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शौचालय "एक संघर्ष गाथा"

  शौचलय "एक संघर्ष गाथा "


टॉयलेट एक प्रेम कथा का फिल्म का  नाम  तो लगभग सभी ने सुना होगा ,पर आज हम आपके बीच एक ऐसी शिक्षिका की संघर्ष कथा रखने वाले है जिसे "शौचालय  एक संघर्ष गाथा" का नाम दिया जा सकता हैं | विवादों से बचने के लिए बिना किसी वास्तविक नामों का उल्लेख करते हुए इस आलेख को आपके बीच साझा कर रही हूँ |

................हां तो इस संघर्ष की शुरुआत होती है मेरी पहली पोस्टिंग से | आज से करीब 14 साल पहले मेरी पहली पोस्टिंग एक अत्यंत पिछड़े गाँव के प्राथमिक विद्यालय में हुई थी | मैं बहुत खुश थी की चलो जिस काम को मैं बचपन से करती आ रही हूँ अब मैं  उस कार्य को अधिकारिक तौर पर कर पाऊँगी क्योकि अब मैं एक सरकारी विद्यालय की शिक्षिका हो गयी |पहला दिन बच्चों के साथ काफी अच्छा अनुभव रहा |स्टाफ लोग भी सकरात्मक थे | पहले दिन ही पता चल गया था कि विद्यालय का शैक्षिक वातावरण काफी निम्न स्तर का था| खैर इस बारे में यहाँ चर्चा नही करूंगी | दिनभर का समय विद्यालय में बिताने के बाद अब मुझे 'हल्का' होने की  जरुरत महसूस हो रही थी ....इधर उधर नज़र दौड़ाई ,पर कही भी दिखाई नही दिया | अंततः मैं अपनी महिला स्टाफ के पास धीरे से जा कर कहा  कि मुझे टॉयलेट कही नज़र नही आ रहा ,प्लीज मुझे बताये की ये कहा हैं | 

वो मेरी तरफ देख कर मुस्काई ,ऐसा लगा की जैसे मैंने उनसे कोई बचकानी बात कह दी हो | मुझे कुछ देर रुकने को कहा |मैं  मन ही मन  सोचने लगी की अजीब महिला हैं ,मेरी मदद करने के बदले रुकने को बोल रही | खैर मैंने जैसे तैसे इंतजार किया |कुछ मिनटों के बाद उन्होंने अपने साथ चलने कहा ,मैं यंत्रवत उनके साथ चलने लगी | पर ये क्या वो तो मुझे स्कूल के बगल एक खेत में ले गई ,जहाँ एक छोटी सी झोपड़ीनुमा घर और पुआल के बड़े बड़े दो -तीन ढेर लगे हुए थे | इन्ही पुआल के ढेर के ओट में उन्होंने मुझे बैठ जाने को कहा ,ताकि खुद को हल्का किया जा सके | मुझे मानो तो ऐसा लग रहा था की काटों तो खून नही वाली हालत |  वो लगातार मुझे बोले जा रही थी कि जल्दी से कर लो अभी कोई नही हैं |पर मेरा तो दिमाग सुन्न पड गया था |मैडम खीझ कर खुद ही उस पुआल के निचे बैठ कर हल्का हो ली | मैंने चारो ओर नज़र घुमा कर देखा तो एक तरफ स्कूल का फील्ड ,दूसरी ओर खुला खेत दूर दूर तक और दो ओर से मुख्य सड़क जिसमे एक सड़क की ओर कुछ छिट-पूट बनी झोपड़ियाँ | कोई कैसे इस तरह खुले में बैठ सकता हैं | अंतत मैडम ने कहा की यहाँ ऐसे ही चलता हैं ,करना हैं तो करो नही तो चलो वापस|मैंने किसी भी तरह अपने आप पर नियंत्रण किया और वापस चली आई स्कूल में | तबतक मेरी गाड़ी भी घर से आ चुकी थी मुझे लेने के लिए |घर पहुचते ही बाथरूम की तरफ भागी और चैन की सांस ली | माँ ने पूछा की कैसा रहा दिन आज का | मैंने कहा कुछ मत पूछो माँ , वहां तो टॉयलेट ही नही हैं ....और सारी कहानी उन्हें बताई | फिर पापा से बात की तो उन्होंने  कहा की अपने  विद्यालय के प्रभारी से बात करो इस सम्बन्ध में |

खैर सारी बातों को भूलते कल पुनः विद्यालय गई। फिर दोपहर बाद वही समस्या आ खड़ी हुई। पुनः मैडम को अनुरोध किया कि वो साथ में चलें, क्योंकि अभी छुट्टी होने में काफी वक्त था। जैसे तैसे सकुचाते हुए मैं भी बैठ गई उस पुआल के नीचे। शर्म और भय से मेरा बुरा हाल था कि कोई देख ना ले मुझे इस हाल में। हड़बड़ी में जैसे तैसे उठी और कपड़े ठीक कर ही रही थी  तभी एक छोटा सा सांप वहां से गुजरा। मैं चिल्ला उठी... पर मैडम हंसने लगी कि अरे यह सांप नहीं काटता है, ऐसे ही भाग जाएगा। मैं स्तब्ध थी उनकी इस प्रतिक्रिया से।

