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विद्यालयों में अनुश्रवण/अनुसमर्थन




पिछले 17 वर्षों से अधिकारिक रूप से शिक्षण कार्य से जुड़ी हूं। इस दौरान बहुत से लोगों यथा -विभागीय पदाधिकारियों, बीआरपी, जनप्रतिनिधि, जनसामान्य आदि आदि को विद्यालय में आते-जाते देखती रही हूं। जितने भी लोग आए उन सभी का कहीं न कहीं बच्चों की शिक्षा और विद्यालयी व्यवस्था के साथ दायित्व जुड़ा था। परंतु आज तक मैंने किसी को भी बच्चों या शिक्षकों के साथ बैठकर बातें करते हुए कभी नहीं देखा। कभी भी किसी ने शिक्षकों को या बच्चों को क्या कुछ परेशानियां हो रही है या फिर प्रतिकूल वातावरण/परिस्थितियों में भी शिक्षक कक्षा में बच्चों के लिए जो प्रयास कर रहे हैं , उसे देखने या जानने में किसी की कोई दिलचस्पी नहीं दिखी। अगर कुछ दिखा तो सिर्फ निरीक्षणकर्ता वाला रसूख.....जिसकी बच्चों की शिक्षा में कोई उपयोगिता /सार्थकता नही थी।
               आज मैं यह आलेख इसलिए लिख रही हूं कि हाल ही में पटना से कमलनाथ झा जी जो कि हमारे जिले सीतामढ़ी में एफ एल एन की जिला स्तरीय बैठक के लिए आए थे, उन्होंने मेरे विद्यालय के भ्रमण की इच्छा जताई थी और मैं उन्हें अपने विद्यालय ले भी गई थी। इस दौरान मैंने बच्चों के साथ जो उनका व्यवहार देखा और साथ ही उनसे बातचीत के दौरान जो अनुभव मुझे मिले वो काफी प्रेरित करने वाले रहे। और यही वजह है कि मुझे यह आलेख लिखने की जरूरत महसूस हुई।
चूंकि मैं तीन दिन के लिए डायट डुमरा में प्रतिनियुक्त थी क्योंकि मैं डायट के लिए दीक्षा पोर्टल पर कोर्स सामग्री निर्माण कार्य में संलग्न थी। इसलिए जब मुझे बीईपी कार्यालय से काॅल आया तो मैं वहां अपनी दो पुस्तक के साथ कमलनाथ सर से मिलने पहुंची। उन्हें किताबें भेंट की।
कुछ औपचारिक बातचीत के बाद उन्होंने विद्यालय भ्रमण की बात कही। सर ने मेरा परिचय वहां अन्य लोगों से यह करवाते हुए कहा था कि यह नवाचारी शिक्षिका है और बहुत अच्छा लिखती भी हैं।
 वहां उपस्थित सभी लोगों को लगा कि शायद मेरा विद्यालय बहुत ही बेहतरीन है इसलिए किन्हीं एक ने पुछ लिया कि पीएम श्री के लिए आपने आवेदन किया है या नहीं।  फिर मैंने कहा कि नहीं, मेरे विद्यालय में अभी भी कई बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। फिर मैंने कमल सर को भी कहा कि मेरे विद्यालय में ऐसा कुछ भी नहीं है जो बहुत भव्य लगे। हां बस एक बात है कि आप यह देख सकते हैं कि प्रतिकूल परिस्थितियों में भी हम बच्चों की शिक्षा के लिए प्रयासरत हैं। वहीं एक सर ने भी बताया कि यह विद्यालय जिला मुख्यालय से काफी दूर है। लगभग डेढ़ घंटे जाने में और डेढ़ घंटे आने में खर्च हो जाएंगे। पर आश्चर्य कमल सर ने मुस्कुराते हुए कहा कि कोई बात नहीं,जितना भी समय लग जाएं। सर की इच्छाशक्ति को देखते हुए मैंने डायट प्रिंसिपल से अनुमति लेकर सर को अपने विद्यालय भ्रमण पर ले कर चली। रास्ते में सर ने स्कूल के बच्चों के लिए पर्याप्त मात्रा में अच्छी गुणवत्ता वाली बहुत सारी चाॅकलेट भी ली, जिसे देखकर मन ही मन आश्चर्यमिश्रित खुशी भी हुई।
खैर, हम विद्यालय पहुंचे। बारिश भी हो रही थी। चारदीवारी निर्माण कार्य भी चल रहा था इसलिए स्कूल कैम्पस अस्त-व्यस्त स्थिति में ही थे। सर को सबसे पहले मैं पहली और दूसरी कक्षा जो साथ में ही चलते हैं, वहां ले गयी। हमारी प्रभारी प्रधानाध्यापिका मैम भी आ कर मिली उनसे। अब सब लोग कक्षा में बच्चों के बीच थे। बच्चों की संख्या आम दिनों से कम थी जिसमें बारिश और मेरी अनुपस्थिति का योगदान था। 
कमल सर बच्चों के पास जा कर उनसे बात करने लगे। बहुत ही सरल बातें उन्होंने बच्चों से की। मेरे कुछ टीएलएम थे जिनकी मदद से उन्होंने बच्चों की संख्या ज्ञान को समझने का प्रयास किया।

