बचपन की आधारशिला : कहानियां
लेखक - प्रियंका प्रियदर्शिनी
चीं-चीं और पाँच रंगीन कंकड़
एक हरे-भरे बगीचे में एक नन्ही चिड़िया रहती थी— चीं-चीं। वह पहली बार अपना घर बना रही थी। उसने सूखे तिनके और घास इकट्ठे किए और एक प्यारा सा घोंसला बनाया। लेकिन जैसे ही बरसात शुरू हुई और तेज़ आंधी आई, चीं-चीं का घर बिखर गया। वह उदास हो गई और सोचने लगी, "मुझे घर की नींव में कोई मज़बूत चीज़ रखनी चाहिए ताकि मेरा घर हवा में न उड़े।"
चीं-चीं उड़कर एक पुराने पीपल के पेड़ के पास पहुँची। वहाँ जड़ों के पास उसे पाँच चमकते रंगीन कंकड़ मिले। वे जादुई कंकड़ थे! जब चीं-चीं ने उन्हें अपनी परेशानी बताई, तो वे एक-एक करके बोलने लगे:
लाल कंकड़ - मैं गोल हूँ। हम सब मिलकर तुम्हारी मदद करेंगे!
नीला कंकड़ - मैं चपटा हूँ। मैं घोंसले को हिलने नहीं दूँगा।
हरा कंकड़ - मुझे पानी से डर नहीं लगता। मैं बारिश में मज़बूत रहूँगा।
पीला कंकड़ - मैं गर्मी सह सकता हूँ। मैं घर को ठंडा रखूँगा।
बैंगनी कंकड़ - मैं सबको जोड़कर रखूँगा, जैसे एक परिवार!
चीं-चीं बहुत खुश हुई। उसने अपनी चोंच में कंकड़ों को उठाया और अपने घोंसले की नींव में सजा दिया। उस रात फिर तूफान आया, बिजली चमकी— कड़क-कड़क! बारिश बरसी— टिप-टिप! लेकिन चीं-चीं अपने पक्के घर में सुरक्षित सोई।
सुबह सूरज निकला तो चीं-चीं चहकी, शुक्रिया कंकड़ भाइयों! अब चीं-चीं सब चिड़ियों को मज़बूत घर बनाना सिखाती है।
मिट्टी की गोलियाँ और अनोखा खेल
गर्मी की छुट्टियाँ चल रही थीं। आम के पेड़ के नीचे गाँव के सारे बच्चे ‘कंचे’ (गोली) का खेल खेल रहे थे। कोई उंगली से निशाना लगाता तो कोई ज़मीन पर लेटकर। वहीं थोड़ी दूर पर, बरगद के पेड़ की छाँव में समीर चुपचाप बैठा था।
समीर के दाएँ हाथ में जन्म से ही कुछ दिक्कत थी। उसकी उँगलियाँ पूरी तरह नहीं खुल पाती थीं, इसलिए वह आम बच्चों की तरह उंगली से कंचे को 'स्ट्राइक' नहीं कर पाता था। वह बस सबको खेलते हुए देखता और खुद को बहुत अकेला महसूस करता।
एक दिन, गाँव की एक नई टीचर ‘सुधा दीदी’ वहाँ से गुज़रीं। उन्होंने समीर को अकेले बैठे देखा। जब दीदी ने बच्चों से पूछा कि समीर खेल में क्यों नहीं है, तो एक बच्चा बोला, दीदी, समीर कंचे नहीं खेल सकता। उसकी उंगलियाँ कंचे पर नहीं टिकतीं और निशाना गलत हो जाता है।
सुधा दीदी समझ गईं। उन्होंने समीर को पास बुलाया और उसके हाथ में थोड़ी सी गीली मिट्टी दी। दीदी ने कहा, समीर, क्या तुम अपनी हथेलियों का इस्तेमाल करके मिट्टी की बड़ी-बड़ी गोलियाँ बना सकते हो? समीर ने ख़ुशी से मिट्टी को हथेलियों में रगड़ा और जल्दी ही कई चिकनी, बड़ी मिट्टी की गोलियाँ तैयार कर दीं।
फिर सुधा दीदी ने सभी बच्चों को बुलाया। उन्होंने कहा, आज हम 'मिट्टी की गोलियाँ' वाला एक नया खेल खेलेंगे! इसमें उंगली से निशाना नहीं लगाना है, बल्कि समीर की बनाई इन बड़ी गोलियों को हथेलियों से ज़मीन पर लुढ़काना है (जैसे बॉलिंग करते हैं)। जो गोली सबसे दूर जाएगी, वह जीतेगा! सब बच्चों को यह 'नया खेल' बहुत मज़ेदार लगा। जब समीर की बारी आई, तो उसने अपनी हथेली से मिट्टी की गोली को इतनी तेज़ लुढ़काया कि वह सबसे दूर जाकर रुकी। सारे बच्चे ताली बजाने लगे और बोले, "वाह समीर! तुम्हारा निशाना तो सबसे पक्का है।" समीर की उदासी कहीं गायब हो गई थी। अब आम के पेड़ के नीचे कोई अकेला नहीं बैठता था, क्योंकि सबने 'लुढ़कने' वाला खेल सीख लिया था!
प्यारी रिमझिम
एक प्यारे से गाँव में एक प्यारी बच्ची रहती थी, उसका नाम था रिमझिम। सब लोग उसे बहुत प्यार करते थे। रिमझिम को अपने दोस्तों के साथ खेलना बहुत पसंद था! उसके दोस्त थे: पिंकी, चंदू और राजू। हर दिन स्कूल के बाद, ये चारों दोस्त—रिमझिम, पिंकी, चंदू और राजू , एक बड़े पेड़ के नीचे खूब खेलते थे।
एक दिन दोपहर को वे खेल रहे थे कि तभी... आसमान में अचानक काले बादल आ गए!
पिंकी बोली, अरे! बारिश आने वाली है!
...और टप-टप करके बारिश शुरू हो गई!
चंदू बोला- चलो, जल्दी से रिमझिम के घर भागते हैं!
सब दोस्त दौड़कर रिमझिम के घर पहुँचे। रिमझिम की माँ ने उन्हें प्यार से अंदर बैठाया। रसोई से गरमा गरम खाने की खुशबू आ रही थी! माँ ने सबको बहुत प्यार से खाना खिलाया।
बारिश की टप-टप आवाज़ के बीच, रिमझिम बोली- माँ, कोई अच्छी सी कहानी सुनाओ ना!
माँ मुस्कुराईं और उन्होंने एक बहादुर लड़के की कहानी सुनाई जो सबकी मदद करता था।
कहानी सुनकर सब बच्चों को बहुत मज़ा आया! रिमझिम बोली- माँ, हमें हमेशा एक-दूसरे की मदद करनी चाहिए!
माँ ने प्यार से रिमझिम को गले लगाया और बोला कि – हाँ और मदद करने वाले को थैंक्यू भी बोलना चाहिए |
तभी राजू ने बहुत अच्छी बात कही, उसने बोला- हाँ! हमें सबको धन्यवाद (थैंक यू ) बोलना चाहिए! अपने प्यारे दोस्तों को, अपने परिवार को, और इस बारिश को, जिसने हमें साथ बैठने का मौका दिया!
सब बच्चों ने एक साथ हँसकर कहा, "धन्यवाद, माँ!"
बाहर अब बारिश रुक गई थी। बच्चों ने अपनी दोस्ती के लिए सबको 'धन्यवाद' कहा और खुशी-खुशी खेलने के लिए बाहर निकल पड़े।
मोनू के इतराते बाल
एक बार की बात है, मोनू स्कूल के लिए तैयार हो रहा था।वह आईने के सामने खड़ा होकर अपने बालों में कंघी कर रहा था।अपने चमकते–काले–घने बालों को देखकर वह बोला,वाह! मेरे बाल कितने सुंदर हैं!
मोनू की बात सुनकर बाल इतराने लगे।वे अकड़कर बोले,देखो–देखो! हम ही तो सबसे सुंदर हैं। हमारे जैसा शरीर में कोई नहीं!
बाकी अंगों को यह बात बहुत बुरी लगी। सबने एक-दूसरे की तरफ देखा और फिर हाथ ने अपनी उँगलियाँ नचाते हुए कहा—
अरे भाई!अगर मैं तुम्हें शैंपू से न धोऊँ और रोज अच्छे से कंघी न करूँ,तो तुम घास–फूस जैसे दिखोगे!
पैर तुनककर बोला,और मैं ही तो बाज़ार जाकर तुम्हारे लिए तेल, शैंपू, साबुन और कंघी लाता हूँ।अगर मैं न चलूँ, तो तुम धूल में सने–पड़े ही रह जाओगे।
तभी आँखें हँसते हुए बोलीं—और मुझे मत भूलो!अगर मैं रास्ता न दिखाऊँ, तो तुम लोग न तो दुकान पहुँच पाओगे, न सही से बालों में कंधी कर पाओगे!”
अब नाक भी फूँ-फूँ करते बोली—और मैं? अगर मैं गंध न पहचानूँ, तो पता ही नहीं चलेगा कि किस तेल या साबुन या शैम्पू की खुशबू सबसे अच्छी है।
अंत में मुँह बोला--और सुनो, अगर मैं अच्छे भोजन न खाऊँ,तो तुम्हें पोषण कौन देगा?बिना पोषण के तुम कैसे घने रहोगे ?