पुनः विधालय में लौटने पर मैडम से चर्चा कि आप ने कभी इस बात के लिए आवाज नहीं उठाई।यह कितनी शर्मनाक बात है कि विधालय में एक अदद शौचालय नहीं हैं और शिक्षक एवं छात्रों का समूह खेतों और सड़कों पर शौच करते हैं। विधालय से जुड़ी हुई मुख्य सड़क भी दोनों छोर से मल-मूत्र त्याग का केन्द्र थी।पर इसके लिए कोई कुछ नहीं बोलने वाला था, क्योंकि अधिकांश घरों में टाॅयलेट की सुविधा नही थी। खैर मैडम ने कुछ संतुष्ट करने वाला जबाब नहीं दिया। 

अगले दिन विधालय आकर मैंने विद्यालय प्रधान से इस बारे में चर्चा करने की हिम्मत जुटाई। क्योंकि उनका व्यक्तित्व रूढ़िवादी मूल्यों को बढ़ावा देने वाला परिलक्षित होता था। जल्दी बोलते नहीं थे किसी बात पर और जब बोलते तो उनकी आवाज इतनी धीमी-धीमी और रहस्मयी होती कि मुझे उनकी बातें समझने के लिए अपनी संपूर्ण श्रवण शक्ति का प्रयोग करना पड़ जाता था।  फिर भी अपनी बात रखी मैंने तो उन्होंने मुझे वित्तीय प्रावधानों का हवाला देकर ऐसा कन्वींस किया कि मैं सिर्फ उनका मुंह ही देखती रह गई। चूंकि मैं भी नवनियुक्त शिक्षिका थी और मुझे विधालय संबंधित किसी भी प्रकार के वित्तीय प्रावधानों की जानकारी नही थी। फिर क्या मन मसोस कर रह गई। 

कुछ समय बाद हमारे विधालय प्रधान के गांव के ही एक व्यक्ति मिलें जो कि मेरे गांव के उच्च विद्यालय के प्रधान के पद पर आसीन थे। उन्होंने मेरा हाल चाल लिया और पुछा कि कोई दिक्कत तो नहीं है ना...? फिर क्या था, मैंने तुरंत ही बेहद संक्षिप्त में अपनी व्यथा बताई कि विद्यालय में तो शौचालय ही नहीं है! मैंने थोड़ा कहा और उन्होंने बहुत समझा इस बात को।  दो-चार दिन बाद ही देखा मेरे विधालय प्रधान ने दो मजदूर लगा रखे हैं और टाट की घेराबंदी कर बीच में दो ईंट रखकर एक अस्थायी शौचालय का निर्माण करवा रहे हैं। यह देखकर घोर आश्चर्य हुआ और खुशी भी कि चलो कम से कम अब पुआल के पीछे खुलें में तो नहीं बैठना होगा। फिर बातों ही बातों में पता चला कि उस दिन जो सर मिले थे रास्ते में उन्होंने घर जाकर मेरे विधालय प्रधान को आड़े हाथों लिया था इस असुविधाजनक स्थिति के लिए। मैंने मन ही मन उन सर का शुक्रिया अदा किया जिनके वजह से कम से कम इस खड़-फूस से बने टाट की सुविधा उपलब्ध हो सकी।

कुछ दिन काफी अच्छा बीता। ये और बात थी  कि एक ही जगह पर सब के मूत्र त्याग से जमीन हमेशा गीली रहती थी। फिर भी यह सुकुन था कि चारों ओर से टाट की घेराबंदी है तो कोई और हमें असहज स्थिति में नहीं देख सकता। पर यह खुशी भी लंबे समय तक टिक नहीं सकी। बरसात का मौसम आ चुका था। एक दिन इतनी जोर की आंधी-बरसात आयी कि वह अस्थायी शौचालय धराशाई हो गयी। फिर कुछ दिन के मिन्नत के बाद उसे ठीक करवाया गया। पर शायद हमारे भाग्य में सुख लिखा ही नहीं था। एक दिन ऐसा तुफान आया कि टाट का कुछ भाग उड़ कर दूर बिखर गया और कुछ भाग वहीं धराशाई हो गया। अब इस बार विधालय प्रधान किसी भी प्रकार की दया भाव दिखाने के मूड में नहीं थे। और इस तरह से हमारे सपनों का महल बिखर सा गया।

