कभी-कभी एक छोटा सा सुझाव या दो शब्द का भी कांप्लीमेंट हमारे जीवन में बड़ी लगने वाली समस्याओं का समाधान बन जाता है।
चूंकि मेरी कक्षा में पहली और दूसरी कक्षा के बच्चे साथ में बैठते हैं और इन कक्षाओं के बच्चों को अधिकाधिक खेल गतिविधि के माध्यम से ही सीखने -सीखाने की प्रक्रिया में संलग्न किया जाता है, खासकर चहक की गतिविधियों में हमें बच्चों को गोलाकार या यू आकार की आकृति में बैठाकर/खड़ा कर गतिविधियों को संचालित करने की आवश्यकता होती हैं, ऐसे में पूरी कक्षा-कक्ष में बेंच-डेस्क का भरा होना गतिविधियों के संचालन में एक चुनौतीपूर्ण स्थिति पैदा कर रहा था। यह समस्या सिर्फ मेरे विद्यालय में ही नहीं थी बल्कि उन सभी विद्यालय में थी जहां वर्गवार कमरों की कमी थी। साथ ही एक नये विभागीय आदेश कि बच्चों को जमीन पर बैठाकर नही पढ़ाना है, ने भी कुछ पारंपरिक सोच रखने वाले विद्यालय प्रधान को कुछ भी नया सोचने/करने वाले शिक्षकों के कार्यों में हस्तक्षेप/अड़ंगा डालने का एक अवसर दे दिया।
खैर, मेरे अंदर भी अपने कक्षा-कक्ष में गतिविधियों को संचालित करने में पर्याप्त स्थान के अभाव का जद्दोजहद चल रहा था कि ऐसा क्या किया जाए कि बेंच -डेस्क भी रुम में रहे, बच्चों को नीचे भी नहीं बैठना पड़े और गतिविधियों के लिए भी पर्याप्त स्थान उपलब्ध हो सके, क्योंकि गर्मी और बरसात के मौसम में खेल का मैदान भी गतिविधियों के संचालन के लिए उपयुक्त नहीं होता है। पिछले वर्ष जितने उत्साह के साथ चहक की गतिविधियों को कक्षा में संचालित किया जा रहा था वो इस वर्ष क्लासरूम में बेंच-डेस्क भरे पड़े होने के कारण नही हो पा रहा था।
इसी क्रम में शिक्षा विभाग द्वारा निपुण चर्चा का आयोजन किया गया जिसमें अतिथि वक्ता के रूप में प्राथमिक शिक्षा निदेशक श्री मिथलेश मिश्र सर, एल एल एफ के संस्थापक डा. धीर झींगरन तथा माॅडरेटर के तौर पर सीएसएफ संस्था से श्री पार्थजीत दास थे। चर्चा के दौरान निपुण अभियान और बच्चों के भाषा विकास से संबंधित महत्वपूर्ण और उपयोगी बातें हुई। अंत मे प्रश्नों का भी एक छोटा सा सत्र रखा गया था जहां मुझे भी प्रश्न करने के अवसर प्राप्त हुए। पहला प्रश्न मेरा निपुण चर्चा के अनुरूप विषयगत था जो निपुण चर्चा की समन्वयक मृदुला जी द्वारा रखा गया और उसका उत्तर मुझे एल एल एफ के संस्थापक डा. धीर सर से मिला।
प्रश्नकाल का सत्र छोटा था फिर भी मैंने अपनी समस्या को प्राथमिक शिक्षा निदेशक सर के सामने रखने की कोशिश की।
मैंने सर से पुछ ही लिया कि सर मेरी एक प्रैक्टिकल समस्या है। एन ई पी 2020 हो या निपुण मार्गदर्शिका या फिर एनसी-एफएस ये सभी डाक्यूमेंट्स बुनियादी कक्षाओं में प्ले बेस्ड/टाॅय बेस्ड लर्निंग की बात करते हैं।पर हाल के कुछ महीनों में विभाग द्वारा विद्यालयों में जो बेंच -डेस्क की आपूर्ति की गई है और जहां कमरों की संख्या कम है वहां सभी कमरों में बेंच-डेस्क भर गये है जिससे गतिविधियों का आयोजन करवाने में समस्या आ रही है। साथ ही खेल का मैदान गर्मी और बरसात के कारण उपयुक्त नहीं है गतिविधियों के लिए। ऐसी स्थिति में मार्गदर्शन किया जाए। क्योंकि यह सिर्फ मेरे विद्यालय की समस्या नही है। मेरे जैसे और भी विद्यालय जहां कमरों की संख्या कम है,ऐसी ही स्थिति है।
सर ने सवाल को अच्छे से सुना और उन्होंने जबाब दिया कि यह जरूरी नहीं कि आप बच्चों को दौड़ा कर ही गतिविधियां करवाएं। आप चाहें तो बेंच -डेस्क पर बैठे हुए भी बच्चे गतिविधियों को कर सकते हैं या फिर आप अपने स्तर से इनोवेट कर सकते हैं वो तरीके जिससे सुविधा हो। यह आवश्यक नहीं कि सभी चीजों के लिए मुख्यालय से ही निर्देश दिए जाएं। सच कहूं तो मुझे कुछ मिनट के लिए ऐसा महसूस हुआ कि मैंने कोई गलत सवाल तो नही पुछ लिया। कुछ देर के लिए मेरे आत्मविश्वास में अस्थिरता आ गई थी। लाइव सेशन के बाद मैंने अपने संपर्क के कुछ शिक्षाविद् से बात की और अपनी बात रखी तो उन लोगों ने मुझे आश्वस्त किया कि मैंने कोई गलत सवाल नही किया था और अपनी वास्तविक समस्याएं साझा करना कभी भी गलत नहीं होता। मन में एक संतुष्टि का भाव आया।
