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हम बच्चों से सीखते हैं।

हम बच्चों से सीखते हैं।
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हम अक्सर शिक्षा में नवाचार की बात करते हैं और बहुत सारी नवाचारी गतिविधियां बच्चों के बीच करते भी हैं ‌‌। पर कई बार बहुत सारी नवाचारी गतिविधियों का मार्गदर्शन हम शिक्षकों को बच्चों द्वारा प्राप्त हो जाता है जिसकी चर्चा लिखित रूप में हम बहुत कम ही कर पाते है। बच्चों द्वारा की गई छोटी सी भी हरकत या शरारत भी कभी -कभी हमें चीजों के बारे में सोचने की एक नई अंतर्दृष्टि प्रदान कर जाती है तो आइए आपको अपने कुछ ऐसे ही अनुभवों से रुबरु करवाती हूं जिसने मेरा मार्गदर्शन बच्चों के शैक्षिक हित में किया।
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आजकल छोटे बच्चों द्वारा मुझे प्रभावी शिक्षण विधियां सीखने को मिल रही है। बच्चों ने इस धारणा को खंडित किया कि यह जरूरी नहीं है कि आप जो कुछ सोच कर या प्लान कर विधालय या कक्षा कक्ष में आते हैं, ठीक उसी प्रकार आप शिक्षण कार्य संपन्न कर पाते हैं। नये सत्र आरंभ हो गये है और इस बार शिक्षण की शुरुआत मैंने पहली दूसरी और तीसरी कक्षा के बच्चों के साथ की है। इन बच्चों ने मुझे ऐसे अवसर उपलब्ध करवाएं जिनसे यह बात और अधिक स्पष्ट हुई कि बच्चों की जानकारियां हमारी सोच से कहीं अधिक रहती है। हाल के दिनों के  तीन प्रसंग संक्षिप्त रूप में साझा कर रही हूं, उम्मीद है काफी कुछ सीखने-सिखाने को मिल जाए!

1.टिकोला (आम) -   उस दिन कक्षा में जब प्रवेश किया तो  देखा  कि कुछ बच्चों ने मुट्ठी भींच रखी थी, कुछ के मुंह धीरे धीरे चल रहें थे तो कुछ एक दूसरे को कुहनी मार कोई बात छिपाने की कोशिश कर रहे थे। मिला जुला कर माहौल ऐसा था कि बच्चों का ध्यान कक्षा में बिल्कुल नहीं था। चूंकि निचली कक्षाओं में आवाज का स्तर ऊंचा होना चाहिए ताकि सभी बच्चों तक स्पष्ट आवाज पहुंच सके और वो बातें अच्छी तरह सुन व समझ सकें। पर हाल ही में मैं सर्जरी की प्रक्रिया से गुजरी थी इसलिए ऊंची आवाज में बोलना मेरे लिए संभव नहीं था। फिर कैसे इन बच्चों का ध्यान अपनी तरफ आकृष्ट करूं,इसी पेशोपेश में थी कि एक बच्चें ने गुड़िया नाम की एक छोटी बच्ची जो कि पहली कक्षा की छात्रा है, कि शिकायत कर डाली... दीदी जी देखो यह टिकोला खा रही है और वो बच्चा उस की बंद मुट्ठी खोलने का प्रयास करने लगा। मैं गुड़िया के पास गयी और बड़े ही प्यार से पुछा कि मुझे भी दिखाओ क्या खा रही हो तो उसने सकुचाते हुए अपनी मुट्ठी खोल कर आगे कर दी और धीरे से कहा कि सभी ने टिकोला रखा है।


