#My_Diary
आजकल मैं काफी चिंतित महसूस कर रही हूं अपने ग्रामीण क्षेत्र के बच्चों की शिक्षा को लेकर, क्योंकि शिक्षा व्यवस्था लगभग चरमरा सी गई है। शिक्षा व्यवस्था को ध्वस्त करने में कोविड ने रही सही कसर भी पूरी कर दी। पिछले दो वर्षों से ग्रामीण क्षेत्रों के सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले छात्रों की शिक्षा पूर्णतया नगण्य रही। शहरी क्षेत्रों का नाम मैं इस लिए सम्मिलित नहीं कर रही, क्योंकि व्यवहारिक तौर पर मुझे इसका अंदाजा नहीं। चूंकि ग्रामीण क्षेत्र से मैं जुड़ी हुई हूं तो मैं स्थितियों को देख और समझ पाने में सक्षम हूं। यह बात तो हम सभी जान रहे हैं कि सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों के सरकारी विद्यालयों में वैसे ही छात्र नामांकित हैं जिनके पास निजी स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ाने का विकल्प उपलब्ध नहीं है। अब जाहिर सी बात है कि ऐसे अभिभावकों की आर्थिक स्थिति भी काफी निम्नतम स्तर पर होती हैं। ऐसी स्थिति में कोविड काल में इनके बच्चों की शिक्षा पूरी तरह से ठप्प पड़ जाना कोई आश्चर्य का विषय नहीं। बच्चों को इस बात का अंदाजा नहीं है कि वो क्या खो रहे हैं और अभिभावकों के पास कोई विकल्प नहीं। ऐसे में इन बच्चों का स्वर्णिम समय यूं ही खेलने-कूदने में बर्बाद हो रहा है। चूंकि अब हालात बदले हैं और सामान्य स्कूलिंग शुरू कर दी गई है , फिर भी अभी वो संख्या और उत्साह नहीं दिख रहा है जो कोविड पूर्व विधालयों में दिखा करता था। बच्चों और अभिभावकों में शैक्षिक दायित्वों के प्रति उदासीनता घर कर चुकी हैं जिसे पुनर्जागृत करने की आवश्यकता है।
शिक्षक भी ज्यादा रुचि नहीं दिखा पा रहे हैं इस उदासीन स्थितियों को परिवर्तित करने में। कुछ एक प्रयास कर वो भी अपनी जिम्मेदारियों की इतिश्री कर लें रहें हैं।
पर सवाल यह है कि इन सभी बातों के बीच में उन बच्चों का क्या कसूर है जिन्हें यह भी ज्ञान नहीं है कि वह अपने जीवन का सबसे अमूल्य वक्त खो रहे हैं। मीडिया से लेकर शिक्षा विभाग तक में औनलाइन स्टडीज, एजुकेशनल प्लेटफार्म्स,एप्पस आदि द्वारा शिक्षा को जारी रखने का दावा किया गया और एक दूसरे की पीठ थपथपाई गई कि कोविड की विकट स्थिति में भी हमने शिक्षा को जारी रखा और शिक्षा विभाग टेक्नोलॉजी बेस्ड व टेक्नो फ्रेंडली बन गया। पर यह हकीकत कुछ सीमित वर्ग तक ही सीमित रह गई। उन बच्चों का क्या जिनके पास आईसीटी इक्विपमेंट्स ही मौजूद नहीं थे। जिनके घर में दो वक्त का भरपेट भोजन उपलब्ध होना ही सबसे बड़ी चुनौती थी। हमारी व्यवस्था ने ऐसे बच्चों के लिए कुछ भी अतिरिक्त नहीं सोचा। प्रतिबद्धता सिर्फ उन्हीं बच्चों तक सीमित रही जिनके पास पूर्व से ही सभी प्रकार की सुविधाएं उपलब्ध रही। इन बच्चों को शिक्षा के नाम पर सिर्फ कुछ किलो चावल ही बस उपलब्ध कराएं गए , जिससे उनकी पेट की आग बस बुझी रहें और बौद्धिकता की अग्नि कभी प्रज्वलित ही ना हों।
आखिर हम कौन सा समाज तैयार कर रहे हैं। एक सुविधा संपन्न शिक्षित समूह के लिए हम एक अशिक्षित समाज को तैयार कर रहे हैं जो भविष्य में विभिन्न प्रकार की परेशानियों एवं घटनाओं का सबब बना सकता है। हमें दुरदर्शी सोच कायम करने की आवश्यकता है।
बहुत सारी चीज़ें सिर्फ कागजों में चल रही है। पहले किताबें देर सबेर विद्यालयों के माध्यम से बच्चों को मिल जाया करती थीं, परंतु अब तो बच्चों को पता भी नहीं चलता कि कब उनके खातों में पैसा आया और कब वो चुल्हों की लौ को तेज करने में खर्च हो जा रहे। किताबों का क्रय बच्चों की संख्या के अनुपात में काफी कम है। सिर्फ फाइलों में यह अनुपात शत प्रतिशत है।आज भी सैकड़ों विधालय ऐसे मिल जायेंगे जहां के बच्चों के पास स्कूल ड्रेस नही है। खैर छोड़ते हैं इन तथ्यों को।
