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एक बार की बात है। पटना में एक कार्यशाला के दौरान आईपीईएल (India Partnership For Earley Learning) टीम के एक सदस्य श्री प्रवीण चंद्रा जी ने मुझसे बातों ही बातों में यूं ही पुछा कि क्या आपने कभी बच्चों से कहानी बनवाई है जिसमें हर बच्चा अपने मन से एक लाइन बोले और कहानी तैयार हो जाएं। मैंने कहा कि नही, मेरे मन में तो चल रहा था पर मैंने कभी ऐसा किया नही, क्योंकि मुझे लगा कि शायद मेरे बच्चे यह नही कर पाएंगे। मेरी बात सुनकर उन्होंने कहा कि आप एक बार करवा कर देखिए और मुझे लगता है कि आप कर पाएंगी।
मेरे मन में उनकी यह बात रह गई। कार्यशाला समाप्ति के उपरांत मैं स्कूल आई तो मैंने सोचा कि क्यों ना एक कोशिश इस दिशा में की जाए। फिर एक दिन मैं बच्चों को लेकर कक्षा से सटे बरामदे की सीढ़ियों पर बच्चों को बाहर बिठाया। बच्चे कक्षा से बाहर निकल कर बहुत खुश थे। बच्चे जानने को उत्सुक थे कि आखिर हमें खुले में सीढ़ियों पर क्यों बिठाया गया था। सभी बच्चों के साथ सीधा आई कांटेक्ट बने इसलिए मैं उनके सामने कुर्सी लगाकर बैठ गई।
बच्चों से कहा कि आज हम सब मिलकर एक मजेदार काम करने वाले हैं। लेकिन उससे पहले मुझे यह बताओ कि आप सब को कहानी सुनना अच्छा लगता है ना! सारे बच्चे एक साथ बोल उठे - जी,दीदी। इस पर बच्चों से कहा कि आज हम सब मिलकर पहले एक कहानी बनाएंगे और फिर उसी कहानी को मैं आप सब को सुनाऊंगी। बच्चे एक-दूसरे का मुंह देखने लगे। कुछ बच्चे खुश तो कुछ बच्चे उलझे हुए दिखे कि दीदी यह क्या बोल रही। बच्चो के मन को भांपते हुए मैंने कहा कि अरे! परेशान मत हो। हमसब मिलकर आज कहानी बनाएंगे। आप सब को बस अपने मन से कुछ भी एक लाइन बोलना है। चलो फिर किधर से शुरू करुं पुछना या फिर सबसे पहले कौन बताएगा अपनी लाइन। बच्चे कुछ नही बोले । तब मैंने कुछ अलग तरह से शुरुआत करने की सोची। मैंने बच्चों से कहा कि चलो सबसे पहले अपना नाम सभी बताओं। सबने एक-एक कर अपना नाम बताया और इसके बाद मैंने कहा कि जिस तरह से आपने अपना नाम सहजता से सभी को बताया वैसे ही अब अपने मन से कुछ भी एक लाइन बोलिए। आपका यह एक लाइन किसी भी चीज से संबंधित हो सकता है,चाहे वह स्कूल,घर या आस-पड़ोस या फिर पसंद-नापसंद किसी से भी जुड़ा हो सकता है। इस तरह से बच्चों को उनकी भाषा में में समझा कर सहजता से एक लाइन बोलने को प्रेरित किया।
अब बच्चों ने क्रम से बोलना शुरू किया। किसी ने बोला कि आज वह विद्यालय स्कूल ड्रेस पहन कर नही आया है तो किसी ने कहा कि वह रोज स्कूल ड्रेस पहन कर आती है। कुछ ने यह बताया कि वह रोज भोजन कर के,नहा कर या मुंह धो कर या साफ-सफाई से स्कूल आते हैं या नहीं आते हैं। कुछ ने बताया कि उन्हें विद्यालय आने के लिए घर पर सुबह कौन जगाता है। कुछ ने अपने किताबें लाने की बात की,तो कुछ ने विद्यालय आते समय रास्ते में देखी हुई चीज की बारे में बोला। इन सब बच्चों के बोलने के क्रम में एक बच्ची जो कुछ नही बोल पा रही थी, बार-बार प्रोत्साहित करने के बावजूद भी। तब उसे मैंने अपने कान में आ कर बोलने का विकल्प दिया। मैंने उस से जब कहा कि आप ऐसा करो कि मेरे कान में चुपके से बोल दो और फिर मैं उसे बोल दूंगी। वो खुशी से तैयार हो गई। मेरे कान में उसने जो कहा वो किसी पुरस्कार से कम नहीं था। उसने मेरे कान में धीरे से कहा कि ‘दीदीजी बहुत प्यार से पढ़ाती है।’ मैंने जब सारे बच्चों को यह बात बताई तो सभी खुशी से तालियां बजाने लगे।
अब बारी थी कहानी बनाने की। चूंकि मैं बच्चों के द्वारा बोली गई लाइन को नोट भी कर रही थी ताकि कहानी बना कर सुनाने में आसानी हो। बच्चों की लाइन्स को एक कहानी की शक्ल देकर पुरे हाव-भाव के साथ मैंने सुनाना शुरू किया जिसे सुनकर बच्चों को बहुत मजा आया। कहानी में बच्चों के वास्तविक नाम और उनकी बोली गई बातें शामिल थी, जिससे वह बहुत खुश नजर आ रहे थे। बच्चों के साथ-साथ मेरे लिए भी यह एकदम नया और रोमांचक अनुभव था। इस प्रक्रिया में मैंने महसूस किया कि बच्चे में चिंतन, मौखिक भाषा विकास,स्व अभिव्यक्ति के साथ-साथ शिक्षक में भी वाचन कौशल और सृजनात्मकता की प्रवृत्ति विकसित होती हैं।
मैंने यह गतिविधि पहली और दूसरी कक्षा के बच्चों के साथ मिलकर की थी। मेरे बच्चों को यह गतिविधि इतनी रुचिकर लगी कि वो खुद ही कभी-कभी इस गतिविधि को करवाने के लिए बोलते है। सृजनात्मकता और अभिव्यक्ति के लिहाज से यह गतिविधि प्रारंभिक विद्यालयों के सभी कक्षाओं में उपयोगी साबित हो सकती है। चूंकि मेरे विद्यालय में सभी बच्चों की पृष्ठभूमि आर्थिक, सामाजिक और शैक्षिक रूप से अत्यंत पिछड़ी हुई अवस्था में है और ऐसे में बच्चों का आत्मविश्वास के साथ बोल पाना मेरे नजरिए से शिक्षक के लिए एक उपलब्धि के समान है।हम सभी शिक्षकों को बच्चों से बातचीत कर इस प्रकार की गतिविधि जरूर करनी चाहिए। बिहार में स्कूल रेडीनेस हेतु पहली कक्षा के लिए विकसित चहक गतिविधि पुस्तिका में भी बच्चों को विद्यालय से जोड़ने के लिए बच्चों से बातचीत करने संबंधी गतिविधियों को समाहित किया गया है।
प्रियंका कुमारी, शिक्षिका
मध्य विद्यालय मलहाटोल, परिहार, सीतामढ़ी
ईमेल - pkjha2209@gmail.com
This is one kind of great initiative regarding creative development. Every child is indifferent and have special ability to express. Only we need to give the chance of expression related to his/ her experience.indeed kudos Priyanka ji. It's really true imagination is always bigger than knowledge.
ReplyDeleteWellDONE. Very useful and creative activity.
ReplyDeleteGreat job
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