एक मां होना तब और कठिन हो जाता है जब बच्चे के परवरिश की सारी जिम्मेदारी अकेले एक कामकाजी मां के उपर आ जाए। हाल ही में बीपीएससी के माध्यम से नियुक्त अधिकांश शिक्षकों को सुदूर देहाती क्षेत्रों के विद्यालय आवंटित किए गए हैं। इन शिक्षकों में बहुत से लोग ऐसे हैं जो शहरी क्षेत्रों या राज्य से बाहर रह रहे थे। जो पुरुष शिक्षक है उनकी समस्या अलग है जो कुछ ज्यादा बड़ी नहीं कही जा सकती परन्तु जो महिला शिक्षक है और साथ में छोटे बच्चे की मां भी है, उनके लिए परिस्थितियां काफी चुनौतीपूर्ण है। अकेले सुदूर देहाती क्षेत्र में फांउडेशनल एज ग्रुप के बच्चों के साथ रहना, रोज बच्चे के साथ-साथ विद्यालय आना-जाना और विद्यालयी दायित्वों का निर्वहन करना और फिर थक-हारकर जब किराए के रूम पर जाना, जहां ना तो कोई उनका इंतजार कर रहा होता है और ना ही कोई एक ग्लास पानी या एक कप चाय बना कर देने के लिए होता है, जो कि एक बहुत ही निराशाजनक स्थिति होती हैं।
मैं आजकल रोज एक ऐसी मां को देख रही हूं जो अपने दो साल के बच्चे के साथ विद्यालय आ रही है और पूरी तन्मयता के साथ अपने विद्यालयी दायित्वों को भी पूरा कर रही है। मैं उसे देखती हूं तो मुझे लगता है कि वह रोज एक सैनिक की तरह जंग पर जा रही है और जंग से लौट रही है। सुबह-सुबह ही उठती होगी वह,तभी तो अपने बच्चे और खुद के लिए ब्रेकफास्ट बनाती होगी और लंच बॉक्स भी पैक कर के लाती है। बच्चे को नहाना, तैयार करना और साथ में खुद भी तैयार होना, बच्चे की जरूरत के सभी सामान और उसके मूड के हिसाब से जरुरत पड़ने वाली परिस्थितियों के लिए भी संबंधित सामान रखना और फिर उबड़-खाबड़ रास्तों पर स्कूटी संभाल कर चलाते हुए ससमय विद्यालय पहुंचना, क्या ये सब किसी जंग पर जाने की तैयारी से कम है। बच्चे और मेंढक फुदकने में माहिर होते हैं। एक जगह स्थिर रह ही नही सकते। विद्यालय कार्य के संपादन दौरान जब बच्चा चुपके से नाक के नीचे से निकल जाएं और पता भी ना चले और फिर जब अचानक ध्यान आये कि बच्चा कहां गया तब उस मां की कुछ सेकेंड के लिए हालत क्या होती है वह शब्दों में व्यक्त नही किया जा सकता बल्कि सिर्फ महसूस किया जा सकता है। मैं सच में गर्व करती हूं उन सभी मांओं पर जो अपने कार्य के साथ-साथ अकेले अपने बच्चों का भी पालन-पोषण कर रही है। चूंकि मैं इस मामले में भाग्यशाली थी कि मेरी बेटी की देखरेख मुख्य रूप से मेरे माता-पिता ने किया था और मुझे कभी भी बच्चे और कैरियर को साथ में लेकर चलने की चुनौती का सामना नही करना पड़ा। पर मैं जब इन महिला शिक्षकों को अकेले सारी चुनौतियों से जुझते हुए देखती हूं तो इनके जुझारूपन पर नाज हो रहा है............................ Continued
प्रियंका कुमारी ✍️
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