हम फिर से अपने पुराने रुटिन में आ गए थे  खुले आकाश के नीचे। धीरे धीरे मैं भी  इस स्थिति को स्वीकारने लगी। हर दिन एक चुनौती होती थी अपने इज्जत और सम्मान को सुरक्षित रखने की। इसी बीच जिस खुले मैदान में हम जाया करते थे उस में एक झोपड़ी थी, तो उसमें थोड़ा विस्तार कर एक और कमरे को बढाया गया था। पता चला कि उस झोपडी वाले की बहु यहां आकर रहेगी कभी कभी। तो उसके लिए तीन तरफ से टाट घेरकर शौच करने की अस्थायी व्यवस्था की गई है जिसके बारे में जानकारी प्राप्त कर हम फिर खुश हो गये। हमने उस टाट के घेरे का उपयोग करने के लिए बेवजह बातचीत और अपनापन की शुरुआत कि ताकि हम इस टाट वाली अस्थायी घेरे का उपयोग कर सकें। जब जब घर पर बहु होती तो आसान और सहज होता था उस टाट के घेरे का उपयोग,पर जब उस घर के पुरुष पशुओं को चारा दे रहे होते या बैठ कर बतिया रहे होते आपस में, तब स्थिति काफी असहज हो जाती थी। कभी कभी हम दूर से ही देखकर वापस लौट जाते और फिर इंतजार में नजरें गड़ाए रहते  कि कब उस झोपड़ी के पुरुष बाहर की ओर रूख करें। खैर इसी तरह से हमारा दो साल निकल गया। पर एक दिन ऐसा हुआ जिसकी कल्पना कर मैं आज भी असहज हो जाती हूं कि मैंने उस वक्त को कैसे झेला। क्लास लग चुकी थी और अचानक से मुझे जोरों की महसूस हुई ,कितना भी नियंत्रित करने की कोशिश कि पर सारी कोशिशें असफल। फिर तेज कदमों के साथ मैडम के पास गयी,उनको बताया तो उन्होंने एक जग की ओर इशारा किया कि इसमें पानी भर लो , फिर वो मुझे एक आम के पेड़ के नीचे ले गयी जो कि विधालय से ही सटा हुआ था। मैं भय और शर्म से बैठ नही पा रही थी पर स्थिति ऐसी बनी कि सारा लोकलाज छोड़ कर बैठना पड़ा। मैडम खड़ी हो कर एक ओर से कवर अप करने में लगी थी पर बाकी के तीन ओर का खुलापन मेरे मन में दहशत और घृणा का भाव पैदा कर रहे थे। खैर किसी भी तरह उस वक्त को झेला मैंने। मन अत्यंत गुस्से और घृणा भाव से भर गया था कि यह सिस्टम कैसा है कि विद्यालय में एक अदद शौचालय की व्यवस्था नहीं की जा सकती हैं।

उस वक्त चूंकि मल्टीमीडिया मोबाइल सेट की पहुंच भी सभी तक नहीं थी जो मैं अपनी जानकारी अपडेट कर पाती वित्तीय प्रावधानों और सुविधाओं के संबंध में। विधालय प्रधान जो भी जानकारी देते वो ही पत्थर की लकीर बन‌ जाती थी सभी के लिए। पर मैंने उस दिन मन ही मन सबको बहुत कोसा। मैडम ने समझाया कि मैं क्यों इतनी परेशान हो रही। ये कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। यहां सब लोग तो लगभग ऐसा ही करते हैं। फिर मुझे उन पर भी गुस्सा आया और मैंने उनसे कहा कि आप 6 साल से यहां हो फिर भी इस असुविधाजनक स्थिति से आपको फर्क नहीं पड़ रहा, इसलिए स्थितियां नही बदल रही। खैर मैडम से बहस का फायदा नही था क्योंकि वो इस माहौल की आदी थी, इसलिए उचित नहीं लगा बहसबाजी करना।

इसी तरह कुछ महीने और बीते ....इस गांव में दो तीन बुजुर्ग ऐसे थे जो पुराने समय के मिडिल पास थे और वो मुझे काफी सम्मान भी देते थे। इन लोगों से मैं शिक्षा और विधालय की समस्यायों पर कभी कभी बातें कर लिया करती थी। चूंकि मेरी उम्र 21-22 थी जब मैंने विधालय ज्वाइन किया था,जिसकी वजह से मैंने नोटिस किया था कि विधालय प्रधान मुझे बच्चों की ही कैटगरी में शामिल रखते थे। अगर विद्यालय में कोई मीटिंग भी है तो महिला शिक्षकों को अपनी बात रखने या प्रतिनिधित्व करने का मौका नहीं दिया जाता था। सच कहूं तो उस समय ऐसा लगता था कि विधालय में नहीं घर पर हूं..! खैर आम दिनों में मैं कुछ ग्रामीणों से व्यक्तिगत तौर पर बातें किया करती थी विभिन्न मुद्दो पर। जिसमें शौचालय के मुद्दे पर भी कितनी ही बार चर्चा की थी। एक दिन एक बुजुर्ग आए मेरे पास जो कि अक्सर मुझसे बातें किया करते थे, उन्होंने कहा कि कोई एनजीओ है जो सभी विद्यालयों में शौचालय बनवाने का कार्य कर रहे हैं, तो आप भी एक आवेदन लिख कर दो मैं बात करता हूं। इतना सुनते ही मेरा दिल खुश हो गया। मैं तुरंत काॅपी-पेन लेकर बैठ गई लिखने, फिर मुझे याद आया कि अरे मैं तो सहायक शिक्षिका हूं, मेरे कहने से कोई कुछ नहीं करेगा। इसके लिए तो विद्यालय प्रधान से ही आवेदन दिलवाना होगा। फिर तुंरत मैंने उन बुजुर्ग से कहा कि आप यही बात हमारे प्रधान को भी बताएं और समझाएं कि वो आवेदन दें। प्रधान से बात की गई और फिर मेरे चेहरे के भाव को पढ़ा उन्होंने। अंततः मुझे ही कहा कि एक आवेदन लिख कर आप दे दीजिए इनको। चूंकि मेरी लिखावट अच्छी होती थी तो मैंने अपनी पूरी निष्ठा के साथ लिखा खूबसूरती से इस आवेदन को। चूंकि  नौ-दस वर्ष बीत गए उस बात को तो याद नहीं आ रहा किसके नाम से लिखा गया था आवेदन। कुछ दिन तक बेचैनी में रही कि क्या हुआ आवेदन का ,कब बनेगा या बनेगा भी कि नहीं, क्योंकि आवेदन लिख कर देने के बाद मुझे किसी भी प्रकार की जानकारी कही से प्राप्त नहीं हुई।