इतनी बातें सुनकर बाल की अकड़ तुरंत गायब हो गई। वे शर्माते हुए बोले—ओह! अब समझ आया…हम सब मिलकर ही तो मोनू को सुंदर बनाते हैं।
सारे अंग हँस पड़े। सबने एक-दूसरे को धन्यवाद कहा और मिलकर बोले—हम सब एक-दूसरे के सहारे ही कोई भी काम करते हैं। इसलिए हम सभी सबसे जरूरी हैं!
टिंकू और रूठा हुआ भोजन
छोटा टिंकू खाने की टेबल पर बैठा था। मां ने उसकी प्लेट में चावल, दाल, सब्ज़ी और सलाद रखा। लेकिन टिंकू रोज़ की तरह मुँह बनाकर बोला–उफ़्फ! रोज–रोज एक जैसा खाना! मुझे नहीं खाना, मां!
मां ने प्यार से कहा,बेटा, ऐसा नहीं कहते ।जो भी खाना मिलता है, उसे खुश होकर खाना चाहिए…! नहीं तो खाना रूठ जाता है।
टिंकू हँस पड़ा। उसने हंसते हुए कहा -अरे मां, खाना भी कहीं रूठता है क्या? लेकिन जैसे ही उसने थाली की तरफ हाथ बढ़ाया—अचानक थाली का खाना उछलकर इधर–उधर भागने लगा!
सबसे पहले पीली दाल उछलकर बोली–हूंह! मैं तुम्हें ताकत देती हूँ,फिर भी तुम मुझे पसंद नहीं करते!
फिर सफेद चावल प्लेट से नीचे कूदकर बोली- मैं तुम्हारा पेट भरती हूँ, लेकिन तुम्हें मुझसे भी प्यार नहीं!
अब हरी सब्ज़ी उछलकर बोली–मैं तुम्हें तेज दिमाग एवं ताकतवर बनाती हूँ,फिर भी तुम मुझे देखते ही नाक-भौं सिकोड़ लेते हो!
रंग-बिरंगी सलाद भी बोल उठी, मैं पेट साफ़ रखती हूँ,ताकि तुम स्वस्थ रहो। लेकिन तुम्हें मेरी भी कद्र नहीं!
इसी बीच रसोईघर से गोल-गोल रोटी लुढ़कती हुई आई और बोली- चलो दोस्तों, टिंकू को हममें से कोई पसंद नहीं, तो फिर हम उसकी थाली में क्यों रहें?
सारा खाना रसोईघर की ओर जाने लगा। टिंकू आश्चर्य से सब देखता रह गया। उसके चेहरे की हँसी गायब हो गई। वह धीरे से बोला,ओह! ये सब मिलकर ही तो मुझे ताकत देते हैं…! फिर भी मैंने इनका दिल दुखाया। मैंने गलत किया,अब मुझे ही सब ठीक करना होगा।
वह सबके पास दौड़कर आया और बोला–रुको, रुको! मुझे माफ कर दो। मैं अब हर दिन तुम सबको प्यार से खाऊँगा! सभी खाना मुस्कुराते हुए वापस उसकी थाली में लौट आए।
टिंकू खुशी से बोला–अब मैं अपनी रंग–बिरंगी थाली का हर कौर प्यार से खाऊँगा और उस दिन से उसने अपने भोजन को कभी रुठने नही दिया !
स्वाद भरा सपना
एक गांव में मोनू नाम का एक बच्चा रहता था। उसे पर्व -त्यौहार पर अलग-अलग तरह की बनने वाली चीजें खाना बहुत पसंद थी। जब भी घर में कुछ पकता, वह उसकी खुशबू से पहचान लेता।
एक दिन वह मां के साथ रसोई में चुपचाप बैठा था तो उसकी माँ ने पूछा - मोनू, मन ही मन क्या सोच रहा है। मोनू ने हँसकर कहा,
“माँ, सोचो न, अगर सारे त्योहार के पकवान एक ही दिन बन जाएँ तो कितना अच्छा होता…तब मैं एक दिन में ही ठेकुआ, गुजिया, सेवईं, तिलकुट, पूआ, जलेबी सब खा पाता! सच में तब कितना मज़ा आता!”
माँ हँसकर बोलीं,अरे बेटा! ऐसा कहाँ होता है? हर त्योहार का अपना स्वाद और समय होता है।
रात हुई, मोनू खिड़की से आसमान के तारे गिनते-गिनते सो गया। नींद में ही वह सपनों की दुनिया में पहुँच गया!
जहाँ एक बहुत बड़ा शहर था और उसका नाम था— पकवान नगरी! चारों ओर से मीठी-मीठी और सौंधी खुशबू आ रही थी। पकवान नगरी के अंदर जाने पर एक मंच दिखा, जिस पर लिखा था — “आज है त्योहारों का महा भोज!”
मंच पर सबसे पहले मकर संक्रांति की तिलकुट आई और मोनू का स्वागत करते हुए बोली मैं मीठी और कुरकुरी हूं।
फिर आई होली की गुजिया और पुआ बोलीं —हम त्योहार में मिठास घोलते हैं!
मोनू ने दोनों को खाया और बोला - वाह! कितना अच्छा स्वाद है |
फिर आया ईद का सेवईं वाला कटोरा, बोला, “मोनू, मुझे दूध में पकाया गया है, मेरे बिना ईद अधूरी है।”
तभी दूर से दीयों की रोशनी दिखी —वो थी दिवाली की जलेबी,लड्डू और पेड़ा ! वे गोल-गोल नाचते हुए बोलीं, हम चमकते त्योहार की मुस्कान हैं!
और आखिर में आईं छठी मइया के ठेकुआ, सुनहरे, सुगंधित और पवित्र। उन्होंने कहा, हम तो आस्था के स्वाद हैं बेटा। मोनू ने हँसते हुए सब पकवानों को नमस्ते किया और बोला,वाह! आज तो मैंने सारे त्योहारों के स्वाद का मज़ा एक साथ ले लिया!
तभी हवा चली, सारे पकवान उड़ने लगे और मोनू की नींद खुल गई।
लालू ट्रैक्टर
गाँव में एक किसान चाचा थे और उनके पास लाल रंग का ट्रैक्टर था। सब उसे प्यार से कहते थे — लालू ट्रैक्टर। हर सुबह लालू धड़-धड़-धड़ की आवाज़ करता और किसान चाचा के साथ खेत की ओर निकल जाता।
खेत पहुंच कर किसान चाचा बोलते —चलो लालू, आज मिट्टी जोतनी है।
लालू बोलता — हाँ चाचा, मैं तैयार हूँ और घुर्र-घुर्र-घुर्र! करके मिट्टी पलटने लगता। जिससे मिट्टी मुलायम हो जाती थी।
खेत के पास ही गुड़िया, मोनू और उसके दोस्त भी खेल रहे थे और वो लालू ट्रैक्टर को दूर से देख भी रहे थे।
गुड़िया बोली — देखो, लालू मिट्टी जोत रहा है!
मोनू बोला — हां, इसके बाद अब बीज बोएगा!
बाकी दोस्तों ने कहा कि चलो किसान चाचा के पास चल कर बात करते हैं। वहां पहुंच कर देखा कि वो लालू ट्रैक्टर को बोल रहे थे — लालू, अब हमें खाद डालनी है।
लालू बोला — ठीक है, मैं ट्रॉली लेकर आता हूँ।
वह खेत से गोदाम तक गया, खाद से भरी बोरियाँ लाया। फिर चाचा बोले —अब पानी डालने की बारी है। लालू ने पानी का टैंक खींचा और खेत में धीरे-धीरे चलने लगा।
बच्चे ताली बजाने लगे — वाह लालू, तुम तो सब काम कर लेते हो!
बच्चों को देखकर लालू ट्रैक्टर बोला कि हां, मेरे बड़े बड़े मजबूत पहिए और मेरा शक्तिशाली इंजन मुझे सभी काम आसानी से करने में मदद करते है।
बच्चों ने किसान चाचा से कहा कि हमें भी लालू ट्रैक्टर पर बैठकर घूमना है। फिर क्या था किसान चाचा ने सबको ट्रैक्टर पर बैठाया और घर की ओर चल पड़े । घुर्र-घुर्र-घुर्र!
भोला और आसमान
एक छोटे से गाँव में भोला नाम का प्यारा बच्चा रहता था। उसे रात में आसमान देखना बहुत अच्छा लगता था।
एक दिन वह दादी के साथ आंगन में बैठा था। भोला ने पूछा, दादी, वो गोल-गोल क्या चमक रहा है?
दादी बोलीं, वो चाँद है बेटा, जो रात को रोशनी देता है।
भोला हँसकर बोला, दादी, चाँद तो रोटी जैसा गोल है!
दादी हँस पड़ीं और बोली, हाँ बेटा, रोटी जैसा गोल और कभी-कभी आधा भी दिखता है, जैसे कोई रोटी किसी ने आधी खा ली हो।
भोला ने फिर पूछा, और वो छोटे-छोटे दीये जैसा क्या चमक रहा हैं?
