प्रयासरत हूं कि वह खुलकर अपनी बातों को सभी के समक्ष रख सकें।
मैं अपने काम में लगी थी कि उसने अचानक से कुछ धीमे से कहा जो कि मुझे समझ नहीं आया। मैंने फिर से बोलने के लिए कहा और उसने फिर से बोला जिससे मुझे बस इतना समझ आया कि वो अपने नाम के बारे में कुछ बोल रही है। अब मैं रूक गई और टीएलएम की सामग्री को किनारे कर इत्मीनान से उससे पुछा कि वो क्या बोल रही थी तो उसने बोला कि "गंगा नाम कते बिजोड़ हई न... उसने इस बात को दो-तीन बार दोहराया। मैंने गौर किया कि उसकी आंखों में चमक और होंठों पर हल्की शर्मिली सी मुस्कुराहट थी जिसे देखकर मुझे बहुत सुकून मिला और मैंने अपना पूरा ध्यान उसकी बातों पर लगा दिया। मैंने उससे कहा कि हां गंगा नाम बहुत सुंदर है। वह अब मुस्कुरा कर चुप हो गई,पर मेरे लिए यह एक अवसर था जिसके माध्यम से मैं उसे अपनी मन की बातें साझा करने के लिए प्रेरित कर सकती थी। मैंने फिर आगे उससे पुछा कि गंगा नाम तो सच में सबसे सुंदर है, पर तुम्हें यह बात किसने बतायी तो वह बोली आधार कार्ड और फिर चुप हो गई। दो -चार सेकेंड के लिए तो मुझे समझ नहीं आया पर तुरंत ही मैं समझ गई कि वो शायद आधार कार्ड बनवाने के लिए अपने माता-पिता के साथ कही गई रही होगी। इसलिए मैंने पुछा कि वो परिहार (प्रखंड का नाम) गई थी उसने ना में सिर हिलाया, फिर मैंने पुछा वो नरगां(पंचायत का नाम) गई थी तो उसने बोला नही और फिर चुप हो गई। कुछ सेकेंड के इंतजार के बाद उसने बोला कि वो हरदहिया (पड़ोसी गांव का नाम) गई थी। फिर मैंने बोला कि अच्छा हरदहिया में बना आधार कार्ड। वो बोली हां। फिर उसने बताया कि आधार कार्ड बनाने वाले ने उसका नाम पुछा और जब नाम बताया तो वो बोला कि गंगा नाम तो बहुत बेजोड़ है। फिर मैंने उससे पुछा कि आपको अच्छा लगा यह बात सुनकर, तो वह बोली हां मुझे बहुत अच्छा लगा। फिर मैंने उसके सर पर हाथ फेरते हुए कहा कि हां तुम्हारी ही तरह तुम्हारा नाम भी बहुत खूबसूरत है। मैंने पहली बार उसे इतना खुश महसूस किया। उसकी खुशी उसकी आंखों और मुस्कान में झलक रही थी। मेरे भी घर जाने का समय हो गया था इसलिए मैंने गंगा को घर जाने के लिए कहा। वो चली गई लेकिन मैं कुछ देर वही बैठी रह गई यह सोचते हुए कि बच्चों को छोटी-छोटी बातों से भी कितनी अधिक खुशियां मिलती हैं। चुपचाप और गुमसुम रहने वाली गंगा आज अपने नाम को लेकर कितनी खुश महसूस कर रही है। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि वह अपनी प्रसन्नता अपनी वर्ग शिक्षिका से साझा कर पा रही है। सच में बच्चों के नाम का भी अपना महत्व है।
नाम को लेकर के गंगा के इस अनुभव ने मुझे बच्चों के नाम के प्रति मेरी धारणा को और अधिक मजबूत किया। मैं इस आलेख के माध्यम से आप सभी वैसे विद्यालय प्रधान से अनुरोध करना चाहती हूं जो कि बच्चों के नामांकन के समय बच्चों के नाम को अशुद्ध या विकृत रूप में लिख दिया करते हैं अथवा अभिभावकों को बच्चों के गलत या अशुद्ध नाम के संबंध में मार्गदर्शित नही करते है तो कृपया कर वैसे अभिभावकों को जरूर बच्चों के सही/गलत नाम के संबंध में जानकारी दें ताकि आगे चलकर बच्चों को कभी भी अपने नाम के संबंध में असहजता का भाव नही आए। पिछले महीने मैंने विद्यालय में एक मेडिकल कैंप भी लगवाया था जिसमें IGIMS पटना के चिकित्सक दल आए थे और वो भी नाम के संबंध में अपनी राय जाहिर कर रहे थे कि लोग कैसे ऐसे-ऐसे नाम रख लेते हैं।
खैर! बच्चों का नाम रखना एक नितांत निजी फैसला है और नाम रखने अधिकार पूरी तरह से अभिभावकों का होता है परंतु बतौर शिक्षक हमारा भी कर्तव्य बनता है कि अगर बच्चों के सही नाम भी अगर गलत तरीके से उच्चारित किए जा रहे हैं अथवा रजिस्ट्रर्ड करवाएं जा रहे हैं तो उनके संबंध में अभिभावकों को उचित मार्गदर्शन दिया जाएं, क्योंकि मुझे लगता है कि विद्यालय ही वह प्राथमिक स्थान है जहां बच्चों के संबंध में हर प्रकार की गलतियों को सहजता से सुधारा जा सकता है। साथ ही गंगा के अनुभव ने मेरी इस धारणा को मजबूत किया है क्योंकि जब एक अंतर्मुखी बच्ची अपने नाम को लेकर अपनी प्रसन्नता जाहिर कर सकती है और यह उसके मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में अपनी भूमिका निभा सकता है तो एक बहिर्मुखी बच्चा अपने अशुद्ध नाम को लेकर अपनी असहजता भी जाहिर कर सकता है और यह उस बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करने में अपनी नकारात्मक भूमिका भी निभा सकता है।
इसलिए नामांकन के समय बच्चों के भावी जीवन के मानसिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए उचित/आवश्यक मार्गदर्शन अभिभावकों को जरूर दें। खासकर, तब जब आपके अभिभावक समूह शैक्षिक तथा सामाजिक-आर्थिक रुप से अभिवंचित समूह (SEDGs) से संबंधित हो।
नोट- अपने आलेख में मैंने गंगा नाम की छात्रा का अनुभव साझा किया है और इस आलेख की प्रेरणा भी वही है। परंतु नाम के संबंध में मार्गदर्शन करने का तात्पर्य इस संदर्भ में बिल्कुल ना समझे कि बच्चों का नाम धार्मिक या अन्य प्रतीकों का सूचक हो। बस मार्गदर्शित करने का मूल संदर्भ यह है कि राधा को रधिया,दिलीप को दिपील और स्वाति को वस्ति ना लिखा जाए। साथ ही मनतोरनी,मनटूटनी,कारी आदि भावानात्मक परिस्थितिजन्य नाम का भी प्रयोग बच्चों के संबंध में अधिकारिक रूप से करने से बचा जाएं।
धन्यवाद।
प्रियंका कुमारी , शिक्षिका
मध्य विद्यालय मलहाटोल, परिहार
जिला - सीतामढ़ी, बिहार।
संपर्क - pkjha2209@gmail.com
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