 यह सुनकर सारा माजरा समझ में आ गया कि बच्चों का ध्यान कहां पर केन्द्रित है। इसलिए तत्काल मैंने टिकोला यानि कि आम की एक तस्वीर ब्लैकबोर्ड पर बना डाली, जिसे देख कर सब एक स्वर में बोल उठें- आम....।  मैंने कहा कि बच्चों आज हम पढ़ाई  नहीं करेंगे सिर्फ बात-चीत करेंगे। इसलिए सबसे पहले आज हम सभी आम के ही बारे में ही बात करेंगे। इतना सुनते ही सभी बच्चों का उत्साह दोगुना हो गया। अब सारे बच्चें जो टिकोला छुपा कर रखे थे वो खुलकर दिखाने लगे। फिर हमने बातचीत शुरू की और बच्चों ने बताया कि आम हरा,पीला और लाल रंग का होता है। कच्चा आम का रंग हरा और स्वाद खट्टा होता है तथा पके हुए आम का रंग पीला या लाल और स्वाद मीठा होता है। आम गर्मी के मौसम में खाने को मिलता है। आम को हम चुड़ा, रोटी ,चावल के साथ मिलाकर खाते हैं , साथ ही शब्जी और अचार बनाने में भी इसका उपयोग किया जाता है। 
उपरोक्त सारी बातें बच्चों ने खुद ही बताई। बच्चों की रुचि को देखते हुए  मैं आम के चित्र से आगे बढ़ते हुए पत्ते का एक चित्र बनाया,सारे बच्चों ने एक स्वर में कहा कि यह आम का पत्ता है।  मैंने पुछा कि तुम लोगों ने कैसे पहचाना तो हंसने लगे और बोले कि दीदी बगल में ही तो आम के बहुत सारे पेड़ है तो कैसे नहीं पहचानेंगे। 
फिर मैंने थोड़ा आश्चर्य सा भाव दिखाते हुए कहा कि अच्छा ये बात है तो चलो इस बार का पहचान कर बताओ  तब मानूंगी..! बच्चों ने भी चुनौती स्वीकार कर ली। फिर एक एक कर मैंने पीपल, नीम, अमरूद, पौधे के प्रमुख भाग के चित्र बनाएं और बच्चों ने सभी को आसानी से पहचान लिया। फिर मैंने एक ही तरह के दो चित्र बनाएं,पर उनकी पतियों का आकार अलग प्रकार से बनाएं। इस बार बच्चें कुछ सेकंड के लिए गंभीर हुए पर तुरंत ही चिल्ला उठें कि एक मूली है और दूसरी गाजर है, क्योंकि दोनों की पत्तियों का आकार अलग अलग है। मूली की पत्तियां बड़ी और चौड़ी होती है जिसका हम साग भी बना कर खाते हैं जबकि गाजर की पत्तियां मूली जितनी बड़ी नही होती है।  मैं बच्चों के ज्ञान से हतप्रभ थी कि बिना एक शब्द बताएं बच्चों ने मुझे इतनी सारी जानकारी अपने आप दी। 
इससे एक बात तो स्पष्ट हो चुकी थी कि प्राथमिक कक्षाओं में बच्चें अपने साथ थोड़ा सा नहीं,बल्कि बहुत सारा ‌‌‌‌‌‌‌ज्ञान अपने परिवेश से लें कर विधालय आते हैं। संभवतः यही वजह है कि पर्यावरण की शिक्षा पहली और दूसरी कक्षा में भाषा और गणित में परिवेश को जोड़ कर प्रदान की जाती है। 
साथ ही मुझे  यह भी एहसास हुआ कि एक शिक्षक को चित्रकारी का थोड़ा बहुत ज्ञान होना अत्यंत आवश्यक है।