दादी बोलीं, वे तारे हैं, जो बहुत दूर आसमान में रहते हैं।
भोला बोला- दादी, मैं भी चाँद और तारों के पास जाना चाहता हूँ।
दादी ने प्यार से हंस कर कहा, जब तुम बड़े होकर खूब पढ़ोगे, तो वहां जरुर जा सकोगे।
भोला मुस्कराया और आसमान की ओर देखकर बोला- मैं खूब पढूंगा और
एक दिन तुम सब से मिलने ज़रूर आऊँगा...!
गांव की होलीसोनल एक प्यारी और हंसमुख बच्ची थी। वह अपने मम्मी-पापा के साथ पटना शहर में रहती थी। होली की छुट्टियाँ शुरू हुईं तो मम्मी ने मुस्कुराते हुए कहा – सोनल, इस बार हम गांव चलेंगे, दादी के साथ होली मनाने!सोनल खुशी से उछल पड़ी – सच मम्मी! मैं गांव की होली देखूँगी!
शाम को जब वे गांव पहुँचे तो दादी दौड़कर आईं और सोनल को गले से लगाते हुए बोला –आ गई मेरी गुड़िया रानी! कल होली है। हम मिलकर गुझिया, पुआ,ठंडी-ठंडी लस्सी और बहुत सारी चीजें बनाएंगे। सोनल ने खुश होकर कहा – वाह दादी, मैं भी मदद करूंगी!
अगली सुबह गांव में ढोलक और मंजीरे की आवाज़ गूंजने लगी – ढम-ढम-ढम!
सोनल ने खिड़की से झाँकते हुए पूछा –दादी, ये सब क्या हो रहा है?
दादी हँसते हुए बोलीं –बिटिया, गांव वाले फगुआ गीत गा रहे हैं। यही तो असली होली की मस्ती है! बाहर बच्चे रंगों से खेल रहे थे — कोई पिचकारी से रंग बरसा रहा था, कोई बाल्टी-लोटा में रंग घोलकर दौड़ रहा था, तो कोई एक-दूसरे को गुलाल लगा रहा था।
सोनल भी भागकर बाहर गई और बोली – रंग लगाओ, रंग लगाओ!
सब हँसने लगे और एक-दुसरे को रंग लगा कर बोले –होली है! होली है!
रंगों में भीगी सोनल दादी के पास लौटी तो दादी ने प्लेट में मीठी-मीठी गुझिया और पुआ रख दिया। सारे बच्चे मिल-बैठकर खाते हुए ठहाके लगा रहे थे। शाम को सब नहा-धोकर नये कपड़े पहने। सोनल ने दादी और आस-पड़ोस के सभी बड़े-बुजुर्गों के पैर छूकर गुलाल लगाया और आशीर्वाद लिया। दादी ने मुस्कुराते हुए कहा –
सोनल, होली प्यार और दोस्ती का त्योहार है।तुम्हें कैसा लगा हमारे गांव की पहली होली? सोनल चमकती आँखों से बोली –दादी, मुझे गांव की होली बहुत अच्छी लगी! मैं शहर जाकर अपने सभी दोस्तों को बताऊँगी कि गांव की होली सबसे मजेदार होती है।
दयालु दोस्त और नन्हा पप्पी
सर्दियों का मौसम था। चारों तरफ ठंडी-ठंडी हवाएँ चल रही थीं। अमन, रोहन और नैना स्कूल से लौटते हुए घर की ओर जा रहे थे। सबने स्वेटर, टोपी और जूते पहन रखे थे।
रास्ते में अचानक उन्हें झाड़ी के पास एक कूं-कूं की आवाज़ सुनाई दी। वे पास गए तो देखा—एक छोटा सा पप्पी (कुत्ते का बच्चा) ठंड से काँप रहा था। यह देखकर तीनों दोस्तों को दया आ गई।
नैना बोली - यह तो ठंड से कांप रहा है। हमें इसकी मदद करनी चाहिए।
रोहन ने तुरंत अपना छोटा मफ्लर उतारकर पप्पी के उपर रख दिया। अमन ने उसे गोद में उठाया और बोला -चलो इसे घर ले चलते हैं। सब पप्पी को लेकर नैना के घर चल दिए। नैना ने सारी बातें अपनी मां को बताई।
नैना की माँ ने पप्पी को देखकर कहा-बहुत अच्छा किया तुम सभी ने। सर्दियों में जानवरों को भी गर्मी चाहिए।
माँ ने गर्म दूध और बिस्किट पप्पी को खाने को दिया। पप्पी ने जीभ से चट चट कर के सारा दूध पी लिया। इसके बाद मां ने एक टोकरी में पुराने नर्म कपड़े बिछाकर पप्पी को सुला दिया। गर्माहट मिलते ही वह आराम से रुई की गेंद की तरह गोल हो कर टोकरी में सो गया।
यह देखकर अमन खुश होकर बोला- देखो, अब यह भी हमारी सर्दियों वाला दोस्त बन गया!
तीनों हँस पड़े। उन्होंने तय किया कि रोज़ खेलते समय वे पप्पी से मिलने आएंगे और उसकी देखभाल करेंगे।। बाहर ठंड थी, लेकिन पप्पी अब प्यार और दोस्ती की गर्मी में सुरक्षित था।
जाड़े का सुनहरा जादू
एक गाँव में छोटू नाम का एक बच्चा था। छोटू को ठंड बिल्कुल पसंद नहीं थी। वह कहता था, जाड़ा तो बस सब कुछ ठंडा कर देता है!
एक सुबह, उसकी बड़ी बहन रानी दीदी ने कहा, छोटू, तुम्हें जाड़े का मौसम पसंद नही है ना...पर हर मौसम का अपना मज़ा है | चलो आज तुम्हें जाड़े का जादू दिखाएँ ! रानी दीदी के कहने पर छोटू ने खिड़की से झाँका। बाहर हरी-हरी घास पर ओस की बूँदें थीं, जो छोटे-छोटे मोती जैसी चमक रही थी। ओस के मोती देखकर छोटू हैरान रह गया!
अब रानी दीदी उसे बाहर ले गईं। दादी ने गरम-गरम अंगीठी जलाई थी। उसकी लाल-नारंगी आंच इतनी प्यारी थी कि छोटू को लगा जैसे अंगीठी उसे गले लगा रही हो। तभी पापा सभी के लिए अदरक वाली गरम चाय लेकर आए जिसे पीने के बाद अन्दर से गर्मी का एहसास हुआ | माँ ने लहसून की चटनी और सत्तू के पराठें छोटू को खाने को दिए | रानी दीदी ने कहा कि ये अदरक वाली चाय और सत्तू पराठे का असली मज़ा जाड़े के मौसम में ही आता हैं |
थोड़ी देर बाद, सूरज बादलों से धीरे-धीरे बाहर आया। वे दोनों धूप में बैठ गए। छोटू ने महसूस किया कि यह धूप गर्मी की तेज़ धूप की तरह नहीं थी...यह धूप पूरे शरीर को आराम दे रही थी।
छोटू मुस्कुराया और बोला, वाह रानी दीदी! यह धूप कितनी अच्छी है! यह बिल्कुल वैसी है, जैसे कोई प्यार से थपथपा रहा हो।
छोटू मुस्कुराया और बोला, दीदी! जाड़ा बुरा नहीं है। इसमें तो सोने जैसी धूप और मोती जैसी ओस होती है!
रानी दीदी ने हँसकर कहा, "यही तो जाड़े की ख़ूबसूरती है। गर्माहट सिर्फ़ सूरज से नहीं, बल्कि गर्म कपड़ों, गरम खाने और एक-दूसरे के प्यार से आती है!
उस दिन के बाद, छोटू रोज़ सुबह उठकर इस सुनहरे जादू का मज़ा लेने लगा।
गर्मी के हीरो
ठंडी का मौसम जाने के बाद गर्मी का मौसम आया । गर्मी के आने से पुष्पा के घर में रहने वाले तीन दोस्त पंखू (पंखा), कूलू (कूलर) और फ्रिजू (फ्रिज) बहुत खुश थे।
पंखू बोला- अब मैं सबको ठंडी हवा दूँगा!
कूलू बोला - मैं कमरे को ठंडा कर दूँगा!
फ्रिजू बोला- मैं ठंडा पानी और आईसक्रीम दूँगा!
तीनों ने मिलकर कहा— हम है गर्मी के हीरो!
उसी समय गर्मी से परेशान छोटी पुष्पा आई और बोली - तुम तीनों दोस्त गर्मी के हीरो नहीं बल्कि सुपरहीरो हो!
इतना कहकर पुष्पा ने पंखू, कूलू और फ्रिजू तीनों को चालू किया।
चालू होते ही पंखू घन-घना के बोला-वाह! गर्मी आ गई! अब मैं पूरे घर में ठंडी हवा घुमाऊँगा!
कूलू उछलकर बोला - और मैं बच्चों को ठंडी–ठंडी हवा दूँगा। वे मेरे सामने बैठकर हँसेंगे।
फ्रिजू भी मुस्कुराया- मैं तो सबके लिए ठंडा पानी, जूस और आइसक्रीम ठंडी करके रखूँगा!
तीनो दोस्त अपने काम पर लग गए जिससे घर में सबको ठंडक मिली और पुष्पा तीनों दोस्त की ओर देखकर मुस्कुराई।
तीनों दोस्त खुशी से बोले— हमें चालू करने के लिए थैंक्यू पुष्पा | हम मिलकर गर्मी को मजेदार बनाएंगे और सबकी मदद करेंगे, क्योंकि हम है गर्मी के हीरो…!