मैंने पुनः निपुण चर्चा के लाइव सेशन को यूट्यूब पर जा कर देखा और निदेशक सर के जबाब को फिर से रिपीट कर सुना और मुझे महसूस हुआ कि इस जबाब में ही मेरा मनोनुकूल समाधान भी है। अगले दिन मैं विद्यालय नही गई क्योंकि मैं डाइट सीतामढ़ी के लिए FLN कोर्स कंटेंट तैयार कर रही थी | पर उसके अगले दिन मंगलवार को स्कूल गई और एक सरसरी निगाह अपने कक्षा में डाली और फिर मन ही मन अपने कक्षा-कक्ष का सेट-अप चेंज करने का एक खाका तैयार करने लगी। अफसोस की उस दिन मुझे फीवर लग गया और मैं यह नहीं कर सकी।
अगले दिन मोहर्रम की छुट्टी थी मुझे सोचने का पर्याप्त समय मिल गया। मोहर्रम के अवकाश के बाद विद्यालय आते ही सबसे पहले मैंने बेंच -डेस्क बाहर बरामदे पर निकलाना शुरू किया,यह देख हमारी विद्यालय की प्रभारी मैम ने टोका जिस पर हमने उन्हें अवगत करवाया कि निदेशक सर ने सुझाव दिया है कि हमलोग अपने स्तर से भी क्लासरूम के सेट-अप में आवश्यक बदलाव कर सकते हैं। फिर मैं अपने कार्य में लग गई। सबसे पहले हमनें कमरे के चारों ओर एक-एक डेस्क लगाएं और उसके साथ दो-दो बेंच। फिर थोड़ा सा चेंज करते हुए कक्षा की दाहिनी ओर एक-एक डेस्क को पूर्व से लगाएं गए डेस्क के साथ जोड़ा और बाहर की तरफ एक-एक बेंच लगाया। दो डेस्क को एक साथ जोड़ने से टेबल वाली फीलिंग आने लगी। बच्चे अब एक-दूसरे की ओर मुंह करके बैठ सकते थे और उन्हें लिखने केलिए भी चौड़ा स्पेस मिल गया। अब कक्षा-कक्ष में परंपरागत तरीके के सेट-अप के स्थान पर बायीं ओर की दीवार में सटा कर क्रम से बेंच -डेस्क लगे थे, सामने की दीवार में भी सटा कर बेंच -डेस्क लगे थे और दाहिनी ओर की दीवार में भी सटा कर दो-दो जोड़ी में बेंच-डेस्क लगे थे और एक बेंच -डेस्क मुख्य दीवार के पास लगे थे। कुल मिलाकर एक ऐसा सेट-अप तैयार हुआ जिससे कक्षा-कक्ष में विभिन्न गतिविधियों के संचालन के लिए पर्याप्त स्थान उपलब्ध हो सका और साथ ही साथ पीयर लर्निंग का भी सेट-अप तैयार हो गया जिसमें बच्चे एक साथ आमने-सामने बैठकर बात कर सकते थे, पढ़ सकते हैं और सीख सकते हैं।
बच्चों को भी यह परिवर्तन काफी पसंद आया और वो बहुत खुश नजर आ रहे थे। विद्यालय के अन्य शिक्षक साथियों और प्रधान द्वारा भी इस परिवर्तन को काफी उपयोगी माना गया। सबकुछ सेट हो जाने के बाद इस परिवर्तन की तस्वीर हमने सहेजी और अगले दिन राज्य स्तरीय समूह में साझा किया ताकि इन तस्वीरों के माध्यम से निपुण चर्चा के दौरान प्राथमिक शिक्षा निदेशक सर द्वारा दिए गए सुझाव के प्रति आभार व्यक्त कर सकें। हमने तस्वीरों के माध्यम से सर के प्रति आभार प्रकट किया और पीयर लर्निंग के माध्यम से गिनती करते हुए बच्चों की एक वीडियो भी साझा किया। सर को भी हमारे कक्षा-कक्ष का यह परिवर्तन पसंद आया।
हमारी खुशी तब और अधिक बढ़ गई जब सर ने ह्वाट्सएप ग्रुप के माध्यम से कमेंट कर लिखा वेरी नाइस...। कभी-कभी एक छोटा सा सुझाव या दो शब्द का भी कांप्लीमेंट हमारे जीवन में बड़ी लगने वाली समस्याओं का समाधान बन जाता है। मैं और मेरी कक्षा के बच्चे इस छोटे से बदलाव से आज बहुत ज्यादा खुश और सहज महसूस कर रहे हैं। मैं आपने आलेख के माध्यम से उन सभी शिक्षकों को संदेश देना चाहती हूं कि अगर आप भी इस प्रकार की समस्याओं का सामना कर रहे हैं तो निदेशक सर के कथनानुसार इनोवेटिव तरीके अपनाएं और सीखने-सिखाने का सहज माहौल बच्चों के लिए उपलब्ध करवाएं।
और अंत में यही कहना चाहूंगी कि एक बार पुनः मेरी ओर से निदेशक सर और निपुण चर्चा का आयोजन करवाने वाली पूरी टीम को हृदय से आभार।
धन्यवाद।
प्रियंका कुमारी (शिक्षिका )
मध्य विद्यालय मलहाटोल, परिहार
जिला - सीतामढ़ी, बिहार।
संपर्क - pkjha2209@gmail.com







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