Skip to main content

गोरों की फौज

बात उस समय की है जब देश आजाद नही था। हर जगह गोरों (अंग्रेजों) का बड़ा आंतक था। जब भी वो किसी गांव से गुजरते तो वहां अफ़रा-तफ़री का माहौल बन जाता। ऐसे ही एक दिन गोरों की फौज जानकी नामक गांव में घुस गई। चारों ओर हड़कंप सी मच गई। औरत -मर्द सभी इधर उधर छिपने के लिए दौड़ पड़े। अपने -अपने दरवाजों से बैल और अन्य पालतू पशुओं को खोल दिया।
इसी क्रम में गांव के दो स्वतंत्रता सेनानी भी पूरब से सटे खेतों में छिप गए।वे दोनों एक ही खेत में छुपे थे ,यह बात उन दोनों को नहीं पता थीं। अचानक से खेतों में कुछ खड़खड़ाहट सी महसूस हुई। दोनों के ही कान चौकन्ने हो गए। घुटनों व केहुनी के बल वे रेंगते हुए खुद को छिपाने के प्रयास में लगे रहे। अचानक से फिर आवाज आनी बंद हो गई। थोड़ा इंतजार कर फिर से वो दोनों खेतों से निकलने की कोशिश की कि फिर से खेतों में हलचल सी महसूस हुई।अब फिर से विपरीत दिशाओं में घुटनों और कोहनियों के बल वो रेंगने लगे। 
इस‌ तरह रेंगते और छिपते हुए लगभग आधे घंटे से अधिक होने को थे। फिर अचानक से शंभू ने सोचा कि थोड़ा गर्दन उठाकर देखा जाए क्योंकि अगर अंग्रेज़ होते तो अभी तक पकड़ लिए होते। ठीक कुछ ऐसा ही सोचकर शिवा ने भी अपनी गर्दन उपर की तो दोनों की नजर एक-दूसरे से जा टकरायी और चारों ओर कोई नही था। 
अब शिवा को देख शंभू थोड़ा गुस्सा हुए कहा कि अरे तब से तुम थे इस खेत में और आधे घंटे से इस लुका छिपी के कारण मेरा घुटना और कोहनी छिल गई। इस पर शिवा बोला भैया मैं भी इसी भ्रम में रह गया था कि गोरे हमें खेतों में ढूंढ रहे हैं और मैं भी तब से इधर से उधर छिपने की कोशिश कर रहा था। शिवा की बात सुनकर अब दोनों साथ में हंस पड़े और घर की ओर चल दिए।

©® प्रियंका प्रियदर्शिनी

नोट- यह लधुकथा सत्य घटना पर आधारित है।

Comments

Popular posts from this blog

अभिभावकों और बच्चों का एक साथ सीखना

दृश्य -1 साक्षी के दादाजी उसकी कक्षा में बैठकर उसके सभी सहपाठियों के बीच कहानी सुना रहे है और वो मन ही मन गर्वीली सी मुस्कान लिए सबके साथ कहानी सुन रही है। दृश्य -2 आदित्य अपनी दादी के साथ बैठकर एक सादे पेज पर कलर पेन्सिलों के साथ ड्राइंग कर रहा है। उसकी दादी और वो दोनों एक ही समय में एक ही पेज पर ड्राइंग कर रहे है और आपस में बातचीत भी कर रहे है। दृश्य -3 महिमा अपने घर के आंगन में अन्य भाई-बहनों के साथ मां के निकट बैठी है और उसकी कक्षा की शिक्षिका उसकी मां से उन्हीं की भाषा में बात कर रही है और बता रही है कि एक शिक्षक और अभिभावक साथ में मिलकर काम करें तो बच्चों का सर्वांगीण विकास कितना सरल हो जाएगा। साथ ही वो अपने बुनियादी कक्षाओं के बच्चों की शिक्षा में कैसे अपना सहयोग दे सकती है। दृश्य -4 स्कूटी से जा रही शिक्षिका रास्ते में रुक कर खेतों से घास के भारी-भरकम गट्ठर सर पर लिए जा रही महिलाओं को रोककर और उनके गट्ठर नीचे रखवाकर पेड़ की छांव में बैठकर उन्हें अपने पोते-पोतियों को रात में सोते समय कोई कहानी या अनुभव सुनाने की बात करती है और उनकी कविता -कहानी से बच्चों के शिक्षण पर...

