सीता आज भी प्रासंगिक हैं / जानकी की प्रासंगिकता वर्तमान संदर्भ में।
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जनक नंदिनी सीता आदर्श की प्रतिमूर्ति हैं। वो एक आदर्श पुत्री,पत्नी, बहू, मां और स्वाभिमान से भरपूर ममतामयी नारी थी। सीता की सहनशीलता और क्षमाशीलता अपने आप में एक दुर्लभ संयोग है।
हम सभी भाग्यशाली हैं कि मां सीता की जन्मस्थली सीतामढ़ी से हम जन्मभूमि या कर्मभूमि के रूप में जुड़े हुए हैं। बतौर स्त्री मैं स्वयं को गौरवान्वित महसूस करती हूं कि मैं सीतामढ़ी वासी हूं और मेरा जन्म इस पावन भूमि पर हुआ है। एक पुत्री के रूप में सीता ने उन सभी संस्कारों को बखूबी ग्रहण किया जिससे वो पुत्री के रूप में भी जगत के लिए पूजनीय और उदाहरण स्वरूपा हैं।
मैंने सीता के सहनशील व्यक्तित्व से प्रभावित होकर एक मुक्तक लिखी थी जो इस प्रकार है -
कभी कभी सोचती हूं
कि इतनी सहनशक्ति कहां से आई मुझमें,
फिर याद आया
कि मैंने जन्म लिया उस पावनभूमि पर
जहां माँ सीता अवतरित हुईं
और सहनशीलता का दूसरा नाम तो सिया ही है!
सही कहा ना...!!
देवी सीता को सहनशक्ति का उदाहरण कहने के पीछे मेरा अर्थ उस समय से है जब वो महल के सुख त्याग कर गेरुआ वस्त्र पहन वनवासिनी की भांति अपने पति के कर्तव्य पथ पर अग्रसर हो गई। पति के साथ उन्होंने वन के कष्टों को भी खुशी खुशी झेल कर दिन व्यतीत किया। उन्होंने ने कभी भी अपने मुख को मलीन नही किया। जन्म से ही राजसी सुखों में पली बढ़ी सीता ने कभी अपनी परिस्थितियों के लिए किसी को दोष नही दिया बल्कि हर परिस्थिति में अपने परिवार और प्रजा का साथ दिया।
सीता का जीवन स्त्रियों के लिए एक संदेश के समान है जो हमें सिखाती है कि जीवन में चाहे कैसी भी परिस्थितियां क्यों ना आ जाए हमें सहर्ष स्वीकार करना चाहिए और उसके अनुकूल आचरण करना चाहिए तभी हम समाज एवं परिवार में एक आदर्श स्थापित कर पाएंगे। सीता का जीवन हमें बताती है कि अपनी विपरीत परिस्थितियों का प्रलाप किए बगैर धैर्य और संयम के साथ अनुकूल परिस्थितियों की प्रतीक्षा करनी चाहिए।
वर्तमान संदर्भ में भी सीता का व्यक्तित्व आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितना कि त्रेता युग में था। एक आदर्श पुत्री पत्नी और पुत्रवधू के दायित्व के निर्वहन के अतिरिक्त बतौर स्त्री सीता एक सशक्त, सहनशील, क्षमाशील , स्वाभिमानी और धैर्यवान व्यक्तित्व थी। सीता के धैर्य , क्षमाशीलता और सहनशीलता से आज की स्त्रियों को सीख लेने की आवश्यकता है। हम आजकल बड़ी जल्दी किसी बात पर या किसी समस्या पर अपनी प्रतिक्रियाएं दे देते हैं। परिवारों में भी विघटन भारी संख्या में होता जा रहा है। हम अपनी समस्याओं को और भी अधिक विकट बनाते चले जा रहे हैं। इन सब के पीछे की मूल वजह कहीं ना कहीं हमारे अंदर का धैर्य है जिसकी घोर कमी होती जा रही हैं। हमारे अंदर से त्याग और क्षमाशील स्वभाव का अभाव होता जा रहा है। कई बार हमारी समस्याएं चाहे वह परिवार से जुड़ी हो या हमारे व्यवसाय से या फिर हमारे समाज से वह इतनी भी बड़ी नहीं होती कि जिसका समाधान संभव ना हो पर हमारे अंदर के धैर्य की कमी समस्याओं को और अधिक जटिल बना देती हैं।
हमें सीता के जीवन से सीख लेने की आवश्यकता है किस प्रकार बड़ी से बड़ी प्रतिकूल परिस्थितियों का भी उन्होंने धीरज और सहजता के साथ सामना किया।
सीता से हमें सीख लेनी चाहिए कि किस प्रकार अपने पिता के कुल के साथ -साथ अपने पति के कुल की मर्यादा को भी अपने निर्णयों से विभूषित किया। श्रीराम ने यह कभी यह निर्णय लेने का नहीं सोचा था कि गर्भवती सीता को वन में छोड़ दिया जाए या उनका त्याग किया जाएं। सच कहा जाएं तो राम ने सीता का कभी त्याग नही किया था। वो तो आदर्शवादी सीता थी जिन्होंने रघुकुल के पूर्वजों के मान-सम्मान और उनके यश की दुहाई देते हुए उन्हें मजबूर किया कि उन्हें महल त्याग कर जाने की आज्ञा दे दी जाएं। सीता ने कुल की
श्रेष्ठता स्थापित करने के लिए स्वयं का जीवन कष्ट और विरह की अग्नि में झोंक दिया। यहां तक की जो प्रजा उनके जीवन के अंतहीन दुखों और अनर्गल बयानबाजी के हिस्सेदार बनें थे ,सीता ने उन्हें भी माफ कर दिया।वह स्वयं धरती के अंदर समा गई पर अपनी प्रजा या किसी को भी बिना कोई श्राप या अपशब्द कहे अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली।
परंतु वर्तमान में परिवार में छोटी छोटी बातों पर अलगाव हो रहें हैं। बड़ों को सम्मान और छोटों को वो प्यार नहीं मिल पा रहा जिसके वो हकदार हैं। इसलिए हम सभी को चाहे वह स्त्री हो या पुरुष सभी को सीता के व्यक्तित्व से प्रेरणा लेते हुए अपने परिवार और समाज के प्रति धैर्यवान, क्षमाशील और विनम्र बनना चाहिए। सीता धैर्य और क्षमाशीलता का एक दुर्लभ उदाहरण थी जिससे हमें वर्तमान संदर्भ में सीख लेने की आवश्यकता है। आज हम छोटी छोटी बातों के लिए बड़े से बड़ा रिश्ता तोड़ लेते हैं और मन में आजीवन दुर्भावना का समावेश हो जाता है। हमें इन सब चीजों से बचना होगा। हम भाग्यशाली हैं कि मां जानकी की इस जन्मभूमि से किसी न किसी रूप में जुड़े हुए हैं और ऐसे में हमारा कर्तव्य बनता है कि हमें मां जानकी के आदर्शों और उनके जीवन चरित्र से सीख लेकर एक संयमित, धैर्यशील और क्षमाशील स्वभाव का विकास अपने अंदर करना चाहिए और अपने परिवार एवं समाज के लिए एक आदर्श व्यक्तित्व के रूप में अपनी उपयोगिता साबित करनी चाहिए।
- प्रियंका प्रियदर्शिनी
सीतामढ़ी
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