इस आलेख के माध्यम से हम जानेंगे कि प्राथमिक कक्षाओं में बच्चों के लिए पानी की उपलब्धता उनके बेहतर स्वास्थ्य के साथ-साथ कक्षा संचालन में भी किस प्रकार सहायक है।
कक्षा कक्ष में पानी की उपलब्धता के संबंध में लिखने से पूर्व आइए दो प्रसंग को समझते है -
प्रसंग -1
छोटे बच्चे खासकर पहली-दूसरी के पानी पीने के लिए पांच मिनट की छुट्टी मांग कर जाते हैं और पानी पीने के बाद ससमय कक्षा में ना लौटकर इधर-उधर कुछ देखने लगते या फिर कुछ-कुछ खेलने में लग जाते हैं। चूंकि चारदीवारी नही है तो कभी-कभी बच्चे घर की ओर भी चले जाते हैं।
प्रसंग -2
भीषण गर्मी में दोपहर के समय में कक्षा-कक्ष में एक ही पंखे की उपलब्धता और बार-बार बिजली गुल होने के कारण गरमी और उमस का प्रभाव कक्षा-कक्ष में बढ़ता चला जाता है। बच्चे असहज और बेचैन महसूस करने लगते हैं। ऐसे में एक छात्रा सिर में तेज दर्द और सर घुमने की बात कहती हैं। तुरंत उसे ठंडा पानी पिलाया और चेहरा पानी से पोंछा। छात्रा बेहतर महसूस करने लगती हैं।
बच्चे पहले भी इसी सिस्टम में रहा करते थे। परंतु प्रतिवर्ष गर्मी के मौसम में तापमान बढ़ता जा रहा है जिसके कारण प्रत्येक व्यक्ति परेशान हैं। खासकर इस वर्ष गर्मी ने अपना भीषण रूप दिखाया है जिसके कारण बच्चे प्रभावित हुए और हो रहे हैं।
बतौर शिक्षक अपने कक्षा के बच्चों की इस समस्या को देखते हुए मैंने अपने कक्षा-कक्ष में पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करने के संबंध में चिंतन करना शुरू किया। चूंकि उपर्युक्त दोनों प्रसंग में प्रमुख तत्व पानी है क्योंकि बच्चों का पानी पीने के बाद इधर-उधर ध्यान भटक जाना या खेलना या स्कूल के पीछे घर होने के कारण घर की ओर चले जाना, सिर्फ उनकी नादानी का प्रतीक है क्योंकि पहली कक्षा के बच्चों को शायद ही यह बोध होता है कि पानी पीने के बाद सीधे कक्षा-कक्ष में ससमय नही पहुंच पाना कोई गलत बात है। मेरे विचार से यह सिर्फ बोध की कमी है। इसलिए मैंने बच्चों के लिए कक्षा-कक्ष में ही पीने योग्य पानी की व्यवस्था की और उसे कक्षा के अंदर ही मुख्य द्वार की ओर से रखा। शुरुआत मैंने जग और गिलास से की और बच्चों को कहा कि जिन्हें भी पानी पीना है वो अपनी सीट पर बैठे रहे। मैं उन्हें पानी उपलब्ध करवा दूंगी। जब मैंने पूछा कि किस-किस को पानी पीना है...मैं लाकर देती हूं तो इस बात पर सारे बच्चे थोड़े सकुचा गए। जो बच्चे पानी पीने के लिए छुट्टी मांग रहे थे वो भी कुछ नही बोले। फिर एक छात्रा ने हाथ उठाकर धीरे से कहा कि मुझे पीना है। मैं मुस्करा कर उसे आधा ग्लास पानी दी और बोली कि कोशिश करना कि पानी उपर से ही पी सको। बच्ची ने बहुत सावधानी के साथ ग्लास को बिना मुंह लगाएं सारा पानी पी गई। चूंकि स्वास्थ्य नियमों को ध्यान में रखते हुए मैंने उस बच्ची को पानी उपर से ही पीने को कहा था बिना मुंह लगाएं ताकि अन्य बच्चे भी उस ग्लास से ही पानी पी सके। पर शायद यह बच्चों के लिए एक गेम खेलने जैसा फीलिंग दे गया। अब झिझक तोड़ चार-पांच और बच्चों ने पानी पीने की इच्छा जताई। सभी बच्चों को मैंने उनके सीट पर ही बैठे-बैठे पानी उपलब्ध करवाई जिससे बच्चे आश्चर्यमिश्रित मुस्कान से भरे थे। इसके बाद बच्चों ने दोगुने उत्साह से शिक्षण प्रक्रिया में भाग लिया। कल हो कर भी मैंने पुनः वही प्रक्रिया दोहराई जिससे मुझे यह लाभ मिला कि बच्चे अब सिर्फ शौचालय जाने के लिए ही कक्षा-कक्ष से बाहर निकलते जिसकी बारंबारता नगण्य थी। अब बच्चे बेझिझक होकर पानी मांग कर पी रहे थे और अब एक जग से काम चलना मुश्किल हो गया। फिर मैंने दो लीटर, डेढ़ लीटर और दो सौ एमएल वाली कुछ बोतलों में पानी रखना शुरू किया ताकि बच्चों के लिए पानी कम नही पड़े और उन्हें कक्षा-कक्ष से बाहर नही जाना पड़े। ऐसे भी कक्षा-कक्ष से बाहर बहुत धूप होती थी जिसके कारण भी मैं नही चाहती थी कि ये छोटे बच्चे बाहर निकले। अब बच्चे भी प्यास लगने पर स्वयं उठकर छोटी वाली बोतलों से पानी पी लेते हैं और अपनी सीट पर आकर बैठ जाते हैं।