महीनों बाद एक दिन अचानक से देखा कि दो मजदूर काम कर रहे, पता चला कि किसी को ठेकेदारी मिला हुआ है विधालय में शौचालय बनवाने का,वही काम पर लगा कर गया है इन मजदूरों को। मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। एक-एक दिन निर्माण कार्य को मैं इतनी बेकरारी से देखती कि लगता जैसे मेरे सपनों का महल बन रहा है। दो शौचालय बना एक ही घेरे में। टाइल्स भी लगाई जानी थी पर कितने ही समय तक विधालय के कमरे में ही बंद पड़ी रही, काफी हील हुज्जत के बाद फिर एक दिन आनन-फानन में ठेकेदार ने शौचालय का टाइल्स और गेट लगवा कर उपयोगिता प्रमाणपत्र ले कर चलता बना।

खैर हम बहुत खुश थे कि चलो अब किसी को भी अब खुलें में शौच के लिए नही जाना होगा। बच्चों को भी पूरे गर्व के साथ कहा कि बच्चों अब से खुले में खेतों में कोई नहीं जाएगा, सब लोग अब शौचालय में जाएंगे। पर यह क्या जब शौचालय में गये तो उसकी कुंडी ही गायब थी अंदर से। बाहर से जो कुंडी थी वो भी परफेक्ट नहीं थी।मतलब एक स्टेपनी को साथ में रखना पड़ता। कुंडी नही रहने का नतीजा यह हुआ कि गांव के ही अन्य शरारती बच्चों द्वारा टायलेट को गंदगी के ढेर में बदल दिया, जिसमें पैर रखना भी मुश्किल। फिर हम सभी पुरानी स्थिति में आ गए। पर इस बार मैं बर्दाश्त करने के मूड में नहीं थी और हमारे विधालय प्रधान एक भी रुपए खर्च करने के मूड में नहीं थे।सो इस बार खुलकर लताड़ा  प्रधान को मैंने। यहां तक कह डाला कि कल्पना कीजिए आपके परिवार की बहन-बेटी इस असहज हालत में होती तो भी आप ऐसे ही उदासीन बने रहते शौचालय के प्रति। चूंकि मेरा विवाह हो चुका था इस बीच और मैं प्रेग्नेंसी पीरियड में थी। ऐसे में हाइजीन का ख्याल रख पाना मेरे लिए चुनौतीपूर्ण हो गया था। 

अंततः 50-50 रुपये की सहयोग राशि खर्च करने की बात पर सहमति बनी और शौचालय की सफाई और कुंडी लगने का कार्य संपन्न हुआ।  अब लगा कि चलो सारे दुखों का अंत हुआ। डेढ़-दो साल हमने शौचालय का भरपूर इस्तेमाल किया। पर ठेकेदारी व्यवस्था के अंतर्गत बनी वह‌ शौचालय अपना रंग दिखाने लगी। एक तो अनुपयोगी हो गई, पर एक से मिला जुला कर काम चल रहा था। इसी बीच हमारे विधालय में एक नये नियमित शिक्षक स्थानांतरित हो कर आ गये। उन्होंने आते ही अपना रंग-ढंग दिखाना शुरू किया। क्योंकि उन्हें विधालय प्रधान का पद चाहिए था। सभी को विधालय विकास का शब्जबाग दिखाकर ऐसी परिस्थितियां पैदा कि विवश हो कर विधालय प्रधान ने अपना स्थानांतरण ले लिया। खैर हमें तो सिर्फ अपनी ड्यूटी निभाने से मतलब था। परंतु कुछ ही महीनों बाद उस नये प्रधान ने विधालय में एक अतिरिक्त वर्ग कक्ष निर्माण का टेंडर लिया और उसे पुराने भवन के उपर बनाने का निर्णय किया , जिसके लिए सीढ़ियों का निर्माण आवश्यक था और इसी सीढ़ी वाली जगह के लिए उसने उस तात्कालिक कामचलाऊ शौचालय को तुड़वा दिया और कहा कि भूंकप में यह धराशाई हो गई। खैर हमने घोर आपत्ति जताई इस बात पर तो उन्होंने आश्वासन दिया कि सीढ़ी के नीचे जो खाली जगह है वहां पर शौचालय का निर्माण करवा दिया जाएगा। 