कक्षा में दीवार पर बनाए गए फूल का नाम भी बच्चों से जानने की कोशिश की। कुल मिलाकर बच्चों से उन्होंने सिर्फ ऐसे सवाल किए जो उन्हें कहीं से भी असहज महसूस ना करवा सकें। बच्चों के लिए भी यह अनुभव नया था कि कोई बाहर से आये अनजान व्यक्ति उनसे बातचीत कर रहे हैं या फिर कोई सवाल-जवाब कर रहे हो। बच्चों ने कुछ बताया और कुछ नहीं भी बताया। फिर वह तीसरी -चौथी कक्षा-कक्ष में गये और दीवार पर लगी एक पोस्टर में प्रिंट कुछ शब्दों को पढ़ने को कहा।‌ बच्चों के बीच अंत्याक्षरी भी करवाई और इस पर बात भी की। फिर वह अंतिम कक्षा में गये जहां बाकी सभी कक्षा के बच्चे एक ही कमरे में बैठे थे। उन्होंने बच्चों से कोई सवाल ना कर सिर्फ शिक्षकों से सवाल किया कि आप ऐसी स्थिति में कैसे पढ़ाते हैं या फिर आपके पढ़ाने का क्या तरीका होता है। शिक्षकों के पास कुछ संतोषजनक जवाब नहीं हो सकता है इसका, यह जानते हुए भी उन्होंने सिर्फ शिक्षकों से उनकी स्थिति जानने के लिए यह सवाल किया था। इसके बाद उन्होंने प्रभारी महोदया से कुछ बिंदुओं पर बात की और उन्हें सुझाव दिया कि जो कमरे उपलब्ध है आप उन्हें बच्चों के बैठने के लिए व्यवस्थित करें। शैक्षणिक/गैर शैक्षणिक सामग्रियां रखने के लिए वो अन्य विकल्प का प्रयोग करें जो कि विद्यालय में मौजूद हैं। विद्यालय में कार्यालय कक्ष भी प्रतिकात्मक रुप से ही था। 
पुनः एक बार कमलनाथ सर हमारी कक्षा में आएं। मेरी कक्षा सहित विद्यालय में उपस्थित सभी बच्चों के बीच चाॅकलेट का वितरण करवाया गया। बच्चे बहुत खुश थे। चूंकि मेरी कक्षा के बच्चे बहुत ही कम उपस्थित थे फिर भी मैंने बच्चों से अनुरोध किया कि वो निपुण बिहार और निपुण भारत का गीत गा कर सुनाएं।