जो बच्चें कितनी कोशिश के बाद भी कक्षा में नहीं बोल पाते थे वो सभी आज सक्रिय भागीदारी निभा रहे थे। जरुरत थी तो इस उत्साहित वातावरण को निरंतर कायम रखने की। चूंकि बच्चे तब से एक ही टापिक पर थे, इसलिए संभावना थी कि बच्चे कही ऊब ना जाए। इसलिए अब मुझे कुछ अलग चित्र बनाना था,पर वो उनके दैनिक जीवन से जुड़ी चीज हो तभी बच्चें सक्रिय भागीदारी निभा सकते थे। इसलिए मैंने मछली का चित्र बनाया, क्योंकि विधालय के पोषक क्षेत्र की अधिकांश आबादी मछली पकड़ने के कार्य में संलग्न रहती थी।
जैसे ही मैंने मछली का चित्र बनाना शुरू किया, बच्चें एक साथ चिल्ला उठे----मछरी (मछ्ली) | फिर मैंने बच्चों से मछली के संबंध में बातचीत शुरू कि तो पता चला कि बच्चों को मुझसे ज्यादा पता है। बच्चों ने मछली पकड़ने के परंपरागत तरीके से लेकर घरेलू तरीके भी बताएं। मछली के अलग-अलग प्रकार के नाम भी बताएं ।हद तो तब हो गई जब बच्चों ने श्यामपट्ट पर बनी मछली की आकृति के वजन के संबंध में अनुमान भी लगाना शुरू कर दिया। मछली के वजन को लेकर लगभग कक्षा के सभी बच्चों का अनुमान एक -दुसरे के आसपास ही था। बाद में मैंने भी गौर किया आकृति के तरफ तो मेरे मन में भी मछली के वजन को लेकर बच्चों जैसे ही ख्याल आएं।
और इस तरह से सही मायने में  मेरी उस दिन की कक्षा पूर्णतः बालकेन्द्रित और काफी रुचिकर रही।

2.जमीन पर चित्रकारी - बच्चों को खेल के मैदान में सामूहिक रूप कुछ गतिविधियों को करवाने के लिए खड़ा किया था। बच्चों को एक खेल गतिविधि भी करवायी।पर दूसरी गतिविधि के दौरान मेरा फोन बज उठा,देखा तो शिक्षा विभाग के एक अधिकारी का काॅल था इसलिए मैंने बच्चों को इशारा किया कि दो मिनट इंतजार करें वो बात कर लेती है। पर इसी बीच दो -चार बच्चें नीचे बैठ गए और मिट्टी पर ही अपनी उंगलियों से आकृतियां उकरेने लगे और मिटाने लगे। मैं यह देख रही थी और अचानक से मेरे दिमाग में कुछ सूझा। मैंने बात करते हुए ही सभी बच्चों को बैठ जाने का इशारा किया।कई और बच्चों ने बैठ जाने के बाद मिट्टी आकृतियां उकेरना शुरू कर दिया। मैं यह देखकर काफी रोमांचित महसूस की और संक्षेप में बात कर जल्दी से फोन रखा। फोन रखते ही सारे बच्चें अपनी आकृतियां मिटाने लगे और एक -दूसरे से कानाफूसी करने लगे कि दीदी/मैडम जी गुस्सा होएंगी।

पर मैंने सभी बच्चों के डर, संकोच को विराम देते हुए सीधे कहा कि चलो आज जमीन पर हमलोग फ्री ड्राइंग करते हैं। जिसको जो मन करें वो आकृति वो मिट्टी पर बना सकते हैं। जैसे ही बच्चों को अपने मन का करने की आजादी मिली,सभी बच्चें लग गए अपनी मनपसंद आकृतियां उकरेने में। सच, बच्चों ने इतनी खूबसूरत आकृतियां बनायी जिसके बारे में मैंने कभी नहीं सोचा था। चूंकि विद्यालय के सारे बच्चें आर्थिक रूप से काफी कमजोर पृष्ठभूमि के थे, इसलिए ड्राइंग बुक और कलर तक उनकी पहुंच नही थी। मैंने सभी बच्चों का हौसला अफजाई करते हुए सभी की बनायी चित्र के साथ कुछ तस्वीरें और सेल्फी ली। बच्चों ने मुझे आज एक नई अंतर्दृष्टि प्रदान की थी। इसलिए मैंने बच्चों तक ड्राइंग शीट और कलर की उपलब्धता के लिए उनकी तस्वीरों का उपयोग सोशल प्लेटफॉर्म पर कर बच्चों के लिए सहायता प्राप्त की। बच्चों की ललक को देखते हुए स्थानीय स्तर से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रहने वाले लोगों ने भी मदद की।