हम पुनः अपनी पुरानी स्थिति में आ गए थे शौचालय के मामले में। इसी बीच मैं एक बेटी की मां बन भी चुकी थी वो भी सिजेरियन व्यवस्था के अंतर्गत। अब मुझे अपने और विधालय के बच्चों का  हाइजीन का ख्याल रखना और मुश्किल हो रहा था। और एक दिन आखिर मैं खुले में शौच के कारण संक्रमण के चपेट में आ ही गई। असहनीय दर्द के दौर से गुजरना पड़ा। डाक्टर ने साफ कह दिया था कि ढेर सारा पानी पिए और साफ सुथरे शौचालय का प्रयोग करें। यह दोनों ही कार्य असंभव था , क्योंकि मैं इस डर से पानी ज्यादा नहीं पीती थी कि बार बार शौचालय जाने की जरूरत महसूस होगी और विघालय में तो खुले में जाने के अलावा और कोई विकल्प ही नहीं था। और इसका परिणाम यह हुआ कि मैं बार बार संक्रमित हुई, यहां तक कि उस विधालय प्रधान के कार्यकाल में मुझे एक बार मेडिकल अवकाश तक पर जाना पड़ गया। हम सभी ने मिलकर बहुत बोला पर परिणाम शून्य रहा। फिर एक दिन पता चला कि उनका प्रमोशन हो गया और वो दूसरे विधालय में स्थानांतरित हो गये है।

अब विधालय के प्रधान का प्रभार मैडम को मिल गया ।वही मैडम जो पहली बार मुझे शौचालय के लिए पुआल के पीछे ले गयी थी। मुझे बहुत खुशी हुई कि चलो अच्छा हुआ मैडम प्रधान बनी है,अब तो जरूर इस समस्या का अंत होगा। आखिर वो खुद भी तो एक औरत हैं। पर मेरा यह भ्रम दो - तीन दिन में ही टूट गया। जब मैंने उनसे दो तीन बार चर्चा कि शौचालय निर्माण के बारे में तो एक दिन खीझ कर मुझे जबाब दिया कि इतना ही आसान होता तो बाकी प्रधान लोग नही बनवा देते। मैं उनका मुंह ही देखती रह गई। फिर मुझे भी गुस्सा आ गया कि ठीक है आप नहीं बनवाओगे तो मैं अधिकारियों से संपर्क करूंगी। इस पर उन्होंने कहा कि ज्यादा अंग्रेजी मेरे सामने नही चलेगी जो करना है करो।इतना ही दम था तो बाकी लोगों के समय क्यों नही बनवा ली। मैडम के बात से अंदर तक टूट गई। कुछ महीने ऐसे ही बीतें। विधालय के सीढ़ी के नीचे ही छिपते-छिपाते छुट्टी के बाद एक टाइम जैसे तैसे खुद को हल्का कर लिया जाता था।

इसी बीच सरकार ने एक बड़ा महाअभियान शुरू किया स्वच्छता का। सभी घरों में शौचालय की सुविधा उपलब्ध कराने और खुलें में शौच करने पर रोक लगाने के लिए महाअभियान शुरू किया गया। हम सभी शिक्षकों को भी इस अभियान में लगाया गया। बीडीओ के साथ वाले ह्वाट्सएप ग्रुप में भी शामिल किया गया। चूंकि अब सभी के पास मल्टीमीडिया मोबाइल सेट आसानी से उपलब्ध थे। इसलिए सूचनाओं के आदान-प्रदान ने मेरी जानकारी का भी  स्तर बढ़ाया था। हमने घर घर जाकर सर्वे किया और लोगों को बताया कि खुलें में शौच नही करना चाहिए। पर मन ही‌ मन मेरी आत्मा स्वीकार नहीं कर रही थी कि मैं इस योग्य हूं कि मैं औरों को उपदेश दूं कि खुलें में शौच नही करें। खुद विधालय के बच्चें और शिक्षक खुलें में शौच को मजबूर हैं।

फिर एक दिन मैंने हिम्मत करके बीडीओ साहब वाले ह्वाट्सएप ग्रुप में  अपने विद्यालय के फोटो को डालकर लिखा कि यह एक ऐसा स्कूल है जहां के शिक्षक घर घर जाकर लोगों को जागरूक कर रहे हैं कि खुलें में शौच नही करना चाहिए,पर खुद विधालय के सभी शिक्षक/शिक्षिका खुलें में शौच करने जाते हैं। मैसेज तो सार्वजनिक रूप से कर दिया पर मन ही‌ मन डर भी लग रहा था कि पता नहीं क्या प्रतिक्रिया होगी। पर बीडीओ साहब ने रिप्लाई किया कि विधालय के प्रधान का मोबाइल नंबर भेजिए। मेरी तो खुशी का ठिकाना नहीं रहा। मैंने तुरंत पुराने और वर्तमान दोनों प्रधान का नम्बर साझा कर दिया।  अब आगे क्या बात हुई मुझे कुछ भी नहीं पता चला। पर मुझे इतना आश्वासन दिया गया कि अब जल्द ही शौचालय बन जाएगा। मैं तो इतने से ही खुश हो गई थी कि अब तो शौचालय बनने से कोई रोक नहीं सकता।

