प्रियंका प्रियदर्शिनी द्वारा लिखी "उलझनें" काव्य संग्रह की समीक्षा राष्ट्रीय स्तर के कवि साहित्यकार और नेशनल बुक ट्रस्ट के न्यासी सदस्य डा. संजय पंकज द्वारा किया गया है जिसके अंश इस प्रकार है------
प्रेम और मुक्ति के बीच अस्मिता की तलाश
बहुत आसान नहीं है स्त्री-मन को जानना समझना मगर सर्वथा कठिन और असंभव भी नहीं है अगर सहज प्रेम के प्रवाह में संग संग स्त्री पुरुष का जीवन एकलय होकर प्रवाहित हो तो! यह एकलय एकरसता नहीं है। जीवन बहुत सारी विसंगतियों के साथ चलता रहता है। संघर्षों के बीच भी जीवन जीने की अदम्य लालसा के केंद्र में प्रेम होता है। प्रेम का रूप मोह भी है। प्रेम और मोह में अंतर। मोह बंधन है और प्रेम मुक्ति है। कवयित्री प्रियंका प्रियदर्शिनी के काव्य संग्रह 'उलझनें' में मोह और प्रेम का द्वन्द्व है जिसे साफ साफ मुक्ति की चाहना और अस्मिता की रक्षा के संदर्भ में देखा जा सकता है। मोह में स्व का बचा रहना स्वाभाविक है। प्रेम में स्व का सर्वथा विसर्जन हो जाता है। प्रेम की पराकाष्ठा नि:स्व हो जाने में है। अस्मिता की तलाश और पहचान की आकुलता में नि:स्व होना असंभव है। स्व के सम्मान पूर्ण स्थापन के लिए संग्रह की कविताएं प्रेम के ताने-बाने में खूब उलझती हैं। उलझनें बढ़ती ही चली जाती हैं।
~ डा. संजय पंकज
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