इस तरह से हमने अपने प्रसंग-1 वाली स्थिति पर नियंत्रण प्राप्त कर लिया था परंतु प्रसंग -2 ने मुझे ठंडे पानी की उपलब्धता पर सोचने को बाध्य किया। तापमान की अधिकता से बोतलों के पानी की ठंडक कुछ ही मिनटों बाद समाप्त हो जाती थी। ऐसे में मैंने साढ़े सात लीटर का एक वाटर केन जिसमें 5-6 घंटे पानी ठंडा रह सकता था और ग्लास खरीदा(निजी कोष से) ताकि बच्चे अपने हिसाब से ढंडा पानी लेकर पी सकें, क्योंकि बड़े बोतलों से पानी निकाल कर पीने में हर बार उन्हें मेरी सहायता की आवश्यकता पड़ती थी। चूंकि मेरी कक्षा के बच्चे 6 से 7 आयु वर्ग के रहते हैं ऐसे में मेरा इस समस्या पर ध्यान देना स्वाभाविक था। साथ ही बच्चों में अप्रत्यक्ष रूप से अनुशासन का अभ्यास भी करवाना आवश्यक था। इस तरह से बच्चों को कक्षा-कक्ष में ही पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करवा कर मैंने कुछ असहज स्थितियों को नियंत्रित करने में सफलता प्राप्त की।
परंतु यहां मेरा उपरोक्त विवरण लिखने का उद्देश्य कुछ और है। ठीक से याद नहीं पर मैंने कही पढ़ा था कि किसी देश के विद्यालय के बारे में की वहां बच्चों को कक्षा-कक्ष में ही पानी पीने के लिए ब्रेक दिया जाता है। जब मैंने अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप बच्चों के लिए कक्षा-कक्ष में पानी की उपलब्धता सुनिश्चित की तो उसके बाद मेरे मन में ख्याल आया कि मुझे एक्सप्लोर करना चाहिए कि वो किस देश का विद्यालय था जहां बच्चों को पानी पीने के लिए कुछ खास नियम बनाए गए हैं। मैंने गूगल पर सर्च किया तो मुझे पता चला कि कोई और नहीं हमारे भारत देश में ही वाटर बेल का सिस्टम कुछ राज्यों द्वारा लागू किया गया है जिसमें कुछ खास अवधि के दौरान यथा लंच ब्रेक से पूर्व और लंच ब्रेक के एक घंटे बाद सहित 3 बार वाटर बेल बजाई जाती है और बच्चे इस दौरान पानी पीते हैं। भारत में वाटर बेल की पहल सबसे पहले केरल राज्य द्वारा शुरू किया गया था और इसके कुछ ही समय बाद कर्नाटक, तेलंगाना और उड़ीसा आदि राज्यों में भी अपनाया गया।
बच्चों में बहुत सारी स्वास्थ्य परेशानियां पर्याप्त मात्रा में पानी नही पीने के कारण भी होता है जिसे पानी पी कर ठीक किया जा सकता है। बच्चों में पर्याप्त मात्रा में पानी नही पीने के कारण निम्न परेशानियां हो सकती है ------
* कम पानी पीने के कारण शरीर के आंतरिक अंगों को नुकसान हो सकता है।
* कम पानी पीने से भोजन का पाचन सही तरीके से नही हो पाता है। जिससे कब्ज या पेट दर्द की समस्या बच्चों में हो सकती है।
* कम पानी पीने से बच्चों का उर्जा स्तर प्रभावित होता है और वह किसी भी कार्य में उत्साहपूर्वक भाग नही ले पाते हैं।
* कम पानी पीना बच्चों में सिरदर्द होने का भी एक मजबूत कारण बन सकता है।
* कम पानी पीने का असर ना सिर्फ शारीरिक अंगों पर बल्कि बच्चों की त्वचा पर भी पड़ता है जिससे उनका चेहरा मुरझाया सा लग सकता है आदि।
उपरोक्त परेशानियों के अतिरिक्त भी कई और सारी समस्याएं देखने को मिल सकती है इसलिए बच्चों का पर्याप्त मात्रा में पानी पीना आवश्यक है। पर्याप्त मात्रा में बच्चों के पानी पीने के कुछ लाभ इस प्रकार है —--