पर ये क्या, फिर कुछ महीने बीत गए , शौचालय अब तक नहीं बना और ना ही कोई खबर पता चल पा रही थी इस बारे में। मैडम भी सकारात्मक नही थी इसलिए उनसे कुछ पुछना बेवजह की लड़ाई को आमंत्रण देना था, क्योंकि मैडम अपने पति से पुछे बिना एक साइन तक नहीं करती थी। खैर हिम्मत करके एक दिन बीडीओ साहब को निजी तौर पर मैसेज किया और कहा कि सर अभी तक शौचालय नही बना। कृपा कर के कुछ दया-दृष्टि कीजिए। इस पर बीडीओ साहब ने आश्चर्य व्यक्त किया कि क्या अभी तक शौचालय नही बना। अच्छा मैं बात करता हूं प्रधान से। पुनः एक बार नम्बर भेज दीजिए।  अगले दिन विधालय गयी तो मैडम गुस्से में थी। उनके चेहरे के भाव मुझे संकेत दे रहे थे कि जैसे बीडीओ साहब से बात कर मैंने गलती कर दी हो। शायद बीडीओ साहब ने फटकार लगाई थी उनको।

विधालय में एक और नई मैडम आयी थी स्थानांतरित हो कर। मैं उनको कभी कभी अपने प्रयासों के बारे में बता दिया करती थी। चूंकि बाकी लोगों को कोई भी रुचि नहीं थी इस मुद्दे पर, इसलिए मैं चुपचाप अपने प्रयासों को जारी रखे हुए थी। इसी बीच पता चला कि हमारा प्रखंड जिस विधालय में है उसे ओडीएफ फ्री घोषित कर दिया है और बीडीओ साहब को उनके प्रयासों के लिए सम्मानित किया जाएगा। यह खबर सुनकर मुझे बहुत दुःख हुआ। क्योंकि तब तक मैं जान चुकी थी कि बहुत से ऐसे विधालय है जहां शौचालय की सुविधा नगण्य है या जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है। फिर जिस प्रखंड के विधालय के शिक्षक और छात्र खुलें में शौच करने जाते हो वह ओडीएफ फ्री प्रखंड कैसे घोषित हो सकता है।  मन अत्यंत दुःखी हो गया था।सभी चीजों से विश्वास टूटने लगा था। अंततः मैं थक कर बैठ गई। 

अब तक फेसबुक का प्रचलन शुरू हो गया था। मैंने भी अपना अकाउंट बनाया। कुछ समय बीतने के बाद महसूस हुआ कि हम सोशल प्लेटफार्म का उपयोग सिर्फ एंटरटेनमेंट के लिए नहीं बल्कि सही कार्यो में मदद लेने के लिए भी कर सकते हैं। मेरी मित्र सूची में मुझे एक पत्रकार दिखे जो कि उस समय दैनिक भास्कर के लिए काम करते थे। मैंने उनके समक्ष अपनी संवेदनाएं रखीं और प्रश्न रखा कि आप को नही लगता है कि जिस विधालय में तीन महिला शिक्षिकाएं और सैकड़ों की संख्या में किशोरावस्था को पार कर रही लड़कियां हो, वहां एक अदद शौचालय का निर्माण अनिवार्य है।अगर कभी कुछ अनहोनी घट जाती है तो फिर तब अफसोस के सिवा कुछ हाथ में नही रहेगा। चूंकि उस समय तक जिला मुख्यालय तक पहुंच होना बहुत बड़ी बात होती थी। इसलिए मुझे उस समय यही सही लगा कि अपने विद्यालय की समस्या का निदान मीडिया के माध्यम से निकलवा सकूं।

पत्रकार एक भले और संवेदनशील इंसान निकले। एक ही दिन बाद वो 38 किमी की यात्रा कर मेरे विधालय पहुंचे और वहां की वास्तविक स्थिति का अवलोकन किया। जो भी सूचनाएं उन्हें चाहिए थी मैंने उपलब्ध करवायी। मुझे थोड़ा सा डर भी लग रहा था अपने स्टाफ लोगों की प्रतिक्रिया से , इसलिए मैंने पत्रकार महोदय को अनुरोध किया कि कृपा कर मेरा नाम जाहिर मत कीजिएगा कि मैंने आपको बताया था यहां के हालात के बारे में। सभी लोग विद्यालय में अंचभित थे कि इस सुदूर देहात में तो शिक्षा अधिकारी तक नही आते,यह पत्रकार कैसे आ गया। मैंने भी अनभिज्ञता जाहिर कर दी। उस रात को मैं रात भर सो नहीं सो सकी थी ठीक से। सारी रात मुझे यही लग रहा था कि कल न्यूज निकलेगी और शिक्षा विभाग के अधिकारी खबर देखते ही स्वत: संज्ञान लेंगे इस मामले में और कुछ ही दिनों में विधालय में शौचालय बन जाएगा। यही सोचते सोचते मैं सो गयी।

खैर कल सुबह की अखबार देखा तो प्रमुखता से विधालय की तस्वीर के साथ शौचालय की समस्या को उठाया गया था। जिसे पढ़कर काफी उत्साहित हुई। विधालय में भी सबको दिखाया।पर प्रधान मैडम रुष्ट दिखी इस खबर से। उन्होंने कहा कि इस सबसे कुछ नहीं होता है। पर मैं तो खुश थी कि अब तो बन कर ही रहेगा शौचालय। 