3. दुप्पटे के झालर से गिनती -  बिहार में संचालित स्कूल रेडीनेस प्रोग्राम 'चहक' में बतौर मास्टर ट्रेनर की भूमिका में रहने के कारण कुछ समय तक विद्यालय से दूर थी। इसके बाद जब विद्यालय आयी तो बच्चों में बड़ी उत्सुकता थी मुझसे मिलने और बात करने को लेकर।  हमलोग ने बातचीत भी किया पर मुझे नहीं पता था कि आज भी यह प्यारे-प्यारे बच्चें मुझे कुछ सीख दे जाने वाले हैं। हुआ यूं कि मध्यान्ह भोजन अवकाश के समय मैं अपने सहकर्मियों से बात कर रही थी तो पीछे से दो बच्चियां मेरे दुप्पटे को खींच रही थी। मैं बात करने के क्रम में बच्चों पर ध्यान दिए बिना ही अपना दुपट्टा उनकी हाथों से धीरे से खींच लिया कर रही थी। यह प्रक्रिया दो-तीन बार हुई। अंत में मैं बातचीत रोक खींझकर पीछे पलटी कि तुमलोग क्या कर रहे हो और दुप्पटा क्यूं खींच रहें। पर वो दोनो बच्चियां शांत भाव से बिना डरे मुस्कुरा कर बोली कि वो दुप्पटे में लगी झालर की गिनती कर रहे हैं। यह सुनकर मैं हैरान रह गई और बहुत खुश भी हुई की गिनती का साधन कुछ भी हो सकता है। बिना एक पल गंवाए मैंने अपनी सहकर्मी से कहा कि मैं आप से बाद में बात करुंगी और दोनों बच्चियां खुशी और राधा का हाथ पकड़ क्लासरूम में ले आयी। अपना दुपट्टा एक तरफ से उन्हें पूरा दे दिया और कहा कि अब वो आराम से गिनती करें और गिनती कर बताएं कि कितने झालर है इसमें। फिर क्या था, दोनों खुशी से एक एक हिस्से को पकड़ गिनती करने लगी।

राधा ने 26 तक गिनती की और रुक गई पर ख़ुशी  ने अपनी गिनती जारी रखी और दुप्पटे के अंतिम हीरे तक गिनती करते हुए बताया कि इसमें 87 झलरी है। मुझे बड़ा ही सुखद अनुभव हुआ। फिर मैंने दोनों से पुछा कि तुम्हारे मन में यह गिनती का ख्याल कैसे आया तो उन्होंने बताया कि वो दुप्पटे की झलरी हवा पर झूल रही थी तो उसे देखकर मन में आया कि चलो गिन कर देखते हैं कि कितनी झलरी है। एक तरह से बच्चों ने मुझे यह मार्गदर्शन दिया कि हमें अपने बच्चों को अपने घर, आस पास या कक्षा कक्ष में ही उपलब्ध वस्तुओं के माध्यम से गिनती या अक्षर प्रिंट किए गए वस्तुओं को देखकर उसे जानने-समझने की कोशिश के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए तथा कोई भी साघन हमारा टीएलएम साबित हो सकता है।
मेरे दुप्पटे को टीएलएम के तौर पर प्रयोग करने के लिए खुशी और राधा को मैंने प्रोत्साहित करने के लिए सेल्फी प्राइज दिया। सेल्फी खिंचवाकर दोनों बहुत खुश हुई।