गर्मी है जरुरी
गर्मी के दिन शुरू हो गए थे। स्कूलों में गर्मी की छुट्टियाँ भी हो गई थी| पर तेज धूप से मीना और गौतम परेशान थे क्योंकि वे बाहर खेल नहीं पा रहे थे। उन्होंने दादाजी से शिकायत करते हुए कहा – दादा जी हमें गर्मी बिल्कुल पसंद नही। गर्मी बहुत बुरी है।
दादाजी मुस्कुराते हुए बोले - गर्मी बुरी नहीं, बल्कि जरूरी है। बच्चों ने आश्चर्य करते हुए पूछा वो कैसे ?
तब दादाजी बोले - अब एक बात बताओ, आम, खीरा और तरबूज कौन खाना पसंद करता है?
हम दोनों! बच्चे खुश हो के बोले।
अगर गर्मी न हो तो ये फल भी न मिलें,दादाजी ने समझाया।
पर खेलें कैसे? मीना ने पूछा।
इस पर दादाजी बोले - पहले तो गर्मी से बचने के लिए खूब पानी पीओ, मौसमी फल खाओ और फिर दोपहर में घर के अंदर ही लूडो या कैरम खेलो। शाम को जब ठंड हो जाये तब बाहर खेल लेना |
दादाजी के इस सलाह से दोनों खुश हो गए।
पर तभी मीना ने मुँह बिचकाते हुए कहा- पर हमारे पास तो लूडो ही नही।
दादाजी बोले - आज शाम में बाजार चलकर हम ले आते है।
और साथ मे आम भी लेंगे दादाजी। गौतम ने जैसे ही अपनी आम की मांग रखी दादाजी और मीना जोर से हँस पड़े।
मीनू और दिवाली
एक सुबह मीनू उठी और छत पर घूमने गई। उसने देखा कि उसके दोस्त—राजा, रिंकी और पिंकी—अपने सिर पर मिट्टी की टोकरियाँ लेकर जा रहे हैं।
मीनू ने पूछा, तुम लोग मिट्टी क्यों ले जा रहे हो?
राजा बोला, दिवाली आने वाली है। हम मिट्टी से दीये बनाएँगे और आँगन लीपेंगे।
मीनू जल्दी से नीचे आई। नीचे आकर देखा कि आँगन में माँ आम के पत्ते और गेंदे के फूल से तोरण बना रही थी।
मीनू ने पूछा, माँ, आप यह क्या कर रही है?
माँ बोलीं, मीनू बेटा मैं दीवाली की तैयारी कर रही हूं।
दीवाली में और क्या-क्या करते हैं मां, मीनू ने पूछा।
मां ने कहा, दिवाली में हम घर की साफ-सफाई कर उसे सजाते हैं। तोरण लगाते हैं, रंगोली बनाते हैं, मिठाई और खीर भी बनाते हैं। रात को दीये जलाते हैं और लक्ष्मी–गणेश की पूजा करते हैं।
मीनू खुश होकर बोली, माँ, मैं भी अपने दोस्तों के साथ दीये बनाने जा रही हूँ। हम सब मिलकर बहुत सारे दीये जलाएँगे और मिठाइयां खाएँगे।
यह कहकर मीनू दौड़ती हुई अपने दोस्तों के पास चली गई।
नीली चिड़िया
एक चमकीला नीला आकाश था और उसके नीचे फैला था एक हरा-भरा जंगल। वहाँ 'नीली' नाम की एक छोटी चिड़िया रहती थी। उसके पंख आसमान जैसे सुंदर और चमकदार थे। लेकिन एक दिन, न जाने क्या हुआ कि उसके पंखों की जादुई चमक खो गई। नीली बहुत उदास हो गई। वह पेड़ की डाल पर चुपचाप बैठी रहती और सोचती, अब तो मेरे पंख फीके पड़ गए हैं, भला मैं ऊँचा कैसे उड़ पाऊँगी?
एक दिन नीली भारी मन से जंगल में घूम रही थी— फुर्र-फुर्र, फुर्र-फुर्र! तभी उसे एक आवाज़ सुनाई दी। रास्ते में एक छोटा खरगोश कँटीली झाड़ियों में फँसा हुआ था। वह दर्द से कराह रहा था। नीली को देखते ही वह बोला, "मदद करो नीली दीदी! ये काँटे मुझे चुभ रहे हैं।"
नीली ने सोचा, मैं तो खुद इतनी उदास हूँ, मुझमें शक्ति नहीं है... लेकिन अपने दोस्त को इस मुश्किल में कैसे छोड़ दूँ?" उसने हिम्मत जुटाई और अपनी नरम चोंच से धीरे-धीरे काँटे हटाने लगी— खट-खट, खट-खट!
जैसे ही आखिरी काँटा हटा, खरगोश उछलकर बाहर आ गया। उसने खुशी से कहा, "धन्यवाद नीली दीदी!" यह सब दूर बैठा एक बूढ़ा उल्लू देख रहा था। उसने आवाज़ दी— टु-टु! नीली, तुमने अपनी उदासी भूलकर खरगोश की मदद की है, इसलिए अब तुम्हें जंगल का असली जादू मिलेगा।
अचानक, सूरज की किरणें नीली पर पड़ीं और उसके पंख फिर से चमक उठे— झिलमिल-झिलमिल! उसकी चमक पहले से भी ज़्यादा बढ़ गई थी। नीली खुश होकर आसमान में खूब ऊँचा उड़ी और बादलों को छू लिया। नीचे खड़े खरगोश, उल्लू और हिरण,भालू शेर सब तालियाँ बजा रहे थे। नीली चहकते हुए बोली, "सच में, दूसरों की मदद करने से ही जीवन में असली जादू आता है!"
समझदार बुलबुल
एक प्यारा सा गाँव था। वहाँ बुलबुल नाम की एक छोटी सी लड़की रहती थी। बुलबुल को अपनी डायरी में हर बात लिखने की एक बहुत अच्छी आदत थी। वह दिन भर जो भी नया देखती, उसे अपनी डायरी में नोट कर लेती थी। एक दिन स्कूल में पिकनिक जाने की घोषणा हुई। सभी बच्चे खुशी से उछल पड़े! अगले दिन सब तैयार होकर स्कूल बस में बैठ गए।
बस जैसे ही आगे बढ़ी, बुलबुल ने अपनी डायरी और कलम निकाल ली। रास्ते में जो कुछ भी दिख रहा था, वह उसे लिखती जा रही थी| सबसे पहले एक बड़ा पीपल का पेड़ आया। फिर एक नीले रंग का छोटा पुल मिला। उसके बाद दाईं तरफ एक लाल मंदिर दिखा।
बस एक सुंदर नदी के किनारे रुकी। सामने ऊंचे पहाड़ और हरे-भरे पेड़ थे। बच्चों ने वहाँ खूब खेल खेलें, खाना खाया और बहुत मस्ती की। शाम हुई तो सब वापस चलने लगे। अचानक ड्राइवर अंकल रुक गए। वह परेशान होकर बोले, अरे! मैं तो रास्ता भूल गया हूँ। यहाँ से दो रास्ते जा रहे हैं, समझ नहीं आ रहा किधर मुड़ना है।
सभी बच्चे डर गए। तभी बुलबुल अपनी डायरी लेकर आगे आई। बुलबुल ने कहा, अंकल, आप घबराइए मत! जब हम आ रहे थे, तब मैंने रास्ते की सभी खास चीजें अपनी डायरी में नोट की थीं।
बुलबुल ने पढ़कर बताया-अंकल, पहले वह लाल मंदिर आएगा, फिर नीला पुल और आखिर में वह बड़ा पीपल का पेड़! ड्राइवर अंकल ने वैसा ही किया और कुछ ही देर में बस स्कूल पहुँच गई।
सभी शिक्षकों और बच्चों ने बुलबुल की खूब तारीफ की। बच्चों ने सीखा कि चीजों को ध्यान से देखना और उन्हें लिखना कितनी बड़ी मुसीबत को हल कर सकता है।
लाल गेंद की सैरएक बड़ा सा हरा बाग था। वहाँ घास पर एक नन्ही लाल गेंद सो रही थी। अचानक, 'सर्रर्र...' करके हवा चली और लाल गेंद की नींद खुल गई। वह लुढ़कने लगी— टप-टप, टप-टप! गेंद लुढ़कते हुए एक सफेद गाय के पास पहुँची।
गाय ने अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से देखा और पूछा, मुँह-मुँह... तुम कौन हो? क्या तुम लाल टमाटर हो? क्या मैं तुम्हें खा लूँ?
लाल गेंद हँसी और बोली, नहीं-नहीं! मैं टमाटर नहीं, मैं तो गोल-गोल गेंद हूँ। देखो, मैं कैसे उछलती हूँ!
और गेंद वहाँ से कूद गई— बोइंग, बोइंग!
अब गेंद लुढ़कते हुए एक जामुन के पेड़ के नीचे पहुँची। वहाँ एक छोटी गौरैया दाना चुग रही थी।
गौरैया ने चोंच मारी— टुक! और पूछा, चीं-चीं... क्या तुम कोई बड़ा सा लाल फल हो?
