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शिक्षकों द्वारा गृह भ्रमण/अभिभावकों से संवाद

इस आलेख के माध्यम से मैं आपको अपने एक दिन की  गृह भ्रमण की यात्रा पर  ले जाना चाहती हूँ जहाँ आप मुझे अभिभावकों से संवाद स्थापित करता देख सकारात्मक महसूस करेंगे और बतौर शिक्षक FLN के अंतर्गत निर्मित शिक्षक संदर्शिका का उपयोग बच्चों की शिक्षा में अभिभावकों की सहभागिता सुनिश्चित करवा पाने के सन्दर्भ में  प्रेरित होंगे |


जैसा कि सर्वविदित है कि माता-पिता/अभिभावक बच्चों के प्रथम शिक्षक होते हैं और बच्चों के सर्वांगीण विकास में माता-पिता की भूमिका को नजरंदाज नहीं किया जा सकता है। खासकर तब,जब बच्चे बुनियादी कक्षाओं में अध्ययनरत हो। चूंकि राज्य का लगभग 70% राजकीयकृत विद्यालय ग्रामीण क्षेत्रों में अवस्थित है और इन विद्यालयों में नामांकित अधिकांश  बच्चों की पारिवारिक पृष्ठभूमि आर्थिक रूप से पिछड़ी हुई अवस्था में होती हैं। ऐसे में जाहिर सी बात है कि अभिभावकों का मुख्य ध्यान अपने परिवार के भरण-पोषण या यूं कहें कि वे रोजी-रोटी की जुगाड़ में अपना लगभग समय खर्च करते हैं और बच्चों की शिक्षा में वह अपना योगदान देने से वंचित रह जाते हैं। इसी तरह से जिन अभिभावकों की आर्थिक स्थिति थोड़ी-बहुत अच्छी भी है तो भी वह अपने बच्चों की शिक्षा में उस प्रकार से भागीदार नही बन पाते जैसा कि होना चाहिए। 

पहले वार्षिक तौर पर, फिर मासिक और अब साप्ताहिक तौर पर शिक्षक-अभिभावक संगोष्ठी आयोजित किए जाने का प्रावधान कर दिया गया है और यह शिक्षक अभिभावक बैठकें हो भी रही है परंतु अब भी व्यावहारिक रूप में बच्चों की शिक्षा में अभिभावकों की सहभागिता सीधे तौर पर देखने को नही मिल रही है।