बच्चे खुद को जल्दी थका हुआ महसूस नही कर पाते।
पानी पीने से बच्चों के शरीर का तापमान नियंत्रित रहता है।
पाचन क्रिया सही रहती है।
मस्तिष्क की कोशिकाएं मजबूत होती हैं और मस्तिष्क सही तरीके से काम कर पाता है।
शरीर से विषैले पदार्थ बाहर निकालने में अहम भूमिका निभाती है।
शरीर को डिहाईड्रेशन से बचाता है आदि।
इसके अतिरिक्त भी पर्याप्त मात्रा में पानी पीने के बहुत से लाभ हैं जो बच्चों के शारीरिक विकास और स्वास्थ्य में सहायक है।
युरोपीय खाद्य सुरक्षा प्राधिकरण (EFSA) के दिशा-निर्देश के हिसाब से 4 से 13 वर्ष के उम्र तक के बच्चों को सामान्यतः 6-8 ग्लास पानी (तरल पदार्थ) एक दिन में पीना चाहिए। इस संबंध में मैंने कुछ डाक्टर्स से भी बात की तो उनका कहना था कि बच्चों और किशोरों को लिंग,उम्र और अपने वजन के आधार पर प्रतिदिन डेढ़ से तीन लीटर पानी पीने की जरूरत होती है। उम्र और लिंग के आधार पर बच्चों को कितना पानी पीने की आवश्यकता होती है इसे नीचे लिखे डाटा से समझा जा सकता है—------
लड़की(04-08 वर्ष ) : 1.1-1.3 लीटर
लड़का (04-08 वर्ष ) : 1.1-1.3 लीटर
लड़की (09-13 वर्ष) : 1.3-1.5 लीटर
लड़का (09-13 वर्ष) : 1.5-1.7 लीटर
लड़का-लड़की (14-15 वर्ष) : 1.5-02 लीटर
उपरोक्त चार्ट के हिसाब से हम बच्चों को पर्याप्त मात्रा में पानी पीने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।
चूंकि अब हमारे बिहार राज्य में भी शिक्षा विभाग द्वारा सभी विद्यालयों में बच्चों को FLN स्टुडेंट किट बैग के साथ-साथ पानी की बोतलें भी उपलब्ध करवायी जा रही है तो हम सब भी कुछ इस तरह का प्रयास कर सकते हैं जिससे कि बच्चे विद्यालय अवधि में भी अपने स्वास्थ्य के अनूकूल पर्याप्त मात्रा में पानी पी सके और वैसी बहुत सी स्वास्थ्य समस्याओं से बच सके जिनका समाधान पर्याप्त मात्रा में पानी पी कर किया जा सकता हैं ।
चूंकि मेरी कक्षा के बच्चों को अभी FLN किट और बोतलें उपलब्ध नहीं है तो मेरे लिए यह आवश्यक था कि मैं बच्चों के हित में आवश्यक पहल करूं। मुझे यह देखकर सच में बहुत खुशी है कि जो भी बच्चे पानी पीने के लिए शायद ही कभी छुट्टी मांगते हो वो भी कम से कम दो बार पानी पी ले रहे हैं। भले ही वह अन्य बच्चों की देखा-देखी ही सही पर अच्छा कर रहे हैं। वैसे भी डाक्टर्स का मानना है कि पानी अगर शारीरिक अलार्म के अनुरूप पिया जाए तो वह अधिक फायदेमंद होता है, क्योंकि वाटर बेल का नियम हमें एक निश्चित अवधि पर ही पानी पीने के लिए प्रेरित करता है। पर स्कूलों में वाटर बेल की पहल निश्चित ही बच्चों के स्वास्थ्य की दिशा में एक क्रांतिकारी पहल है जिसे व्यवहार में लागू किया जा सकता है मेरी राय में। साथ ही मुझे यह भी लगता है कि पहली कक्षा के बच्चों के लिए पानी की उपलब्धता उनकी कक्षा के बाहर/अंदर करवाना भी एक बेहतर विकल्प हो सकता है क्योंकि इस कक्षा के लगभग बच्चे की आयु 6-7 वर्ष की होती है, जिन्हें अन्य कक्षाओं की अपेक्षा विशेष ध्यान और देखभाल की जरूरत होती है।
.....फिलहाल मेरी कक्षा के बच्चे कक्षा-कक्ष में पानी की उपलब्धता से बहुत ही खुश है। मेरे द्वारा पहली कक्षा में पानी की उपलब्धता और अन्य राज्यों में लागू वाटर बेल की पहल पर आपकी क्या राय है, हमें जरूर अवगत करवाएं 🙏
धन्यवाद।
बहुत अच्छा लिखा है आपने मैडम। वाटर बेल का प्रयोग बेहतर है। पानी के फायदे अच्छे गिनाए हैं।
ReplyDeleteअगर आप बच्चों को वाटर बोतल साफ करने के तरीके बता सके तो बहुत अच्छा होगा।
कमल।
Excellent Ma'am
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