लाल गेंद बोली, नहीं-नहीं! मैं फल नहीं, मैं तो गोल-गोल गेंद हूँ। देखो, मैं कैसे लुढ़कती हूँ!
और गेंद फिर चल पड़ी— टप-टप, टप-टप!
लुढ़कते-लुढ़कते गेंद एक तालाब के किनारे रुकी। वहाँ एक मेंढक बैठा था।
मेंढक टर्राया, टर्र-टर्र... तुम तो मेरी तरह हरे रंग के नहीं हो, पर क्या तुम पानी में तैर सकती हो?
लाल गेंद ने डरते हुए पानी को छुआ— छपाक! वह पानी में तैरने लगी। वह डूबी नहीं, बल्कि नाव की तरह ऊपर तैरती रही।
तभी अमित दौड़ता हुआ आया। उसने चिल्लाकर कहा, मिल गई! मेरी प्यारी लाल गेंद मिल गई!
अमित ने गेंद को गोद में उठा लिया। लाल गेंद बहुत खुश थी। उसने आज गाय, गौरैया और मेंढक से दोस्ती जो कर ली थी।
जीरो की दोस्ती का दमएक बहुत सुंदर बगीचा था, जिसका नाम था— 'गणित'। इस बगीचे में संख्याओं के परिवार रहा करते थे। एक दिन एक से लेकर नौ तक के सभी बच्चे क्रिकेट खेल रहे थे। मैदान में खूब शोर था, पर जीरो (0) नाम का एक छोटा सा बच्चा बगीचे की एक बेंच पर चुपचाप और उदास बैठा था। उसका कोई दोस्त नहीं था जिसके साथ वह खेल सके।
तभी खेलते-खेलते गेंद जीरो के पैरों के पास आकर रुकी। एक (1) नाम का बच्चा दौड़ता हुआ गेंद लेने आया। तब तक जीरो ने गेंद उठा ली। एक ने मुस्कुराकर पूछा, तुम कौन हो दोस्त? और यहाँ अकेले उदास क्यों बैठे हो?
गेंद लौटाते हुए जीरो ने धीरे से कहा, मेरा नाम जीरो है। मेरा कोई दोस्त नहीं है, इसलिए मैं उदास हूँ।
एक ने चहकते हुए कहा, अरे, बस इतनी सी बात! आज से मैं तुम्हारा पक्का दोस्त हूँ। चलो हाथ मिलाओ। जैसे ही 'एक' ने 'जीरो' का हाथ थामा, एक को अपने अंदर ताकत सा महसूस हुआ और उसने बोला, "आज से हमारी इस दोस्ती का नाम 'दस' (10) का दम कहलाएगा।"
फिर एक ने जीरो का हाथ थामकर बड़े प्यार से कहा, चलो दोस्त, अब मैं तुम्हें अपने बाकी भाई-बहनों और दोस्तों से मिलवाता हूँ। अब से वो लोग भी तुम्हें अपना पक्का दोस्त मानेंगे!
एक(1) जीरो को लेकर बाकी अंकों के पास पहुँचा। सबने हैरानी से पूछा, अरे एक! तुम गेंद के साथ-साथ किसे ले आए?
एक ने गर्व से कहा, यह मेरा नया दोस्त जीरो है। आज से मेरी और इसकी दोस्ती का नाम 'दस का दम' है। आप लोग भी मेरे दोस्त से दोस्ती कर लो ताकि हमारी टीम और दमदार हो जाए!
सब खुशी-खुशी आगे आए। दो (2) ने हाथ मिलाया तो बोले, "हमारी दोस्ती हुई— बीस (20) का दम!" तीन (3) ने हाथ थामा तो बना— तीस (30) का दम! इसी तरह चार, पाँच, छह, सात और आठ ने भी हाथ मिलाया और बनते गए चालीस, पचास, साठ, सत्तर और अस्सी।
अंत में नौ (9) आया और हाथ मिलाते ही बोला, "अब हमारी दोस्ती कहलाएगी— नब्बे (90) का दम!"
अपने इतने सारे दोस्तों से मिलकर जीरो की आँखों में खुशी की चमक आ गई। वह बोला, "दोस्त, मैं अपने एक और भाई (0) को भी बुला लेता हूँ, फिर हम मिलकर 'सौ' (100) रन बनाएंगे!" यह सुनकर पूरे बगीचे में तालियाँ गूँज उठीं।
बिट्टू के जादुई सिपाही
नन्हे बिट्टू को खेलना बहुत पसंद था, लेकिन उसे हाथ धोने और ब्रश करने में बड़ा आलस आता था। माँ कहती, "बिट्टू, साबुन से हाथ धो लो," तो वह बस पानी छूकर भाग आता।
एक रात बिट्टू ने एक डरावना सपना देखा। उसने देखा कि काले-काले, चिपचिपे 'कीटाणु राक्षस' उसकी ओर बढ़ रहे हैं। वे चिल्ला रहे थे, "हहाहा! बिट्टू के गंदे हाथ हमारे घर हैं, अब हम उसे बीमार करेंगे!" बिट्टू डर गया और पीछे हटने लगा।
तभी अचानक एक चमकती रोशनी हुई। सफेद झाग की ढाल लिए 'साबुन सिपाही' और बालों वाली लंबी तलवार लिए 'ब्रश सिपाही' प्रकट हुए। उनके साथ 'पानी की बौछार' भी थी। कीटाणु राक्षस रुक गए।
ब्रश सिपाही बोला, डरो मत बिट्टू! हम तुम्हारे जादुई सिपाही हैं। साबुन सिपाही ने कहा, लेकिन हम तभी लड़ पाएंगे, जब तुम हमें रोज काम पर बुलाओगे। अगर तुम हमें इस्तेमाल नहीं करोगे, तो हमारी शक्ति कम हो जाएगी।
तभी एक बड़े कीटाणु ने बिट्टू पर हमला किया। बिट्टू ज़ोर से चिल्लाया— बचाओ! बचाओ! और उसकी नींद खुल गई। उसने देखा, सुबह हो गई थी। बिट्टू तुरंत भागकर बाथरूम गया। उसने हाथों पर साबुन को रगड़ा और ब्रश को अपनी दाँतों पर चलाया। देखते ही देखते सारे कीटाणु भाग खड़े हुए। अब बिट्टू बीमार नहीं पड़ता, क्योंकि उसके पास उसके 'जादुई सिपाही' जो थे!
दादी का जादुई झोला
सीतामढ़ी के एक छोटे से गाँव में एक प्यारी दादी रहती थीं। उनके पास एक पुराना, रंग-बिरंगा कपड़े का झोला था। गाँव के बच्चे—मुन्नी, गोलू और छोटू, दादी के पीछे-पीछे घूमते थे। वे समझते थे कि वह झोला जादुई है।
दादी जब भी झोले में हाथ डालतीं, एक नया खिलौना बाहर आता! कभी मिट्टी का रंगीन कछुआ, कभी ताड़ के पत्तों का पंखा तो कभी कपड़े की बनी गुड़िया। बच्चे हैरान होकर पूछते, दादी! इस झोले में इतने खिलौने कहाँ से आते हैं? क्या यह जादुई झोला है?
एक दिन दादी ने सबको पास बिठाया और झोला उल्टा कर दिया। झोले में से कोई बना-बनाया खिलौना नहीं, बल्कि इमली के बीज, चिकने पत्थर, सूखी टहनियाँ और थोड़ी सी गीली मिट्टी निकली।
दादी मुस्कुराईं और बोलीं, बच्चों, असली जादू इस झोले में नहीं, तुम्हारी आँखों और इन हाथों में है। अगर तुम ध्यान से देखो, तो यह पत्थर एक मछली बन सकता है और ये इमली के बीज खेल की गोटियाँ!
दादी ने मुन्नी को एक पत्थर दिया और उस पर थोड़ी सी मिट्टी लगाकर उसे एक चूहा बना दिया। बच्चों की आँखें चमक उठीं और वो समझ गए कि हम कबाड़ से भी खिलौने बना सकते हैं। उस दिन के बाद गाँव का हर कोना बच्चों के लिए खिलौनों की दुकान बन गया। बेकार पड़ी चीज़ों से अब 'जुगाड़ का जादू' होने लगा था।
आकृतियों की खोज
स्कूल की छुट्टी हो गई थी। रास्ते में रानी ने अपनी छोटी बहन रिंकी को देखा जो बहुत गुमसुम थी।
रानी ने प्यार से पूछा, क्या हुआ रिंकी? आज तू इतनी खोई-खोई सी क्यों है? क्या टीचर से डाँट पड़ी?