अब सवाल यह उठता है कि अभिभावकों की सहभागिता सुनिश्चित करवाने हेतु सरकारी प्रावधानों के अतिरिक्त और क्या किया जा सकता है जो कि अभिभावकों को प्रेरित कर सकें। बतौर शिक्षक हम सभी अपने अपने स्तर से कुछ ना कुछ प्रयास करते ही रहते हैं। इन्हीं प्रयासों की कड़ियों में एक कड़ी शिक्षकों द्वारा गृह भ्रमण किया जाना है। जब शिक्षक बच्चों के माता-पिता/अभिभावकों से मिलने हेतु उनके घर पहुंचते हैं तो सबसे पहला प्रभाव बच्चों के उपर पड़ता है। बच्चे मनोभावानात्मक रुप से अपने शिक्षक के प्रति जुड़ाव महसूस करते हैं और उन्हें एहसास भी होता है कि अगर वो विद्यालय में नही आते है या अच्छे से पढ़ाई नही करते हैं तो शिक्षक उनके घर तक पहुंच सकते हैं।साथ ही उन्हें अपने शिक्षक के विशिष्ट स्नेह का भी अनुभव होता है। पर यहां हम बच्चों के मनोभावों पर चर्चा ना कर अभी अभिभावकों की बात करते हैं। 
इस संदर्भ में मैं अपने पूर्व के आलेख जो कि शिक्षा में अभिभावकों की सहभागिता(http://priyankasmi.blogspot.com/2024/02/blog-post_20.html)
से संबंधित है,की बातों की पुनरावृत्ति/चर्चा ना कर अभिभावकों से किए गए संवाद की चर्चा करुंगी जो कि हाल ही में मैंने गृह भ्रमण के दौरान किया था।
चूंकि राज्य में गर्मी का अवकाश 15 अप्रैल से 15 मई तक किया गया था और पुनः भीषण गर्मी से बच्चों के प्रभावित होते हुए स्वास्थ्य के मद्देनजर 30 मई से 8 जून तक विद्यालय में शिक्षण कार्य स्थगित कर दिया गया था।
बतौर वर्ग शिक्षक मैं पहली कक्षा के बच्चों के बीच रहती हूं तो ऐसे में मुझे लगा कि सत्र के आरंभ में ही बच्चों के सीखने के अवसरों में रुकावट आ रही है। ऐसे में इन बच्चों के माता-पिता/अभिभावकों से इस संबंध में बात किए जाने और उन्हें मार्गदर्शित किए जाने की आवश्यकता है ताकि वो अपने बच्चों की शिक्षा में अपनी महत्ती भूमिका निभाने के संदर्भ में जागरुक और शिक्षित हो सकें। 
इस दिशा में हमनें शुरुआत उस परिवार से की जिसके दो बच्चे महिमा और मोनू पहली कक्षा में इसी सत्र में नामांकित हुए थे। महिमा नामांकन से 2 वर्ष पूर्व से ही अपने परिवार के अन्य बड़े बच्चों के साथ विद्यालय में आ जाया करती थी क्योंकि चहक की गतिविधियों को खुले मैदान में होता देखकर वह गतिविधियों के प्रति आकर्षित थी। इसलिए शुरुआत वहीं से की हमनें, क्योंकि भीषण गर्मी पड़ने के कारण बच्चे विद्यालय नही आ रहे थे तो हमारे पास पर्याप्त समय था गृह भ्रमण करने का। खैर, विद्यालय में सूचित कर स्कूटी स्टार्ट कर मैं बच्चों के घर पहुंच गई। मिट्टी और बांस से बने घर थे जिसके प्रवेश द्वार में दरवाजा तक नहीं लगा था। बाहर से आवाज दी परंतु कोई जबाब नहीं मिला। इसलिए थोड़ा अंदर आ गई और बच्चों का नाम लेते हुए पुकारा। एक लड़की निकल कर आई और बोली कि कोई नहीं है। फिर भी मैंने उसे जोर देते हुए कहा कि कोई तो घर पर होगा, मुझे बात करनी है बुलाओ। ठीक है,ऐसा बोलकर वह  एक कमरे के अंदर चली गई। तब तक मैंने भी एक दृष्टि घर के आंगन में खड़े-खड़े दौड़ायी। कमरे के बगल में मिट्टी के दो मुंह वाले चुल्हें बने थे और वहीं पास में ईंधन के रूप में जलाने के लिए पेड़ की सुखी पत्तियां और खर-पतवार के ढ़ेर पड़े थे। सारा घर मिट्टी और बांस का बना था जिसमें तीन कमरे और नाम का एक छोटा सा आंगन था। 
खैर,इसी बीच सर पर पल्लू डालते हुए या यूं कहें कि घूंघट करते हुए एक महिला कमरे से निकल कर आई जो शायद सोई हुई थी, क्योंकि उसकी आंखें नींद से भरी और बाल बिखरे से थे। मैंने बच्चों का नाम लेते हुए कहा कि आप उनकी मां है तो उन्होंने सहमति में सिर हिला दिया। मैंने कहा कि मुझे आप से कुछ बात करनी है....इतना कहकर मैंने पास ही आंगन में पड़े जूट की मचिया को उठाया और उस पर बैठ गई। बच्चे भी तब तक आ गए , फिर बच्चों और उनकी मां को बैठने के लिए कहा।वो थोड़ी सी हैरान थी, फिर भी मैंने बात की शुरूआत की। इधर-उधर की बातें कर थोड़ा सहज करते हुए मैंने उन्हें बताया कि मैं बच्चों के बारे में बात करने आई हूं। हम और आप अगर मिल जाएं तो बच्चों का बहुत सुंदर भविष्य हो जाएगा। अभी स्कूल बंद है और बच्चों की शिक्षा की सारी जिम्मेदारी फिलहाल के लिए पूरी तरह से आपके कंधों पर आ गई है। अभी आपके बच्चों की जो उम्र है,यह सीखने का सबसे महत्वपूर्ण समय है, इसलिए इस वक्त का उपयोग करते हुए घर पर ही कुछ ऐसी चीजें आप करवा सकती है जिससे बच्चों की शिक्षा जारी रखी जा सके। जैसे गिनती करवाना, रंगों की पहचान करना,हल्का-भारी, नजदीक-दूर, साफ-सफाई आदि का बोध आप बच्चों को करवा सकती हैं। गिनती के लिए पिठुआ का फल, रसोई में रखे अनाज, पतियां,आलू,प्याज या अन्य शब्जियां का प्रयोग या
फिर रंगों की पहचान के लिए आपने जो अभी साड़ी पहन रखी है उससे भी करवा सकती हैं। आप की साड़ी में भी चार-पांच रंग है यथा लाल,हरा,पीला,नीला आदि।इसी तरह से बहुत सारी ऐसी चीजें हैं जिसके द्वारा आप बच्चों की शिक्षा में हमारी मदद कर सकती हैं। सच कहूं तो मैं आप से मदद ही मांगने आई हूं आपके बच्चों के लिए। फिर मैंने उन्हें कुछ और तरीके बताएं जिसकी मदद से वो बच्चों की शिक्षा में योगदान दे सकती हैं (तरीके जानने के लिए एफ एल एन के अंतर्गत निर्मित शिक्षक-संदर्शिका का अवलोकन जरुर करें)।अपनी बातें पूरी करने के पश्चात विशेष अनुरोध के रूप में मैंने उन्हें कहा कि वो रात को सोने से पहले बच्चों को कोई भी कहानी जरूर सुनाएं और बच्चों को भी कहानी या कविता सुनाने के लिए जरुर कहें। इससे बच्चों का मौखिक भाषा विकास में सहायता मिलेगी। बच्चों की माता ने मेरी बातों पर सहमति जताई और बच्चों की ओर देखकर कहा कि ये तो मेरी बात ही नहीं मानते। फिर बच्चों को भी समझाया कि मां की बात माननी हैं और जिद कर के मां से,दादी से या घर में जो भी बड़े हैं उनसे कहानियां जरुर सुनना। और इस तरह से 
बच्चों और उनकी मां दोनों से वादा लेकर मैंने विदा लिया अगले अभिभावक से बात करने के लिए।