टीचर ऑफ़ द मंथ : एक सराहनीय पहल

हैलो, मैं न्यूज 18 चैनल से बोल रहा हूं। एसीएस सर द्वारा बिहार के 12 शिक्षकों को टीचर औफ द मंथ अवार्ड् दिया गया है जिसमें आपका भी नाम है। बधाई हो। हम आप का बाइट लेना चाह रहे है। क्या आप अभी विद्यालय में है... चूंकि मैं उस समय डायट डुमरा, सीतामढ़ी में दीक्षा पोर्टल पर कोर्स लांच करने की तकनीकी प्रक्रियाओं को अपने लैपटॉप पर संपादित कर रही थी इसलिए मैंने उन्हें कहा कि आप से कुछ देर बाद बात करती हूं और मुझे इस अवार्ड की कोई सूचना नहीं मिली है। इसलिए आप मुझे इस से संबंधित कोई जानकारी है तो मेरे नंबर पर साझा कर दीजिए। कार्य की व्यस्तता अधिक थी फिर भी इस खबर को सुनकर प्रसन्नता हुई। इसलिए दो मिनट रुक कर मैंने जब अपना मोबाइल चेक किया तो देखा कि बधाई देने वाले और न्यूज लेने वालों के काॅल्स और मैसेज का अंबार लगा था। मुझे हंसी भी आई कि मुझे छोड़ कर सबको खबर हो चुकी थी कि मैं टीचर औफ द मंथ बन चुकी हूं। फिर अपने परिजनों को इस संबंध में एक मैसेज कर मैं अपने कार्य में और उत्साह के साथ व्यस्त हो गई। कोर्स लांच में जिला शिक्षा पदाधिकारी सीतामढ़ी का भी आगमन हुआ और उन्होंने भी बधाईयां दी। साथ ह...

निपुण अभिभावक निपुण बच्चे

निपुण अभिभावक निपुण बच्चे ********************************* इस आलेख के माध्यम से आप जानेंगे कि अगर हमें बच्चों की शिक्षा में अभिभावकों की सहभागिता सुनिश्चित करवानी है तो बच्चों के साथ-साथ अभिभावकों को भी निपुण बनाने में अपना सहयोग देना होगा। साथ ही अभिभावकों के लिए ऐसे अवसरों का भी सृजन करना होगा जिसमें वह बच्चों के हित में अपनी भागीदारी दे सकें। मैंने निपुण अभिभावक निपुण बच्चे नवाचार का प्रयोग कर अभिभावकों के लिए एक अवसर उपलब्ध करवाने की कोशिश की है जिसके माध्यम से वो बच्चों की शिक्षा में सहभागी बन सकें। किसी भी बच्चे के लिए परिवार प्रथम पाठशाला तथा माता-पिता/अभिभावक प्रथम शिक्षक होते हैं। बच्चे जब पहली बार विद्यालय आते हैं तो उस समय भी उनके पास बहुत सा ज्ञान और अनुभव होता है । वैसे तो बच्चों की शिक्षा में पूर्व में भी परिवार की भागीदारी के महत्व को स्वीकार किया गया है पर नई शिक्षा नीति 2020 में अभिभावकों एवं समुदाय की शिक्षा में सहभागिता पर विशेष बल देने की बात की गई है। राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा मंत्रालय द्वारा भी शिक्षा में अभिभावकों की सहभागिता से संबंधित डा...