निपुण भारत मिशन के अंतर्गत कक्षा तीन तक के बच्चों में बुनियादी साक्षरता एवं संख्या ज्ञान की समझ/ कौशल विकसित करने में शिक्षकों के साथ-साथ अभिभावकों की भूमिका भी काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि हमें हमेशा याद रखना चाहिए कि माता-पिता बच्चों के प्रथम शिक्षक होते हैं। कक्षा तीन तक के बच्चे उस आयु वर्ग से संबंधित होते हैं जिनका अपने माता पिता तथा परिवार के अन्य सदस्यों से अधिक जुड़ाव होता है। खासकर इस आयु वर्ग (6 से 9 वर्ष) के बच्चें अपनी अधिकांश आवश्यकताओं के लिए अपनी माता पर निर्भर होते हैं। ऐसे में "पढ़ने के लिए सीखना" की प्रक्रिया में अभिभावक/परिवार की भूमिका/जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण/निर्णायक हो जाती है जितनी की विद्यालय में शिक्षक की।
आज तक हम अपनी शिक्षा प्रणाली में अभिभावकों की महती भूमिका की बात तो करते आए हैं पर प्रभावी/व्यवहारिक रूप में अभी भी अभिभावकों का विद्यालय की शिक्षण व्यवस्था से जुड़ाव प्रतीकात्मक रूप में ही रहा है। चूंकि FLN के कार्यान्वयन के लिए तैयार किए गए दिशा निर्देशों में माता-पिता और समुदाय को FLN मिशन के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण हितधारकों के रूप में शामिल करने की आवश्यकता पर बल डाला है। ऐसे में यह एक सकारात्मक अवसर है कि हम शिक्षक अभिभावकों को बच्चों के बेहतर शिक्षण/भविष्य के लिए सक्रिय भागीदारी के अवसर का निर्माण करें। इस दिशा में शिक्षक स्वयं के परिवेश/ परिस्थितियों के हिसाब से संभावित तरीके/ अवसरों का सृजन कर सकते हैं जिससे कि बच्चों को विद्यालय के साथ-साथ घर पर भी एक स्वस्थ शैक्षणिक वातावरण मिल सके।
शिक्षक छात्र तथा अभिभावक एक शैक्षणिक कड़ी है जिसे सुदृढ़ किए जाने की आवश्यकता है। इससे अभिभावकों बच्चों और शिक्षकों के बीच बेहतर व्यक्तिगत संचार स्थापित होगा। बच्चे अपने परिवार और शिक्षकों के साथ मिलकर शिक्षा ग्रहण करने में सुरक्षित एवं सीखने के लिए प्रेरित महसूस करेंगे। साथ ही शिक्षकों को भी बच्चों को बेहतर ढंग से समझने और उसके संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी जानने के अवसर मिलेंगे। शिक्षकों और अभिभावकों के बीच की साझेदारी बहुत ही महत्वपूर्ण है क्योंकि ऐसा होने पर अभिभावकों को नियमित रूप से अपडेट मिलता रहेगा कि बच्चे स्कूल में कैसा प्रदर्शन कर रहे हैं। हम कई ऐसे तरीके अपना सकते हैं जिससे कि परिवार/अभिभावक सीधे तौर पर बच्चों की अधिगम प्रक्रिया को बेहतर बनाने में अपना योगदान दे सकते हैं। हम शिक्षक परिवार/अभिभावकों की भूमिका बुनियादी साक्षरता एवं संख्या ज्ञान में निम्न प्रकार से सुनिश्चित कर सकते हैं —---
1) विद्यालय शिक्षा समिति के माध्यम से अभिभावकों को बच्चों की शिक्षा के प्रति जागरूक करना।
2) गृह कार्य के माध्यम से अभिभावकों के सहयोग या भागीदारी को सुनिश्चित करना।
उदाहरण के लिए शिक्षकों के द्वारा बच्चों को ऐसे गृह कार्य दिए जाने चाहिए जो अभिभावकों के सहयोग/भागीदारी से पूर्ण हो सके!यथा- घरेलू उपयोग में आने वाली वस्तुओं के नाम, कपड़ों के रंग, प्रकार ,संख्या , पारिवारिक रिश्तो के नाम, सदस्यों की संख्या, कहानी/कविता/पौधों/फूलों/परिवेश आदि से संबंधित जानकारी इकट्ठा करवाना|
इसके अतिरिक्त अभिभावक रोज मर्रा के मापन, गनना, वजन कार्य उदहारण के लिए दूध मापना, पैसे गिनना , अनाज तौलना जैसे कार्यों मे बच्चों कि सहभागिता सुनिश्चित कर उनके संख्या ज्ञान कों व्यावहारिक इस्तेमाल से मजबूत और विस्तृत कर सकते हैँ lसाथ ही हाट बाजार, दुकान मे बच्चों कों अपने समक्ष सामान खरीदने बेचने का हिसाब करने की आज़ादी दे कर भी इस क्षेत्र मे अभिभावक की सहभागिता प्राप्त की जा सकती है l
3) विद्यालय में लक्षित कक्षाओं के बच्चों और अभिभावकों के लिए सप्ताहिक/पाक्षिक/मासिक तौर पर शैक्षिक गतिविधियों का आयोजन करवाना जिसमें बच्चे और अभिभावक दोनों प्रतिभाग कर सकें। इससे बच्चे और अभिभावक दोनों का संबंध विद्यालय के साथ मजबूत होगा और सीखने की ललक में बढ़ोतरी होगी।