पर सबसे महत्वपूर्ण यह है कि क्या हम इन अभावग्रस्त बच्चों के लिए कुछ अलग प्रयास नहीं कर सकते हैं...जिस तरह से आपदाओं के समय विभिन्न राहत सामग्रियों का वितरण किया जाता है उसी तर्ज पर शिक्षण सामाग्रियों का वितरण क्यों नहीं किया जाता है। मैंने एक बार कोविड संकट के समय में सक्षम अधिकारियों को टैग कर इस संबंध में एक ट्वीट भी किया था ताकि कुछ शिक्षण सामाग्रियां बच्चों को प्राप्त हो सके जिसके माध्यम से कम से कम वो अपने पूर्व ज्ञान को भी सहेज कर रख पाने में सफल हो सके। परंतु हमारे यहां शायद यह कोई मुद्दा ही नहीं है अर्थात इस मुद्दे का कोई अस्तित्व ही नहीं है।पर सच तो यह है कि हमारे इन बच्चों की बौद्धिकता ख़तरे में है जिसे रेस्क्यू करने की आवश्यकता है और पुनर्स्थापन के लिए राहत सामग्री अर्थात शिक्षण सामाग्रियों की आवश्यकता है। कुछ एक स्वयं सेवी संस्थाओं द्वारा बच्चों को शैक्षिक सामग्री उपलब्ध भी करवायी जाती हैं तो उनकी संख्या उंगलियों पर ही गिनने लायक होती हैं,पर सूचनाएं प्रसारित इस प्रकार से होती है जैसे शत प्रतिशत बच्चों को उन्होंने लाभान्वित किया हो। धरातलीय स्थिति प्रिंट और सोशल मीडिया से काफी इतर होती है। फिर भी हम खुश हो अपनी पीठ थपथपा लेते हैं और सबकुछ ठीक होने का दावा करते रहते हैं।
कभी कभी सोचती हूं कि हमारे देश में इतने सारे इनोवेटिव लोग हैं,क्या वो एक इनोवेशन ऐसे अभावग्रस्त, पिछड़े क्षेत्रों के बच्चों के लिए नही कर सकते जिससे वो अपनी विपरीत परिस्थितियों में अपनी शिक्षा को जारी रख सकने में सक्षम हो। जैसे कि दो वर्षों से कोविड की ही विपरीत परिस्थितियों ने उनकों शिक्षा से वंचित रखा, क्योंकि इन बच्चों के पास डिजिटल डिवाइस नही थे।पर क्या इन दो सालों में एक ऐसी डिजिटल डिवाइस विकसित नहीं की जा सकती थी जिसके माध्यम से बच्चों तक कम से कम श्रव्य सामग्री ही उपलब्ध हो पाती। एक ऐसा डिवाइस जिसमें कविताओं, कहानियों के अलावा विषयगत जानकारियां ओडियो मोड में ही उपलब्ध होती और बच्चा हर समय उसे सुन पाता। कम से कम सुनकर भी तो वो अपनी बौद्धिक संपदा का उत्तरोत्तर विकास कर पाता। अगर हर बच्चे के पास इस तरह की डिवाइस होती जिसे ना तो इंटरनेट से कनेक्ट करने की झंझट होती और ना ही इधर उधर भटकने की हमारे लिए क्या उचित-अनुचित है, तब बच्चों में एक निश्चित बौद्धिक विकास संभव हो पाता।
उदाहरण स्वरुप आप छोटे बच्चों के लिए मेलों में मिलने वाले खिलौना मोबाइल ही ले लीजिए, जिसमें हर बटन पर एक गाना सेट किया होता है और जैसे ही बच्चा बटन दबाता है गाना बजने लगता है, तो क्या इस तरह की खिलौने भी कुछ न कुछ नया सोचने के लिए हमारे इनोवेटिव आईटी एक्सपर्ट को प्रेरित नहीं कर सकते हैं...! मेरा सभी आईटी एक्सपर्ट और एनसीईआरटी की इकाई सीआईटी से अनुरोध है कि वो एक ऐसे डिजिटल डिवाइस को जरूर विकसित करने के बारे में सोचें जिससे कि कम से कम ओडियो मोड में ही सही शैक्षिक सामग्री उपलब्ध हो सके और भविष्य में पुनः कोविड जैसी परिस्थितियों के कारण गरीब सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले बच्चों की शिक्षा पूर्णतया बाधित ना हो सकें!
धन्यवाद ।
प्रियंका कुमारी
शिक्षिका
सीतामढ़ी बिहार
pkjha2209@gmail.com
Comments
Post a Comment