रिंकी बोली, नहीं दीदी, बात कुछ और है। आज हमारी गणित की टीचर ने हमें एक बहुत सुंदर कविता सुनाई थी। इस कविता में बहुत सी आकृतियों के नाम थे। कविता के अंत में टीचर ने कहा— 'तुम भी सोचो और कौन-कौन सी वस्तुएं ज्यामितीय आकार हैं?' टीचर ने सबको अपने घर और आस-पास की ऐसी वस्तुओं के नाम लिखकर लाने को कहा है। मैं बस उसी के बारे में सोच रही हूँ।
रानी मुस्कुराई और बोली, बस इतनी सी बात? तू परेशान मत हो। घर चलकर माँ-पिताजी से बात करेंगे और मिलकर आकृतियां ढूंढेंगे। अब मुस्कुरा दे! दोनों बहनें हँसते-मुस्कुराते घर पहुँचीं।
शाम को जब पिताजी काम से लौटे तो माँ चाय लेकर आईं। रानी ने माँ-पिताजी को रिंकी की परेशानी बताई। माँ ने प्यार से कहा, "अच्छा, पहले हमें वह कविता सुनाओ जो तुम्हारी टीचर ने सुनाई थी।"
रिंकी ने खुशी-खुशी कविता गाना शुरू किया:
"आओ बच्चों तुम्हें बताएँ, ज्यामितीय आकार सब।
गोल-गोल होती माँ की रोटी, वृत्ताकार है।
तिकोना हलवाई का समोसा, होता त्रिभुजाकार है।
चैन की नींद सुलाता बिछौना हमारा, होता आयताकार है।
खेल खेलते जिस कैरमबोर्ड से, वह होता वर्गाकार है।
तुम भी सोचो, हम भी सोचें,
और क्या-क्या है घर में, जो होता ज्यामितीय आकार है..."
कविता सुनकर माँ-पिताजी मुस्कुराने लगे। पिताजी ने कहा, यह तो बड़ी अच्छी कविता है! चलो, आज हम सब मिलकर ढूँढते हैं कि घर में कौन-कौन सी वस्तुएँ इन आकृतियों से मिलती हैं।
माँ ने सुझाव दिया, शुरुआत रसोई से करते हैं!
रसोई में जाते ही रिंकी ने उत्साह से कहा, अरे! ये खाने वाली थाली और कटोरी का मुँह तो बिल्कुल गोल है, यानी वृत्ताकार!
पिताजी ने भी ढूँढ निकाला, हाँ! और यह सब्जी रखने वाली डलिया, रोटी बेलने का चकला, गैस चूल्हे का बर्नर, सिलेंडर का ऊपरी हिस्सा, डिब्बों के ढक्कन और टोकरी में रखे फल (सेब, नारंगी, अनार, टमाटर) —सब वृत्ताकार ही हैं।
माँ ने फ्रिज की ओर इशारा करते हुए समझाया, और इस फ्रिज को देखो, यह आयताकार है क्योंकि इसकी लंबाई इसकी चौड़ाई से अधिक है। यह सुनकर दोनों बहनें खुशी से तालियाँ बजाने लगीं।
अब बारी बेडरूम की थी। वहाँ उन्हें बिछौना, ट्रंक, अलमारी, दरवाज़ा, पेटी-बक्सा, दीवार पर लगी फोटो फ्रेम, खिड़की, मेज पर रखी किताबें और रोशनदान—सब आयताकार मिले।
अपने कमरे में आते ही रानी ने कैरमबोर्ड देखा और चहकी, रिंकी देखो! मिल गई वर्गाकार वस्तु! कैरमबोर्ड चारों ओर से एकदम बराबर है। रिंकी ने भी हाँ में हाँ मिलाई, हाँ दीदी! कैरमबोर्ड, शतरंज और लूडो का बोर्ड—सब वर्गाकार ही तो हैं!
तभी पिताजी ने कहा, आकृतियां ढूंढते-ढूंढते मुझे तो बहुत भूख लग गई है। चलो, अब खाना खाते-खाते इस पर आगे बात करते हैं।
सब खाने की मेज पर बैठ गए। जैसे ही माँ ने पराठे परोसे, रिंकी खुशी से उछल पड़ी, अरे! ये तो तीन कोनों वाला पराठा है! इसका मतलब यह त्रिभुजाकार है!
माँ ने मुस्कुराते हुए कहा, हाँ रिंकी! और सलाद में जो ये गोल-गोल कटे हुए खीरे, टमाटर और प्याज हैं, वे सब वृत्ताकार हैं।
तभी रानी ने याद दिलाया, माँ, हमारी टीचर कहती हैं कि खाते समय बात नहीं करनी चाहिए और खाना हमेशा अच्छी तरह चबाकर खाना चाहिए।
माँ ने सहमति में सिर हिलाया, तुम्हारी टीचर बिल्कुल सही कहती हैं। तो चलो, अब बातें बंद और प्यार से भोजन का आनंद लेते हैं।
और सब मुस्कुराते हुए, मन ही मन आकृतियों की दुनिया के बारे में सोचते हुए, खाने का आनंद लेने लगे।
रंगीन पगडंडी और भुलक्कड़ भालू
सतरंगी जंगल में एक बहुत ही प्यारा और थोड़ा सा भुलक्कड़ भालू रहता था— बबलू भालू। बबलू को मीठा शहद बहुत पसंद था। एक दिन उसने सुना कि जंगल के दूसरे छोर पर, जादुई पहाड़ी के पास एक पेड़ है जिससे सोने जैसा मीठा शहद टपकता है।
बबलू ने अपना बड़ा सा मटका उठाया और चल पड़ा। लेकिन सतरंगी जंगल की एक परेशानी थी; वहाँ के रास्ते हर दिन बदलते रहते थे। जादुई पहाड़ी तक पहुँचने का सिर्फ एक ही सही रास्ता था— 'रंगीन पगडंडी'।
बूढ़े कछुए दादा ने बबलू को समझाया था, बबलू, ध्यान रखना! रंगीन पगडंडी का एक खास जादुई नियम (पैटर्न) है। रास्ता हमेशा इसी तरह चलेगा— एक लाल पत्थर, दो नीले पत्थर, फिर एक लाल पत्थर, दो नीले पत्थर... अगर तुम इस नियम से भटके, तो तुम घने जंगल में खो जाओगे।
बबलू ने सिर हिलाया और पगडंडी पर चलने लगा। शुरुआत आसान थी— उसने एक लाल पत्थर पर पैर रखा, फिर दो नीले पत्थरों पर छलाँग लगाई। "लाल... नीला-नीला... लाल... नीला-नीला..." वह गाते हुए चल रहा था।
चलते-चलते रास्ते में एक बहुत बड़ी रंग-बिरंगी तितली आ गई। बबलू उसे देखने लगा और उसका ध्यान पगडंडी से हट गया। जब उसने नीचे देखा तो वह उलझन में पड़ गया। उसके सामने तीन पत्थर थे— एक पीला, एक लाल और एक नीला। वह भूल चुका था कि उसने आख़िरी पैर कहाँ रखा था!
बबलू सिर खुजाने लगा। तभी उसे याद आया कि जिस पत्थर पर वह खड़ा था, वह 'नीला' था। और उससे ठीक पीछे वाला पत्थर भी 'नीला' था। बबलू ने ज़ोर से सोचा, "नियम क्या था? एक लाल, दो नीले... एक लाल, दो नीले... अगर मैं अभी दूसरे नीले पर हूँ, तो अगला पत्थर कौन सा होना चाहिए?"
उसने तुरंत पीले और नीले पत्थर को छोड़ दिया और अपना पैर 'लाल' पत्थर पर रख दिया। जैसे ही उसने लाल पत्थर पर पैर रखा, जादुई पगडंडी चमक उठी और आगे का रास्ता साफ हो गया। बबलू समझ गया कि अगर हम किसी चीज़ का सही क्रम समझ लें, तो हम कभी नहीं खो सकते! वह मज़े से चलता हुआ जादुई पहाड़ी तक पहुँच गया और भरपेट शहद खाया।
दादी का मिट्टी का हाथी
गोलू स्कूल जाने के नाम से ही रोने लगता था। उसे अपनी दादी से बहुत प्यार था और वह उन्हें घर पर छोड़कर कहीं नहीं जाना चाहता था। एक दिन जब गोलू रो रहा था, तो दादी ने उसे अपने पास बुलाया।
दादी के हाथों में एक छोटा सा, गोल-मटोल मिट्टी का हाथी था। हाथी की बनावट बहुत चिकनी थी और उसके कान बहुत बड़े थे। दादी ने वह हाथी गोलू के हाथ में रखते हुए कहा, गोलू, यह कोई मामूली हाथी नहीं है, यह 'सुनने वाला हाथी' है।
गोलू ने अपने आँसू पोंछते हुए पूछा, क्या यह सच में सुनता है?
दादी मुस्कुराईं, हाँ! जब तुम स्कूल में होगे और तुम्हें मेरी याद आएगी, तो बस इस हाथी के बड़े कानों में चुपके से मेरी बात कह देना। यह मेरी मिट्टी से बना है, इसलिए तुम्हारी हर बात मुझ तक पहुँच जाएगी।
गोलू ने हाथी को अपनी जेब में रख लिया और स्कूल चला गया। स्कूल में जब घंटी बजी और बच्चे खेलने गए, गोलू थोड़ा उदास हुआ। उसने अपनी जेब से मिट्टी का हाथी निकाला और उसके कान में धीरे से कहा, दादी, आज मेरी मैम ने मुझे तारा (Star) दिया है! जैसे ही गोलू ने यह कहा, उसे लगा कि हाथी की मिट्टी उसे दादी के हाथों जैसी ही ठंडी और आरामदायक लग रही है। उसका डर गायब हो गया। जब गोलू घर लौटा, तो उसने दादी से पूछा, "क्या हाथी ने मेरी बात बताई थी?"