फिर कुछ समय बीता, कही से कोई खबर नहीं। मन एक बार फिर निराशाओं से भरने लगा। इसी बीच एक दिन बीडीओ साहब का मैसेज आया। मुझे बड़ा आश्चर्य लगा। लगे हाथ मैंने बोल डाला- सर आपने आखिर मेरा काम नही करवाया। सर ने पुछा कौन सा काम ,शौचालय निर्माण का! मैंने कहा हां सर,अभी तक शौचालय नही बना। फिर उन्होंने कहा कि आपके विधालय प्रधान ने तो उसी बार मुझे कहा कि शौचालय निर्माण कार्य प्रगति पर है। मैंने बहुत डांट लगाई थी आपके प्रधान को। अब तो मेरा स्थानांतरण हो गया है , फिर भी मैं बात करूंगा आपके विधालय प्रधान से।

मुझे यह सुनकर धक्का लगा कि लोग इतना बड़ा झूठ कैसे बोल लेते हैं। आखिर क्या समस्या है एक शौचालय निर्माण में, जो लोग इसे इतना भारी भरकम बना कर रखे हैं। काश मैं प्रधान होती तो इतना परेशान नही होना पड़ता। मेरी छात्राएं भी शौचालय के नाम पर कक्षा के बीच से ही छुट्टी ले कर घर चली जाती थी। मेरे पास कोई विकल्प भी नहीं था कि उन्हें मैं विधालय में रोक पाऊं पूरा समय। एक अदद शौचालय कितनी सारी चीजें प्रभावित कर रही थी,इस ओर कोई ध्यान नहीं दे रहा था।

कुछ महीने फिर बीते और एक दिन फेसबुक के माध्यम से ही एक तथाकथित शिक्षक संघ के जिलाध्यक्ष से मेरी जान-पहचान हुई, बाद में मुझे पता चला कि मैं खुद भी इस संघ की सदस्यता ले चुकी हूं बहुत पूर्व ही। खैर उनसे शैक्षिक मुद्दे पर तर्क वितर्क के दौरान मैंने अपने विद्यालय के शौचालय की समस्या रखी और उनसे अनुरोध किया कि वो मेरी मदद करें। मेरी पुरी कहानी सुनकर उन्होंने मुझे एक आवेदन लिखने को कहा जिला कार्यक्रम पदाधिकारी,सर्व शिक्षा अभियान के  नाम से और इसकी प्रतिलिपि संघ के नाम से भी देने को कहा। मैंने अपने सारे प्रयासों और चिंताओं को संक्षेप में समेटते हुए सारी बातों को उस आवेदन में समाहित किया और वह आवेदन शिक्षक संघ के जिला अध्यक्ष के हाथों जिला कार्यक्रम पदाधिकारी के समक्ष  सीधे तौर पर पेश कर समस्याओं से अवगत कराया गया। संयोग से उस समय जिलों में माडल शौचालय निर्माण होने थे जिसकी सूची विधालयों के नाम के साथ पटना भेजे जाने थे स्वीकृति के लिए। मेरे विधालय का भी नाम इस सूची में भेज दिया गया। कुछ दिनों बाद मैंने देखा एक लेटर जिसमें जिले के विभिन्न प्रखंडों के विद्यालयों का नाम था जहां शौचालय निर्माण होना था और उन सभी विद्यालय के प्रधान को इससे संबंधित एक मीटिंग में भी भाग लेना था। सौभाग्यवश मेरे विधालय का नाम भी इस सूची में था।  मैं विधालय की दूसरी मैडम को यह सूचना दी कि मेहनत रंग लाई। हमारे विधालय में अब बहुत सुंदर शौचालय बनेगा। वो भी बहुत खुश हुई क्योंकि जब आवेदन और न्यूज की कटिंग संलग्न कर मैंने जिला में दिया था वो उन्होंने देखा था। मैंने अपने विद्यालय प्रधान को भी इस संबंध में सूचित किया,पर वो मेरी बात सुनकर भड़क उठी। बोली कि तुम क्रेडिट लेना चाह रही हो,यह शौचालय मैंने पैसे खर्च कर पास करवाएं है। उनकी बातें सुनकर हम सभी एक साथ हंसने लगे। हमने कहा कि कोई बात नहीं क्रेडिट आप रख लो, हमें बस शौचालय बनवा कर दे दो आप। मैडम अपना सा मुंह बनाकर चल दी वहां से। खैर कुछ ही दिनों बाद निर्माण कार्य शुरू हो गया और एक बहुत ही खूबसूरत शौचालय हमारे विधालय में बना, जिसमें लड़के-लडकियो का अलग-अलग शौचालय था। चार-चार भाग युरिनरी के थे।सभी में सफेद रंग की टाइल्स लगी। जब शौचालय बन कर रेडी हो गया तो मेरी सहयोगी मैडम ने मुझे धन्यवाद कहा और हमने साथ में शौचालय के आगे खड़ा हो कर फोटो खिंचवायी। सच कहूं तो यह तस्वीर खींचवाने में जो मजा आया वो किसी खूबसूरत मिनार के सामने खिंचवाने में भी नहीं आता।यह शौचालय अभी भी चालू अवस्था में है।

तो इस तरह समाप्त होती है मेरे "शौचालय की संघर्ष गाथा"।

स्वच्छ रहें, स्वस्थ रहें, सुरक्षित रहें !