बच्चे हमेशा मेरी मोबाइल या लैपटॉप में निपुण गीत सुना करते थे, इसलिए उनकी चुप्पी से मुझे अंदाजा हो गया था उनकी हिचकिचाहट का। मैंने बहुत ही धीमी आवाज में निपुण बिहार का गीत लगाकर मोबाइल बच्चों के हाथ में थमा दिया तो वह गाने लगे। बीच-बीच में बच्चों का साथ मैं भी देती रही गाने में। फिर बच्चों ने निपुण भारत का भी गीत गाने की कोशिश की। बच्चे निपुण गीत को बहुत अच्छे से गा तो नहीं सके पर उन्होंने यह एहसास जरुर करवा दिया कि वह इस गीत को सुनते हैं,गाते हैं और पसंद भी करते हैं। 
सच कहूं तो मुझे भी बहुत अच्छा लग रहा था कि बच्चों से बातचीत की जा रही है और उनसे उनके पसंद की बात की जा रही है और साथ ही बच्चों द्वारा किसी सवाल का जबाब नहीं दे पाने की स्थिति में बच्चे या शिक्षक को रिग्रेट फील नही करवाया जा रहा। अपितु स्थितियों में सुधार के संबंध में बातचीत की जा रही है। मेरी भी कक्षा-कक्ष में बारिश के दिनों में एक भौतिक समस्या उत्पन्न हो जाती थी जिसके संबंध में प्रभारी प्रधानाध्यापिका से सर ने थोड़ी सी शब्दों की सख्ती के साथ बोला कि इसे दो दिनों में ठीक करवा दीजिए और ऐसा हुआ भी। दो दिन तो नही पर चौथे दिन उस समस्या का समाधान पूरी तरह से कर दिया गया। जिसके लिए मैं सर का आभार प्रकट करती हूं। 
बच्चों के बीच चाॅकलेट का वितरण कर हम वापस जिला मुख्यालय की ओर लौटें क्योंकि मुझे पुनः अपने पेंडिंग वर्क डायट पहुंच कर करने थे। सर से रास्ते में बच्चों की शिक्षा और इससे जुड़ी चिंताजनक स्थितियों के संबंध में बहुत सी बातचीत हुई। चिंताजनक स्थिति से तात्पर्य व्यापक संदर्भ में था यह सिर्फ मेरे विद्यालय से जुड़ा नही था। 17 वर्षों में मेरे लिए यह एक बिल्कुल नवीन अनुभव था कि विभागीय प्रतिनिधित्व करने वाले किन्हीं व्यक्ति द्वारा शिक्षक/छात्र उपस्थित या मध्याह्न भोजन योजना से इतर बच्चों से बातचीत की गई है, बच्चों की लर्निंग और शिक्षकों से उन स्थितियों पर बात की गई जिससे बच्चों की शिक्षा प्रभावित हो रही है। यह निश्चय ही एक सुखद अहसास हैं मेरे लिए। 
बच्चों की शिक्षा के लिए बहुत से उपाय किए जा रहे हैं। स्कूल से लेकर बच्चे तक को सभी सुविधाओं से लैस किया जा रहा है। ऐसे में यह भी आवश्यक है कि हमारे शिक्षा विभाग के जो भी बड़े या छोटे स्तर पर जिन्हें भी विद्यालयों के अनुश्रवण का प्रभार दिया जा रहा है उन्हें कम से कम इस बात का भी प्रशिक्षण दिया जाए कि एक अनुश्रवणकर्ता को अनुसमर्थन का भी ज्ञान तथा अपनी जिम्मेदारी का भान होना आवश्यक है। सिर्फ दो या चार पेज के काॅलम को भर कर सबमिट कर देना अनुश्रवण का लक्ष्य नही होना चाहिए। चूंकि इसमें भी भारी अनियमितताएं बरती जाती हैं जिसकी चर्चा मैं नही करुंगी। पर एक अनुरोध तो रहेगा ही विभाग से की विद्यालय में संवेदनशील लोगों को भेजा जाए जो बच्चों और शिक्षकों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लक्ष्यों की प्राप्ति की दिशा में प्रेरित कर सकें,ना कि उनकी स्वप्रेरणा को भी ध्वस्त कर दें। मैंने कई अच्छे शिक्षकों को डिमोटिवेट होते देखा है। पूर्ववर्ती समय में मैं भी डिमोटिवेशन के उपक्रमों से गुजरी हूं। ऐसे में बतौर शिक्षक मुझे लगता है कि एक अभियान शिक्षकों को मोटिवेट करने के लिए भी चलाया जाए‌ और हर विद्यालय में एक कमलनाथ जी जैसे विजीटर्स भी भेजे जाएं।

धन्यवाद।
प्रियंका कुमारी, शिक्षिका 
मध्य विद्यालय मलहाटोल, परिहार 
जिला - सीतामढ़ी, बिहार।
संपर्क - pkjha2209@gmail.com


Comments

  1. आप अच्छा लिखती हैं। फीडबैक के लिए बहुत बहुत शुक्रिया।
    कमल

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    Replies
    1. मैंने बस इतना ही लिखा ,जितना की मैं उस समय आँखों देखी महसूस कर सकी थी | वर्तमान परिदृश्य में अनुसमर्थन की नितांत आवश्यकता हैं | आपका धन्यबाद|

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