चूंकि महिमा की मां से बात कर मुझे अंदाजा हो गया था कि इस वक्त ज्यादातर महिलाएं खेतों की ओर निकल
जाती हैं मवेशियों के लिए घास लाने के लिए। पर मैंने खेतों का रुख करने से पहले पास के ही घर जो कि दूसरी कक्षा के नंदिनी और मनीष का था, वहां चली गई क्योंकि उनका घर बन रहा था तो मैंने सोचा वो सभी निश्चित रूप से घर पर ही होंगे। अनुमान सही निकला। बच्चों के माता-पिता दोनों से मुलाकात हुई और मैंने अपनी चिंताएं और सुझाव उनके साथ साझा किया। चूंकि वो गृह निर्माण का  कार्य करवा रहे थे इसलिए मैंने उनका अधिक समय नही लिया। वहां से निकल मैंने सीधे खेतों की ओर रूख किया और रास्ते में दो महिला अभिभावक मिली  जो सिर पर भारी-भरकम घास के गट्ठर रखी  थी , उन्हें रोक कर घास का गट्ठर नीचे रखवाकर एक पेड़ की छांव में हम सभी बैठ गए और वही सब बातें होने लगी जो बच्चों की शिक्षा में उनकी सहभागिता सुनिश्चित करवाने में सहायक हो सकती थी।
फिर से सभी को घर पर बच्चों के साथ समय बिताने, कहानी-कविता कहने और विभिन्न गतिविधियों की बातें साझा की ताकि भीषण गर्मी की वजह से जब तक विद्यालय बंद है तब तक वह अपना सक्रिय सहयोग बच्चों की शिक्षा में दे सकें। सबने बच्चों के बारे में बातें भी की और सहयोग का वादा भी किया। फिर सभी के घास के गट्ठर उनके सिर पर पुनः रखने में मदद की। जाते समय मैंने कहा कि सच में बहुत भारी गट्ठर थे घास के। इस बात को सुनकर सभी महिला अभिभावक एक-दूसरे की ओर देखकर खुले दिल से हंसने लगी। मैंने भी मुस्कुराते हुए विदा लिया क्योंकि बहुत समय हो गया था और मेरे घर से भी काॅल आने शुरू हो गए थे कि मुझे घर लौटने में इतना समय क्यों लग रहा। पर रास्ते में एक और महिला अभिभावक मेनका की माँ मिल गई वो भी सिर पर घास का गट्ठर लादे जा रही थी | मेनका दूसरी कक्षा की छात्रा हैं इसलिए मुझे उनसे भी बात करना जरुरी लगा | फिर क्या था , मैंने उनका भी घास का  गट्ठर नीचे रखवाया और मेनका के बारे में बात करने लगी | यहाँ एक बात स्पष्ट करना चाहूंगी कि यहां कि अधिकांश आबादी ना सिर्फ आर्थिक रूप से पिछड़ी हुई अवस्था में है बल्कि सामाजिक और शैक्षिक स्थिति भी कमोबेश यही हैं इसलिए  पुरुष  अभिभावकों का मिलना मुश्किल होता है क्योंकि या तो वह प्रवासी मजदूर के रूप में अन्य राज्यों में कार्य कर रहे होते हैं या फिर दैनिक मजदूरी में संलग्न होते हैं,जिसके कारण  मेरी मुलाकात  महिला  अभिभावकों से ही ज्यादातर होती हैं|