संघर्षरत रहे सफलता जरूर मिलेगी...!


लेखिका- प्रियंका कुमारी, सीतामढ़ी, 


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अभिभावकों और बच्चों का एक साथ सीखना

दृश्य -1 साक्षी के दादाजी उसकी कक्षा में बैठकर उसके सभी सहपाठियों के बीच कहानी सुना रहे है और वो मन ही मन गर्वीली सी मुस्कान लिए सबके साथ कहानी सुन रही है। दृश्य -2 आदित्य अपनी दादी के साथ बैठकर एक सादे पेज पर कलर पेन्सिलों के साथ ड्राइंग कर रहा है। उसकी दादी और वो दोनों एक ही समय में एक ही पेज पर ड्राइंग कर रहे है और आपस में बातचीत भी कर रहे है। दृश्य -3 महिमा अपने घर के आंगन में अन्य भाई-बहनों के साथ मां के निकट बैठी है और उसकी कक्षा की शिक्षिका उसकी मां से उन्हीं की भाषा में बात कर रही है और बता रही है कि एक शिक्षक और अभिभावक साथ में मिलकर काम करें तो बच्चों का सर्वांगीण विकास कितना सरल हो जाएगा। साथ ही वो अपने बुनियादी कक्षाओं के बच्चों की शिक्षा में कैसे अपना सहयोग दे सकती है। दृश्य -4 स्कूटी से जा रही शिक्षिका रास्ते में रुक कर खेतों से घास के भारी-भरकम गट्ठर सर पर लिए जा रही महिलाओं को रोककर और उनके गट्ठर नीचे रखवाकर पेड़ की छांव में बैठकर उन्हें अपने पोते-पोतियों को रात में सोते समय कोई कहानी या अनुभव सुनाने की बात करती है और उनकी कविता -कहानी से बच्चों के शिक्षण पर...

टीचर ऑफ़ द मंथ : एक सराहनीय पहल

हैलो, मैं न्यूज 18 चैनल से बोल रहा हूं। एसीएस सर द्वारा बिहार के 12 शिक्षकों को टीचर औफ द मंथ अवार्ड् दिया गया है जिसमें आपका भी नाम है। बधाई हो। हम आप का बाइट लेना चाह रहे है। क्या आप अभी विद्यालय में है... चूंकि मैं उस समय डायट डुमरा, सीतामढ़ी में दीक्षा पोर्टल पर कोर्स लांच करने की तकनीकी प्रक्रियाओं को अपने लैपटॉप पर संपादित कर रही थी इसलिए मैंने उन्हें कहा कि आप से कुछ देर बाद बात करती हूं और मुझे इस अवार्ड की कोई सूचना नहीं मिली है। इसलिए आप मुझे इस से संबंधित कोई जानकारी है तो मेरे नंबर पर साझा कर दीजिए। कार्य की व्यस्तता अधिक थी फिर भी इस खबर को सुनकर प्रसन्नता हुई। इसलिए दो मिनट रुक कर मैंने जब अपना मोबाइल चेक किया तो देखा कि बधाई देने वाले और न्यूज लेने वालों के काॅल्स और मैसेज का अंबार लगा था। मुझे हंसी भी आई कि मुझे छोड़ कर सबको खबर हो चुकी थी कि मैं टीचर औफ द मंथ बन चुकी हूं। फिर अपने परिजनों को इस संबंध में एक मैसेज कर मैं अपने कार्य में और उत्साह के साथ व्यस्त हो गई। कोर्स लांच में जिला शिक्षा पदाधिकारी सीतामढ़ी का भी आगमन हुआ और उन्होंने भी बधाईयां दी। साथ ह...

निपुण अभिभावक निपुण बच्चे

निपुण अभिभावक निपुण बच्चे ********************************* इस आलेख के माध्यम से आप जानेंगे कि अगर हमें बच्चों की शिक्षा में अभिभावकों की सहभागिता सुनिश्चित करवानी है तो बच्चों के साथ-साथ अभिभावकों को भी निपुण बनाने में अपना सहयोग देना होगा। साथ ही अभिभावकों के लिए ऐसे अवसरों का भी सृजन करना होगा जिसमें वह बच्चों के हित में अपनी भागीदारी दे सकें। मैंने निपुण अभिभावक निपुण बच्चे नवाचार का प्रयोग कर अभिभावकों के लिए एक अवसर उपलब्ध करवाने की कोशिश की है जिसके माध्यम से वो बच्चों की शिक्षा में सहभागी बन सकें। किसी भी बच्चे के लिए परिवार प्रथम पाठशाला तथा माता-पिता/अभिभावक प्रथम शिक्षक होते हैं। बच्चे जब पहली बार विद्यालय आते हैं तो उस समय भी उनके पास बहुत सा ज्ञान और अनुभव होता है । वैसे तो बच्चों की शिक्षा में पूर्व में भी परिवार की भागीदारी के महत्व को स्वीकार किया गया है पर नई शिक्षा नीति 2020 में अभिभावकों एवं समुदाय की शिक्षा में सहभागिता पर विशेष बल देने की बात की गई है। राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा मंत्रालय द्वारा भी शिक्षा में अभिभावकों की सहभागिता से संबंधित डा...