दादी ने हंसते हुए कहा, "अरे हाँ! हाथी ने तो मुझे यह भी बताया कि आज मेरे गोलू को स्कूल में एक 'तारा' मिला है।" (असल में दादी ने गोलू की डायरी देख ली थी)। यह सुनकर गोलू बहुत खुश हुआ। अब गोलू रोज़ खुशी-खुशी स्कूल जाता है, क्योंकि उसका मिट्टी का हाथी हमेशा उसकी जेब में रहता है।
धूप-छाँव और जादुई हाथ
गर्मियों की दोपहर थी। बिजली नहीं थी, इसलिए सारा घर शांत था। पिंटू अपनी दादी के कमरे में फर्श पर लेटा हुआ था। कमरे की खिड़की से धूप की एक लंबी, तीखी किरण अंदर आ रही थी और फर्श पर एक चमकदार चौकोर डिब्बा सा बना रही थी।
पिंटू को बोरियत हो रही थी। उसने अपना हाथ उस धूप की किरण के बीच में कर दिया। तभी उसने देखा कि सामने वाली दीवार पर एक बड़ा सा काला साया बन गया है।
पिंटू ने अपनी उंगलियों को हिलाया—दीवार पर साया भी हिला।
पिंटू ने हँसते हुए अपनी दादी को आवाज़ दी, दादी! देखिए, मेरा हाथ दीवार पर कितना बड़ा हो गया है!
दादी अपनी झपकी से उठीं और मुस्कुरा दीं। अरे! यह तो बहुत साधारण साया है। क्या तुम इससे जानवर बना सकते हो?
पिंटू ने अपनी उंगलियों को फैलाया, लेकिन वह सिर्फ एक पंजे जैसा लग रहा था। उसने मुट्ठी बंद की, तो वह एक गोल पत्थर जैसा लगा। उसे समझ नहीं आया कि जानवर कैसे बनाएं।
दादी अपने बिस्तर से उठीं और धूप की किरण के पास आकर बैठ गईं। उन्होंने अपने दोनों हाथों को मिलाया, दोनों अँगूठों को एक साथ ऊपर उठाया और बाकी उंगलियों को आपस में फँसा लिया। दीवार पर अचानक एक उड़ती हुई चिड़िया बन गई! दादी ने अपने अँगूठों को फड़फड़ाया तो दीवार पर चिड़िया पंख फड़फड़ाने लगी।
पिंटू की आँखें खुशी से बड़ी हो गईं। "दादी, यह तो जादू है! मुझे भी सिखाइए!"
दादी ने उसे सिखाया कि कैसे उंगलियों को मोड़कर भौंकता हुआ कुत्ता बनाया जा सकता है, और कैसे हथेली को गोल करके फुदकता हुआ मेंढक। पिंटू ने भी बहुत कोशिश की। कुछ देर बाद, पिंटू ने अपने हाथ से दीवार पर एक बड़ा सा मगरमच्छ बना दिया जो अपना मुँह खोल और बंद कर रहा था।
दादी हँसने लगीं, "अरे बाप रे! इतना बड़ा मगरमच्छ! मेरी चिड़िया को बचाओ!"
उस दोपहर, पिंटू और उसकी दादी ने धूप और छाँव के साथ खूब खेला | पिंटू समझ गया कि जादू सिर्फ कहानियों में नहीं होता, जादू हमारे हाथों में भी होता है। बस थोड़ी सी रोशनी की ज़रूरत है।
मेरी नाव
सावन का महीना था और आसमान में काले-काले बादल छाए हुए थे। अचानक, बहुत तेज़ बारिश होने लगी— छम-छम-छम! आँगन में चारों तरफ पानी भर गया।
घर के अंदर चिंटू और मिनी खिड़की से बारिश देख रहे थे। चिंटू ने कहा, मिनी, बारिश तो बहुत अच्छी है, लेकिन हम बाहर कैसे खेलें?
मिनी ने सोचा और बोली, रुको, मैं अभी आती हूँ! वह दौड़कर अंदर गई और एक पुराना अखबार ले आई। उसने अखबार के एक पन्ने को बीच से मोड़ा, फिर किनारों से तिकोना मोड़ा, और देखते ही देखते उसने एक बहुत ही सुंदर कागज़ की नाव बना दी।
चिंटू खुश होकर बोला, वाह! मैं भी बनाऊँगा। मिनी ने उसे भी सिखाया। दोनों ने मिलकर चार नाव बना लीं।
मिनी ने कहा, चलो, हम इन नावों में बैठकर बारिश से बात करते हैं! उसने एक छोटी सी सूखी पत्ती उठाई और उसे नाव के अंदर रख दिया। "यह हमारा खत है," मिनी ने कहा।
दोनों बच्चे दरवाज़े के पास गए और अपनी-अपनी नाव आँगन के पानी में छोड़ दी। छप! छप! नाव पानी पर तैरने लगी। पानी की लहरों के साथ नाव कभी दायें मुड़ती, कभी बायें।
चिंटू चिल्लाया, देखो मिनी! मेरी नाव उस बड़े पत्थर से टकराकर दूसरी तरफ मुड़ गई!
मिनी हँसी, हाँ, और मेरी नाव ने वह छोटी टहनी पार कर ली!
बारिश की बूंदें नाव पर गिर रहीं थीं— टप-टप! और नाव खुशी-खुशी पानी के रास्ते पर आगे बढ़ रही थीं। उस दिन चिंटू और मिनी ने बिना घर से बाहर निकले ही, पानी के सफर का सबसे मज़ेदार खेल खेला।
नीला और पीला
दोपहर का समय था। आंगन में रोहन अपनी नीली कार से खेल रहा था और उसकी छोटी बहन टिया अपनी पीली साइकिल चला रही थी।
अचानक रोहन की कार का एक पहिया निकल गया। रोहन उदास होकर बैठ गया। टिया पास आई और उसने अपनी साइकिल खड़ी की। उसने ज़मीन से एक छोटा पत्थर उठाया और पहिए को ठीक करने की कोशिश करने लगी।
रोहन ने हैरानी से पूछा, टिया, क्या तुम यह कर लोगी? पापा कहते हैं कि औज़ार और मशीनों का काम लड़के करते हैं।
टिया ने बिना सिर उठाए कहा, पर पहिया तो गोल है रोहन, और उसे बस फिट करना है। इसमें लड़का या लड़की कहाँ से आए? टिया ने धीरे से पत्थर से पहिए को दबाया और— 'खट!' पहिया जुड़ गया।
रोहन खुश हो गया। तभी रसोई से बहुत अच्छी खुशबू आई। मम्मी आज घर पर नहीं थीं, इसलिए पापा कुछ बना रहे थे। रोहन और टिया दौड़कर रसोई में गए। उन्होंने देखा कि पापा ने रंग-बिरंगे एप्रन पहने हुए हैं और वे बहुत मजे से कड़ाही में चम्मच चला रहे थे।
रोहन ने धीरे से कहा, "पापा, आप तो मम्मी की तरह खाना बना रहे हैं।"
पापा ने हँसते हुए एक छोटा चम्मच रोहन की तरफ बढ़ाया और बोले, चखकर बताओ, कैसा बना है?
रोहन ने चखा, वाह! यह तो बहुत स्वादिष्ट है।
पापा बोले, मुझे भूख लगी थी और मुझे खाना बनाना आता है, तो मैंने बना लिया। जैसे टिया को साइकिल चलाना पसंद है और तुम्हें कार से खेलना।
शाम को जब मम्मी घर आईं, तो उन्होंने देखा कि पापा और टिया मिलकर टूटी हुई अलमारी का दरवाज़ा ठीक कर रहे हैं और रोहन आराम से बैठकर मटर छील रहा है। घर में कोई किसी को सिखा नहीं रहा था, सब बस वो कर रहे थे जिसे करने में उन्हें मज़ा आ रहा था।
सब कुछ कितना सहज था, जैसे हवा का बहना।
मन की घंटी
छोटू को स्कूल के रास्ते में पड़ने वाले बरगद के पेड़ पर चढ़ना बहुत पसंद था। एक दिन जब वह खेल रहा था, तो गाँव के एक आदमी ने उसे चुपके से एक टॉफी दी और कहा, "छोटू, मेरे पास आओ, मैं तुम्हें एक जादू दिखाऊँगा, पर किसी को बताना मत।
छोटू को अचानक कुछ अजीब लगा। उसके पेट में गुदगुदी सी हुई और दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा— धक्-धक्, धक्-धक्!