4) लक्षित कक्षाओं के बच्चों के अभिभावकों के लिए एक व्हाट्सएप ग्रुप का निर्माण कर विद्यालय स्तर पर बच्चों द्वारा की जाने वाले शैक्षिक तथा सह शैक्षिक गतिविधियों की फोटो वीडियो साझा कर माता पिता को बच्चों के सीखने के संबंध में जानकारी अपडेट किया जाना, संवाद स्थापित करने का एक बेहतरीन तरीका साबित हो सकता है।
5) अभिभावक द्वारा भी कभी-कभी इस व्हाट्सएप ग्रुप में बच्चों द्वारा घर पर की जाने वाली विभिन्न शैक्षिक/सह शैक्षिक गतिविधियों/प्रयासों संबंधित फोटो/वीडियो साझा करने के लिए प्रेरित किया जा सकता है।
6) घर पर बच्चों को बोल बोल कर पढ़ने के लिए प्रेरित करने के संबंध में अनुरोध किया जा सकता है।
7) शिक्षकों द्वारा अभिभावकों के लिए कुछ मजेदार गतिविधियां जो घर पर करवायी जा सकती है के संबंध में एक हैंडबुक अथवा गतिविधि कैलेंडर विकसित कर दिया जा सकता है जिसे बच्चों के साथ करवा सके और इन गतिविधियों की पुनरावृति अथवा अनुभव बच्चों द्वारा कक्षा में शिक्षक के समक्ष साझा की जा सके।(शिक्षक संदर्शिका में गतिविधि कैलेंडर निर्मित है)
8) अभिभावकों को घर का वातावरण प्रिंट समृद्ध करने के संबंध में प्रशिक्षित अथवा प्रेरित करके। घर के कमरों पर नेमप्लेट, किचन अथवा घरेलू उपयोग के सामानों पर नाम की पर्ची चिपका कर, विभिन्न प्रकार के चित्रों, खिलौनों आदि के बारे में बात करना बच्चों के भाषा विकास और पठन क्षमता में बढ़ोतरी में सहायक होगा।
9) ग्रीन वाक की अवधारणा के संबंध में अभिभावकों को प्रशिक्षित कर स्थानीय फसलों, खेतों, तालाब/ पोखर में या आस पास पाए जाने वाले जीव जंतु, पेड़ -पौधों के आकार- प्रकार, पत्तियों की रंग , विभिन्न आकृतियों के संबंध में बातचीत के माध्यम से जानकारी बढ़ा सकते हैं।
10) शिक्षकों का अभिभावकों के साथ स्थानीय भाषा में वार्तालाप उनको सहज करता है। स्थानीय भाषा का अधिकाधिक प्रयोग तथा मित्रतापूर्ण सम्मानजनक भाव/व्यवहार शिक्षक -अभिभावक संवाद को सुदृढ़ और उपयोगी बनाता है।
11) अभिभावकों को बच्चों की शिक्षा का एक महत्वपूर्ण घटक होने का अनुभव/एहसास करवा कर शिक्षक अभिभावकों को शिक्षण प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी करवा सकते हैं।
12) अधिकांशतः ग्रामीण क्षेत्रों में पुरुष असंगठित कार्य क्षेत्रों में संलग्न होते हैं और देर शाम घर लौटते हैं ऐसे में वह बच्चों की शिक्षा में रुचि नहीं लेते हैं। इन परिस्थितियों में माता की जिम्मेवारी अधिक बढ़ जाती है। इस संबंध में माताओं का समूह गठित कर उनका सहयोग लिया जा सकता है।
उपरोक्त तरीकों/सुझावों के प्रयोग के माध्यम से परिवार/अभिभावक अपने बच्चों के अधिगम स्तर को सुदृढ़ करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं | अक्सर शिक्षक -अभिभावक संगोष्ठी के दौरान मैं अभिभावकों से इस संबंध में बात करती हूं और उन्हें बच्चों की शिक्षा में अपना योगदान देने के लिए प्रेरित करती हूं। चूंकि मेरे यहां की अधिकांश आबादी SEDGs(Social Economical Disadvantage Group) से संबंधित है तो ऐसे में मैं उन्हें सुझाव देती हूं कि-
*वो बच्चों को बोल-बोल कर पढ़ने के लिए कहें।
*एक निश्चित समय पर प्रतिदिन सुबह-शाम पढ़ने के लिए बैठाएं।
*विद्यालय में शिक्षक द्वारा बताई गई बातों के संबंध में बच्चों से जानकारी लें।
*लिखने का अभ्यास करवाएं।
*घर का माहौल शांतिपूर्ण और सकारात्मक बनाएं रखें।
*बच्चों को अपनी भाषा में किस्से, कविताएं सुनाएं और बच्चों से भी सुने।
*प्रतिदिन विद्यालय समय पर भेजें और अच्छे कार्य के लिए बच्चों को प्रोत्साहित करें।
उपरोक्त सभी कार्य एक निरक्षर अभिभावक के लिए भी उतना ही आसान है जितना की साक्षर अभिभावक के लिए। हमें सिर्फ जरूरत है उन्हें एहसास दिलाने की कि बच्चों की शिक्षा में वो भी छोटे-छोटे पहल कर महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।
संदर्भ स्त्रोत - एफ एल एन अंतर्गत निर्मित शिक्षक संदर्शिका बिहार।
प्रियंका कुमारी, शिक्षिका
मध्य विद्यालय मलहाटोल, परिहार, सीतामढ़ी
सह, लेखन व संपादन समूह सदस्य(शिक्षक संदर्शिका बिहार)
ईमेल - pkjha2209@gmail.com
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