प्रारंभिक विद्यालयों में कला शिक्षकों की आवश्यकता
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बुनियादी कक्षाओं के बच्चे कुम्हार के कच्चे मिट्टी के समान होते हैं जिसे मनचाही आकृति में ढाला जाना सरल होता है। परंतु एक बार जब मिट्टी पक जाए तो उसे फिर लक्षित आकार देना असंभव सा हो जाता है। बच्चों में किसी भी चीज को ग्रहण करने की क्षमता प्रारंभिक बाल्यावस्था के दिनों में अपने चरमोत्कर्ष पर होती है परंतु जैसे-जैसे बच्चों की उम्र बढ़ती है उनके लिए ग्रहणशीलता का सिद्धांत जटिल होता जाता है। बच्चे इन प्रारंभिक बाल्यावस्था के दिनों में अधिक से अधिक ग्रहण करते हैं और इसका असर भविष्य में उनकी सीखने की क्षमता, व्यवहार, सृजनात्मकता और जीवन कौशल पर भी पड़ता है। इसलिए बुनियादी कक्षाओं से ही बच्चों को अधिक से अधिक सकारात्मक और रचनात्मक माहौल उपलब्ध करवाया जाना चाहिए जिससे उन्हें अधिक अनुभव प्राप्त हो और उनकी ग्रहणशीलता में सकारात्मक बढ़ोत्तरी हो सकें।
मैंने इस उम्र के लगभग सभी बच्चों में देखा है कि वो ड्राइंग/पेंटिंग करने में बहुत रुचि लेते हैं। कुछ बच्चे बिना किसी मदद के बहुत अच्छी चित्रकारी भी करते हैं। हम शिक्षक बच्चों के सूक्ष्म मांसपेशियों के विकास, आंखों के कॉर्डिनेशन और रचनात्मकता को बढ़ावा देने के लिए बच्चों से ड्राइंग/पेंटिंग करवाते रहे हैं। परंतु प्रारंभिक विद्यालयों में आर्ट से संबंधित शिक्षक उपलब्ध नही होने के वजह से इस तरह की रचनात्मक गतिविधियों को बच्चों के बीच उतना बढ़ावा नही मिल पाता है जितना कि मिलना चाहिए। परिणामस्वरूप बहुत से बच्चों के अंदर का कलाकार प्रारंभिक अवस्था में ही दम तोड़ देता है। मेरे विद्यालय में बहुत से छोटे बच्चे ऐसे हैं जो बिना किसी प्रशिक्षण और मार्गदर्शन के कागज के फूल, विभिन्न आकृतियां तथा मिट्टी से मूर्तियां और खिलौने बनाते हैं। मैं उनकी प्रतिभा को देखकर हतप्रभ रह जाती हूं पर मैं उनकी इस क्षेत्र में कोई सहायता नहीं कर पाती क्योंकि मैं स्वयं इस तरह के सृजनात्मकत ज्ञान से अनभिज्ञ हूं।
उस समय बस यही विचार मन में आता है कि प्रारंभिक विद्यालयों में आर्ट के शिक्षकों की नियुक्ति क्यों नहीं की जाती है। माध्यमिक विद्यालयों में आर्ट/क्राफ्ट और संगीत के शिक्षकों की नियुक्ति की जाती है जहां इसकी उपयोगिता नगण्य है। कला को अभ्यास की दरकार होती है और प्रारंभिक विद्यालयों से उचित स्थल कोई और हो ही नहीं सकता। पर हम इतने बड़े तथ्य की अनदेखी कर रहे हैं।
कला का समावेश सभी विषयों में किसी न किसी रूप में आवश्यक होता है। वर्तमान में हम कला समेकित शिक्षा की बात भी कर रहे हैं और इसे अपने शिक्षण प्रक्रिया में लागू भी कर रहे हैं। ड्राइंग्स बनाने में कुशल छात्र विज्ञान हो या अर्थशास्त्र किसी भी विषय वस्तु में आवश्यक तथ्य को सरलता से चित्रांकित कर सकता है। यह तो महज एक उदाहरण मात्र था परंतु वास्तव में हमारे माध्यमिक विद्यालयों के स्थान पर प्रारंभिक विद्यालयों से ही कला शिक्षकों की नियुक्ति का प्रावधान किया जाना चाहिए। जिस प्रकार बच्चों के शारीरिक विकास और खेलकूद हेतु शारीरिक शिक्षकों की बहाली प्रारंभिक विद्यालयों में की गई है उसी प्रकार बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य, रचनात्मकता एवं शिक्षा में कला के एकीकरण हेतु कला शिक्षकों की व्यवस्था प्रारंभिक विद्यालयों में की जानी चाहिए।
यह विचारणीय तथ्य है कि जिस बच्चे को प्राथमिक कक्षाओं के दौरान कला से रुबरू होने का अवसर नही उपलब्ध हुआ तो वह उच्च कक्षाओं के दौरान स्वयं को कला के साथ कितना जोड़ पाएगा और फिर वह अपने कला शिक्षक के प्रति हृदय में कितना सम्मान रख पाएगा। बच्चे जिन शिक्षकों से जितना सीखते हैं उनके प्रति उनके हृदय में उतना ही अधिक जुड़ाव और प्रेम महसूस करते हैं। वास्तव में,कला शिक्षकों की सार्थक उपयोगिता प्रारंभिक विद्यालयों में अध्ययनरत बच्चों के बीच ही है जहां से, एक से बढ़कर एक प्रतिभाशाली कलाकारों के विकसित होने की पूर्ण संभावना है।
वर्तमान परिदृश्य में, कला शिक्षकों की नियुक्ति प्रारंभिक विद्यालयों में नहीं होने की स्थिति में माध्यमिक विद्यालयों के कला शिक्षकों द्वारा ही नजदीकी प्रारंभिक विद्यालयों के बच्चों के लिए सप्ताह में दो दिन भी कला शिक्षकों को उपलब्ध करवाया जाना चाहिए। भले ही यह एक घंटे की ही सेवा दें परंतु नजदीकी प्रारंभिक विद्यालयों में इनकी उपस्थिति बच्चों के व्यक्तित्व, सृजनात्मकता तथा ग्रहणशीलता में उत्तरोत्तर वृद्धि करेगी। शिक्षा में कला का समावेश बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य एवं रचनात्मक अभिव्यक्ति के दृष्टिकोण से भी अत्यंत आवश्यक है इसलिए उपरोक्त तथ्यों पर गंभीरता पूर्वक विचार किए जाने और संज्ञान लेने की आवश्यकता है।
बिल्कुल सही बात। हम इस हेतु प्रयासरत हैं।
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