Skip to main content

सपनों की शॉपिंग

जब चीजें हमारी पहुंच से बाहर हो तो हम सिर्फ खुली आंखों से देखकर ही संतुष्ट हो जाते हैं पर उसकी शाॅपिंग हम सिर्फ सपनों में ही कर पाते हैं।
'सपनों की शॉपिंग' की कहानी दो गरीब बच्चियों के संदर्भ में है जो दिसम्बर की सर्द रात में एक शापिंग मॉल में घूम-घूम कर अपनी पसंद की चीजें तय कर रही थी । यह देखना काफी पीड़ादायक था कि उन बच्चियों के पैर में ना चप्पल थे और ना ही शरीर पर पूरे कपड़े ।
************************************************
अक्सर मुझे जब इंतजार करना पड़ता है तो मैं पास के किसी माॅल में चली जाती हूं। मेरे औफिस के बगल में भी वी 2 नाम से एक माॅल है जहां अक्सर ही मैं घर से गाड़ी आने के इंतजार में चली जाया करती हूं और चीजों को देखकर टाइमपास कर लेती हूं। कभी -कभी बिना जरूरत के भी कुछ अच्छा लग जाने पर ले भी लेती हूं। 
कल भी इसी तरह से हुआ। मैं गाड़ी के इंतजार में पास वाली माॅल चली गई। फर्स्ट फ्लोर पर घूमते हुए मुझे कपड़ों वाले सेक्शन के दूसरी ओर से दो बच्चों की खुसर-फुसर सुनाई दी।
ऐसा लग रहा था जैसे वो चीजों का बंटवारा कर रहे हो कि ये वाला मेरा है तो वो वाला मैं ही लूंगी। मैं उन दोनों की आवाजें सुनकर मन ही मन मुस्कुराने लगी। चूंकि मेरी एक ही संतान है तो मुझे ऐसी डिबेट देखने को मिलती नहीं है। इसलिए उन दोनों को देखने के लिए मेरा मन उत्सुक हो उठा। पर यह क्या, जैसे ही मैं दूसरी ओर आयी दोनों बच्चियां गायब थी। जल्दी से चारों ओर नजर दौड़ाई तो ग्रासरी आइटम्स की ओर उछलते-कुदते हुए जाती दो बच्चियां दिखी। 
पर सहसा ही आंखों पर यकीन नहीं हुआ क्योंकि दोनों बच्चियां जिस हालत में थी वो अवाक कर देने वाला था। एक बच्ची जो कि 7-8 साल की रही होगी और दूसरी बच्ची 4-5 साल की होगी। दिसंबर की सर्द कंपकंपाती ठंड वाली रात में दोनों बच्चियां नंगे पांव घूम रही थी। एक ने तो मैले से पुराने-ढीले से कपड़े पूरे बदन पहन रखी थी और सर पर टोपी भी लगा रखा था पर दूसरी जो छोटी बच्ची थी वो उपर में सिर्फ एक टीसर्ट और नीचे बस एक कछिया (अंदर पहनी जाने वाली छोटी पैंट) पहन रखी थी। छोटी बच्ची का पूरा पैर उघाड़ था। दोनों बच्चियां पैर में पायल पहन रखी थी।छोटी बच्ची ने हाथों में एक हरे रंग की बाला भी पहन रखी थी। बड़ी बच्ची छोटी का हाथ पकड़े तेजी से दूसरी ओर जाने लगी। मैं भी अपनी तंद्रा तोड़ते हुए तेज कदमों से बच्चियों के पीछे दौड़ी तो देखा कि दोनों खिलौने वाले सेक्शन के पास रुक गई है और सारी खिलौने के बारे में बात कर रही है। मैंने एक नजर चारों ओर दौड़ाई तो मुझे बच्चों के साथ कोई भी बड़ा व्यक्ति/अभिभावक दिखाई नहीं दिया। क्योंकि मुझे जानना था कि इतनी ठंड में बच्चों को इतनी लापरवाही के साथ कोई कैसे छोड़ सकता है...! 
खैर मैं वहीं दूसरी ओर हाथों में लंच बॉक्स लेकर झूठ-मूठ का देखने लगी ताकि उन दोनों की बातें सुन सकूं। दोनों बच्चियां काफी खुश लग रही थी।
मैं आगे से तो उनका चेहरा नहीं देख पा रही थी पर पीछे से ही उनकी आवाज की खनक उनकी खुशियों का एहसास करवा रही थी। बड़ी बच्ची ने कहा कि इधर के ये तीनों खिलौने मैं लूंगी,यह मेरा है। इस पर छोटी वाली ने नीचे की ओर लटके प्लास्टिक के प्लेन  को अपनी बाहों में भरते हुए कहा कि ये वाला मेरा है, मैं इसे लूंगी। इसी तरह से मन भर खिलौने का बंटवारा करने के पश्चात ऐसा लगा कि बड़ी बच्ची को अचानक से कुछ याद आया और वो छोटी का हाथ पकड़कर सीधे खींचते हुए कहा कि चल अब यहां से और तेज कदमों से दौड़कर आगे बढ़ने लगी।
पर वह अभी भी पीछे मुडकर खिलोनें की ओर देख रही थी ... इसी बढ़ने के क्रम में एक ओर उस छोटी बच्ची के साइज के गर्म फुल पैंट्स टंगे थे और छोटी बच्ची ने अपनी पूरी ताकत से उस पैंट की ओर चलते-चलते हाथ बढ़ाएं,पर बड़ी बच्ची बिना ध्यान दिए उसका हाथ पकड़े हुए लगातार तेज कदमों से बढ़ती रही। पर‌ छोटी बच्ची अपना हाथ और गर्दन उस पैंट की ओर ही घुमाए हुए आगे बढ़ती चली गई।मेरी आंखों से ओझल होने तक उसकी हाथ और आंखें उसी पैंट की ओर थी।
मैं इस दृश्य से कुछ सेकंड के लिए जड़ हो गई थी पर अचानक से जब मेरी तंद्रा टूटी; मैं लगभग दौड़ते हुए उस बच्ची को रोकने के लिए आगे बढ़ी,पर तब तक वह दोनों भीड़ में गुम हो चुकी थी और साथ में उस छोटी बच्ची को वो पैंट दिलवाने की मेरी उम्मीदें भी वही दम तोड़ कर रह गई....!