4.वस्तुओं की जोड़ी बनाना/समानता ढूंढना - वस्तुओं में समानता ढूंढना या उनकी जोड़ी बनाना के एक आसान तरीके का पता मुझे तब चला जब एक शुक्रवार को मैंने बच्चों को बताया कि कल यानी शनिवार के दिन हम सभी पढ़ाई के बदले मिट्टी की कलाकृतियां बनाएंगे। यह सुनकर सभी बच्चे बहुत ही खुश हुए। इस पर मैंने बच्चों की उत्सुकता को जारी रखने के लिए यूं ही पूछा कि अच्छा यह बताओ कि कल मिट्टी से आप लोग क्या-क्या आकृतियां बनाओगे। तब बच्चे एक दूसरे की ओर देखने लगे। फिर मैंने सोचा कि अच्छा मैं ही शुरु करती हूं कुछ बोलकर। इसलिए मैंने कहा कि मैं तो कल मिट्टी से कलम बनाऊंगी। इस पर दो तीन बच्चों ने भी सकुचाते हुए घरेलू प्रयोग के कुछ चीजों के नाम बताएं फिर सभी शांत हो गए पर मैं सभी बच्चों की भागीदारी चाहती थी इसलिए मैंने पुनः बोलना शुरू किया कि मैं तो मिट्टी से कल शिवलिंग बनाऊंगी तो एक बच्चें ने कहा कि फिर मैं त्रिशूल बनाऊंगा। मुझे अच्छा लगा कि बच्चों ने बोलना शुरू किया। फिर मैंने इस क्रम को दोहराते हुए कहा कि मैं तो कॉपी बनाऊंगी तो बच्चों ने कहा कि मैं कलम बनाऊंगा। मैंने कहा कि मैं तो टीवी बनाऊंगी तो बच्चों ने कहा कि मैं रिमोट बनाउंगा। बच्चों का जवाब सुनकर इस बार मैं थोड़ी देर के लिए रुकी। अचानक से मेरी आंखों में चमक और होठों पर हल्की मुस्कान तैर गई क्योंकि बच्चों ने अनजाने में ही वस्तुओं में समानताएं ढूंढना शुरू कर दिया था। बच्चों ने अचानक ही मुझे एक अवसर उपलब्ध करवा दिया था जिससे कि मैं उनके बीच वस्तुओं के संबंध के आधार पर उनसे जोड़ियां निर्मित करवा सकती थी।
अब तक मैं मिट्टी से कलाकृतियां बनाने के संबंध में बात कर रही थे बच्चों से, पर अब मैं उनके साथ समान वस्तुओं की जोड़ी पर बात करना शुरू कर दी थी। मैंने पुनः शुरू किया बोलना कि अरे! मैं तो रोटी बनाऊंगी तो उन्होंने कहा कि वे तावा बनाएंगे। इसी तरह से फूल-गुलदान, सिलौटी-लोढा, बेलना-चकला, जूता-मोजा-शू लेस, फिर कॉपी-कलम, पेड़ -कॉपी-कागज आदि अनेक शब्द बच्चों ने बोले। इस प्रकार बच्चों ने एक बार फिर से मुझे एक अवसर कुछ नया सीखने को दिया जिससे मैं उनके अधिगम में सहायक बन सकूं।


                          इसी तरह से आए दिन बच्चें मुझे बहुत कुछ सीखा रहे है। हमें बच्चों की रुचियों और गतिविधियों के प्रति सकारात्मक और संवेदनशील होना चाहिए क्योंकि क्या पता, बच्चों की कब कौन सी हरकत/शरारत/गतिविधि हम शिक्षकों को एक अंतर्दृष्टि प्रदान कर जाएं। सच में बच्चों के पास ज्ञान का भंडार होता है बस हमें उसे समय-समय पर परिमार्जित करने की आवश्यकता होती है। तो आइए हम शिक्षक अपने सभी पूर्वाग्रहों को दरकिनार करते हुए अपने बच्चों से सीखने का प्रयास करें।

धन्यवाद
प्रियंका कुमारी, शिक्षिका
मध्य विद्यालय मलहाटोल, परिहार, सीतामढ़ी, बिहार 

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