अब चूंकि विद्यालय खुल चुके हैं फिर भी मैं अभिभावकों से बच्चों की शिक्षा में अपनी सहभागिता देने के लिए प्रेरित करती रहती हूं। कुछ अभिभावक इस दिशा में प्रयास करते भी हैं। पर मुझे नही पता कि वो मुझे कितना सच बोलते हैं या फिर मेरा हौसला कायम रखने के लिए वादा करते हैं। पर मैं अपनी ओर से अनवरत रूप से यह कोशिश जारी रखती हूं कि उन्हें बार-बार इस बात का एहसास कराती रहूं कि वो सच में अपने बच्चों की शिक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। उनका कम पढ़ा-लिखा होना या असाक्षर होना उनके बच्चों की शिक्षा के राह में बाधक नहीं है।बस कोशिश करते रहने की आवश्यकता है। 

अभिभावकों से उपरोक्त सभी बातें मैं उनके भावानात्मक और भाषाई स्तर पर आ कर करती हूं जिससे कि वो मेरे साथ जुड़ाव महसूस कर सके और सहज रह सकें। मुझे इस बात की संतुष्टि हैं कि मैं अभिभावकों के साथ सहज संवाद स्थापित कर पाती हूं और यह हम सभी शिक्षकों के लिए आवश्यक है कि हम सिर्फ बच्चों के साथ ही नही बल्कि अभिभावकों के साथ भी उनकी भाषा में सहज संवाद स्थापित कर सकें ताकि उनका सहयोग बच्चों के सर्वांगीण विकास में मिल सकें और बच्चों के सीखने के लिए एक अनुकूल सकारात्मक वातावरण का निर्माण सिर्फ विद्यालय में ही नहीं घर पर भी हो सके।


इससे पूर्व भी मैं गृह भ्रमण करती रही हूं और इसका लाभ मुझे मिलता रहा है। मैं TRE-1 से आयी नवपदस्थापित शिक्षिकाओं को भी उनके शुरुआती दिनों में गृह भ्रमण के लिए अपने साथ ले गई थी ताकि वो भी गृह भ्रमण और अभिभावकों से संवाद स्थापित करने में निपुण हो सके और इसका लाभ बच्चों की शिक्षा में ले सकें। मैं इस आलेख के माध्यम से अपने सभी शिक्षक साथियों से यह अनुरोध करना चाहूंगी कि वो बच्चों के साथ-साथ अभिभावकों के साथ भी अपना जुड़ाव जरुर विकसित करें। खासकर तब, जब आपका अभिभावक समूह सामाजिक-आर्थिक रुप से अभिवंचित समूह (SEDGs) से संबंधित हो, क्योंकि सही मायने में इन्हें हमारे - आपके सपोर्ट की आवश्यकता होती है। 
मैं यहां एक अनुरोध और रखना चाहूंगी कि सभी शिक्षक एफ एल एन के अंतर्गत विकसित शिक्षक संदर्शिका का अवलोकन जरुर करें और उसमें बुनियादी साक्षरता एवं संख्या ज्ञान में अभिभावकों की सहभागिता से संबंधित अध्याय का सूक्ष्मता से अध्ययन करें और अपने विद्यालय के परिवेश एवं परिस्थितियों के अनुरूप सुझाएं गए गतिविधियों/क्रियाकलापों का क्रियान्वयन जरुर करवाएं।
मैं पहले भी गृह भ्रमण या अभिभावकों से संवाद करती थी परंतु मुझे अब महसूस होता है कि शिक्षक संदर्शिका में दिए गए सुझावों के आधार पर मेरी एक स्पष्ट सोच विकसित हुई है। यह शिक्षक संदर्शिका सही मायने में हमें मार्गदर्शित करती है कि हमें अभिभावकों से क्या और कैसे बात करनी है और हम किस प्रकार से इसका उपयोग अपने बच्चों के सर्वांगीण विकास हेतु कर सकते हैं। 

धन्यवाद।
प्रियंका कुमारी (शिक्षिका)
मध्य विद्यालय मलहाटोल, परिहार 
जिला - सीतामढ़ी, बिहार।
संपर्क - pkjha2209@gmail.com






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  1. Very well written! Good guide to your junior teachers and reference to Shikshak Sandarshika is well taken. Please keep this going.

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