उसे अपनी टीचर की बात याद आई। टीचर ने कहा था, बच्चों, जब भी तुम्हें कुछ गलत महसूस हो, तो तुम्हारे मन के अंदर एक 'चेतावनी वाली घंटी' बजने लगती है।
छोटू समझ गया कि उसके मन की घंटी बज रही है। उसे उस आदमी का पास बुलाना और 'किसी को न बताना' कहना बिल्कुल अच्छा नहीं लगा।
छोटू ने टॉफी वहीं छोड़ दी और ज़ोर से बोला, नहीं! मुझे नहीं आना! और वह तुरंत दौड़कर अपने घर की तरफ भाग गया।
घर पहुँचकर उसने अपनी माँ को सारी बात सच-सच बता दी। माँ ने छोटू को गले लगा लिया और कहा, शाबाश छोटू! तुमने बहुत अच्छा किया जो भाग आए और मुझे बताया। जो लोग 'बात छुपाने' को कहते हैं, वे अच्छे नहीं होते।
उस दिन छोटू ने सीखा कि उसके शरीर के कपड़ों के अंदर वाला हिस्सा सिर्फ़ उसका है। अगर कोई उसे छूने की कोशिश करे या उसे डर महसूस हो, तो उसे घबराना नहीं है, बस अपने 'मन की घंटी' सुननी है और अपनों को बताना हैं |
झिलमिल और चमकीला पत्थर
झिलमिल को गाँव की नदी के किनारे रंग-बिरंगे पत्थर ढूँढना बहुत अच्छा लगता था। एक दिन जब वह पत्थर चुन रही थी, तो गाँव के एक काका उसके पास आए। उन्होंने कहा, झिलमिल, देखो मेरे पास एक बहुत ही चमकीला पत्थर है। अगर तुम झाड़ियों के पीछे मेरे साथ आओगी, तो मैं तुम्हें वह दे दूँगा। पर हाँ, यह बात अपनी माँ को मत बताना, वरना पत्थर की चमक चली जाएगी।
झिलमिल को पत्थर तो चाहिए था, पर जैसे ही काका ने 'माँ को मत बताना' कहा, झिलमिल को अचानक अपने शरीर में कुछ अजीब महसूस हुआ। उसे लगा जैसे उसके हाथों-पैरों में चींटियाँ रेंग रही हों और उसका गला सूखने लगा।
उसे अपनी नानी की बात याद आई। नानी कहती थीं, "झिलमिल, हमारा शरीर हमें खुद बता देता है कि कोई चीज़ सही है या गलत। अगर कभी कोई तुम्हें छुए या साथ चलने को कहे और तुम्हें डर लगे, तो समझ लेना कि वह 'गलत' है।"
झिलमिल ने काका के हाथ की ओर देखा। काका उसका हाथ पकड़ने के लिए आगे बढ़े। झिलमिल तुरंत दो कदम पीछे हट गई और चिल्लाकर बोली, "नहीं! मुझे पत्थर नहीं चाहिए!"
वह बिना पीछे मुड़े सरपट दौड़ती हुई अपने घर पहुँची। रसोई में माँ खाना बना रही थीं। झिलमिल ने माँ की साड़ी पकड़ ली और सारी बात बता दी। माँ ने अपना काम छोड़ा और झिलमिल को गोद में उठा लिया।
माँ ने कहा, झिलमिल, तुमने बहुत बहादुरी का काम किया। जो लोग तुम्हें छुपाने के लिए कहते हैं या तुम्हें डराते हैं, वे कभी सही नहीं होते। तुम्हारा शरीर तुम्हारा अपना है, और उस पर सिर्फ तुम्हारा हक है।
उस दिन झिलमिल ने जान लिया कि कोई भी खिलौना या पत्थर उसकी अपनी सुरक्षा से बढ़कर नहीं है। अब वह जब भी खेलने जाती, निडर होकर जाती क्योंकि उसे पता था कि उसे 'ना' कब और कैसे कहना है।
हमारे रक्षक, हमारे दोस्त
गाँव के मेले में बहुत भीड़ थी। राजू अपनी माँ की उंगली पकड़कर गुब्बारे देख रहा था। अचानक एक रंग-बिरंगी तितली को देखने के चक्कर में राजू का हाथ माँ के हाथ से छूट गया।
जब राजू ने मुड़कर देखा, तो माँ वहाँ नहीं थीं। राजू घबरा गया और उसकी आँखों में आँसू आ गए। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह कहाँ जाए।
तभी उसे माँ की सिखाई बात याद आई— अगर कभी खो जाओ या डर लगे, तो किसी 'वर्दी वाले' मददगार को ढूँढना।
राजू ने चारों तरफ देखा। उसे नीली वर्दी में एक पुलिस वाले अंकल दिखाई दिए। राजू दौड़कर उनके पास गया और रोते हुए बोला, अंकल, मेरी माँ खो गई हैं।
पुलिस वाले अंकल ने प्यार से राजू के सिर पर हाथ रखा और कहा, डरो मत बेटा, हम अभी तुम्हारी माँ को ढूँढ लेंगे। क्या तुम्हें पापा का फोन नंबर याद है?
राजू ने नंबर बताया। अंकल ने तुरंत फोन लगाया। कुछ ही देर में माँ दौड़ती हुई वहाँ पहुँच गईं। राजू ने माँ को कसकर पकड़ लिया।
माँ ने पुलिस वाले अंकल को धन्यवाद दिया और राजू से कहा, देखा राजू, पुलिस, डॉक्टर, और गाँव के चौकीदार— ये सब हमारे मददगार हैं। अगर कोई तुम्हें परेशान करे या तुम रास्ता भटक जाओ, तो तुम बिना डरे इनके पास जा सकते हो।
राजू ने मुस्कुराते हुए पुलिस वाले अंकल को सलाम किया। अब उसे डर नहीं लग रहा था, क्योंकि उसे पता था कि वर्दी वाले ये लोग उसके दुश्मन नहीं, बल्कि सबसे अच्छे दोस्त हैं।
मदद के हाथछोटा गोलू आज पहली बार अपनी दीदी के साथ बाज़ार जा रहा था। रास्ते में दीदी ने गोलू को एक खेल सिखाया। उन्होंने कहा, गोलू, आज हम अपने 'मददगार दोस्तों' को पहचानेंगे।
जैसे ही वे सड़क पार करने लगे, सफ़ेद वर्दी पहने ट्रैफ़िक पुलिस वाले अंकल ने हाथ उठाकर गाड़ियों को रोका और गोलू को प्यार से सड़क पार कराई। दीदी बोलीं, देखो गोलू, ये पहले मददगार हैं। अगर सड़क पर कभी रास्ता भटक जाओ, तो इनके पास चले जाना।
थोड़ी दूर आगे बढ़ने पर उन्हें स्कूल की बस वाली दीदी मिलीं। उन्होंने बच्चों को रुककर रास्ता दिया और मुस्कुराकर हाथ हिलाया। दीदी ने बताया, ये हमारी दूसरी मददगार हैं, जो बच्चों को सुरक्षित स्कूल पहुँचाती हैं।
तभी गोलू का पैर एक पत्थर से टकरा गया और वह नीचे गिर गया| उसके घुटने पर हल्की खरोंच आ गई। गोलू रोने ही वाला था कि पास के डॉक्टर अंकल ने उसे देखा। उन्होंने झट से अपनी दुकान से बाहर आकर गोलू को एक रंगीन पट्टी (बैंड-एड) लगाई और हँसते हुए बोले, लो, अब तो तुम सुपरमैन बन गए! गोलू का डर गायब हो गया।
शाम को घर लौटते समय गली के मोड़ पर चौकीदार काका अपनी लाठी लेकर खड़े थे। उन्होंने गोलू को देखते ही कहा, राम-राम बेटा! संभल कर जाना, आगे थोड़ा अँधेरा है।
घर पहुँचकर गोलू ने माँ को सब बताया। उसने कहा, "माँ, आज मुझे पता चला कि अगर दीदी साथ न भी हों, तो भी घबराने की बात नहीं है। वर्दी वाले अंकल, डॉक्टर बाबू और चौकीदार काका जैसे बहुत सारे दोस्त हमारी मदद के लिए हमेशा तैयार रहते हैं।
माँ ने उसे गले लगाया और कहा, बिल्कुल सही! बस याद रखना, मुसीबत में कभी छुपना नहीं, बल्कि इन मददगारों के पास जाकर अपनी बात साफ़-साफ़ कहनी है।
दृश्य -1 साक्षी के दादाजी उसकी कक्षा में बैठकर उसके सभी सहपाठियों के बीच कहानी सुना रहे है और वो मन ही मन गर्वीली सी मुस्कान लिए सबके साथ कहानी सुन रही है। दृश्य -2 आदित्य अपनी दादी के साथ बैठकर एक सादे पेज पर कलर पेन्सिलों के साथ ड्राइंग कर रहा है। उसकी दादी और वो दोनों एक ही समय में एक ही पेज पर ड्राइंग कर रहे है और आपस में बातचीत भी कर रहे है। दृश्य -3 महिमा अपने घर के आंगन में अन्य भाई-बहनों के साथ मां के निकट बैठी है और उसकी कक्षा की शिक्षिका उसकी मां से उन्हीं की भाषा में बात कर रही है और बता रही है कि एक शिक्षक और अभिभावक साथ में मिलकर काम करें तो बच्चों का सर्वांगीण विकास कितना सरल हो जाएगा। साथ ही वो अपने बुनियादी कक्षाओं के बच्चों की शिक्षा में कैसे अपना सहयोग दे सकती है। दृश्य -4 स्कूटी से जा रही शिक्षिका रास्ते में रुक कर खेतों से घास के भारी-भरकम गट्ठर सर पर लिए जा रही महिलाओं को रोककर और उनके गट्ठर नीचे रखवाकर पेड़ की छांव में बैठकर उन्हें अपने पोते-पोतियों को रात में सोते समय कोई कहानी या अनुभव सुनाने की बात करती है और उनकी कविता -कहानी से बच्चों के शिक्षण पर...
bahut hi sundar or upyogi kahaniya hai .
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