     

प्रियंका कुमारी 


Comments

Popular posts from this blog

अभिभावकों और बच्चों का एक साथ सीखना

दृश्य -1 साक्षी के दादाजी उसकी कक्षा में बैठकर उसके सभी सहपाठियों के बीच कहानी सुना रहे है और वो मन ही मन गर्वीली सी मुस्कान लिए सबके साथ कहानी सुन रही है। दृश्य -2 आदित्य अपनी दादी के साथ बैठकर एक सादे पेज पर कलर पेन्सिलों के साथ ड्राइंग कर रहा है। उसकी दादी और वो दोनों एक ही समय में एक ही पेज पर ड्राइंग कर रहे है और आपस में बातचीत भी कर रहे है। दृश्य -3 महिमा अपने घर के आंगन में अन्य भाई-बहनों के साथ मां के निकट बैठी है और उसकी कक्षा की शिक्षिका उसकी मां से उन्हीं की भाषा में बात कर रही है और बता रही है कि एक शिक्षक और अभिभावक साथ में मिलकर काम करें तो बच्चों का सर्वांगीण विकास कितना सरल हो जाएगा। साथ ही वो अपने बुनियादी कक्षाओं के बच्चों की शिक्षा में कैसे अपना सहयोग दे सकती है। दृश्य -4 स्कूटी से जा रही शिक्षिका रास्ते में रुक कर खेतों से घास के भारी-भरकम गट्ठर सर पर लिए जा रही महिलाओं को रोककर और उनके गट्ठर नीचे रखवाकर पेड़ की छांव में बैठकर उन्हें अपने पोते-पोतियों को रात में सोते समय कोई कहानी या अनुभव सुनाने की बात करती है और उनकी कविता -कहानी से बच्चों के शिक्षण पर...

टीचर ऑफ़ द मंथ : एक सराहनीय पहल

हैलो, मैं न्यूज 18 चैनल से बोल रहा हूं। एसीएस सर द्वारा बिहार के 12 शिक्षकों को टीचर औफ द मंथ अवार्ड् दिया गया है जिसमें आपका भी नाम है। बधाई हो। हम आप का बाइट लेना चाह रहे है। क्या आप अभी विद्यालय में है... चूंकि मैं उस समय डायट डुमरा, सीतामढ़ी में दीक्षा पोर्टल पर कोर्स लांच करने की तकनीकी प्रक्रियाओं को अपने लैपटॉप पर संपादित कर रही थी इसलिए मैंने उन्हें कहा कि आप से कुछ देर बाद बात करती हूं और मुझे इस अवार्ड की कोई सूचना नहीं मिली है। इसलिए आप मुझे इस से संबंधित कोई जानकारी है तो मेरे नंबर पर साझा कर दीजिए। कार्य की व्यस्तता अधिक थी फिर भी इस खबर को सुनकर प्रसन्नता हुई। इसलिए दो मिनट रुक कर मैंने जब अपना मोबाइल चेक किया तो देखा कि बधाई देने वाले और न्यूज लेने वालों के काॅल्स और मैसेज का अंबार लगा था। मुझे हंसी भी आई कि मुझे छोड़ कर सबको खबर हो चुकी थी कि मैं टीचर औफ द मंथ बन चुकी हूं। फिर अपने परिजनों को इस संबंध में एक मैसेज कर मैं अपने कार्य में और उत्साह के साथ व्यस्त हो गई। कोर्स लांच में जिला शिक्षा पदाधिकारी सीतामढ़ी का भी आगमन हुआ और उन्होंने भी बधाईयां दी। साथ ह...

निपुण अभिभावक निपुण बच्चे

निपुण अभिभावक निपुण बच्चे ********************************* इस आलेख के माध्यम से आप जानेंगे कि अगर हमें बच्चों की शिक्षा में अभिभावकों की सहभागिता सुनिश्चित करवानी है तो बच्चों के साथ-साथ अभिभावकों को भी निपुण बनाने में अपना सहयोग देना होगा। साथ ही अभिभावकों के लिए ऐसे अवसरों का भी सृजन करना होगा जिसमें वह बच्चों के हित में अपनी भागीदारी दे सकें। मैंने निपुण अभिभावक निपुण बच्चे नवाचार का प्रयोग कर अभिभावकों के लिए एक अवसर उपलब्ध करवाने की कोशिश की है जिसके माध्यम से वो बच्चों की शिक्षा में सहभागी बन सकें। किसी भी बच्चे के लिए परिवार प्रथम पाठशाला तथा माता-पिता/अभिभावक प्रथम शिक्षक होते हैं। बच्चे जब पहली बार विद्यालय आते हैं तो उस समय भी उनके पास बहुत सा ज्ञान और अनुभव होता है । वैसे तो बच्चों की शिक्षा में पूर्व में भी परिवार की भागीदारी के महत्व को स्वीकार किया गया है पर नई शिक्षा नीति 2020 में अभिभावकों एवं समुदाय की शिक्षा में सहभागिता पर विशेष बल देने की बात की गई है। राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा मंत्रालय द्वारा भी शिक्षा में अभिभावकों की सहभागिता से संबंधित डा...